I am memory. I am a rabbit, a taxidermy cartoon falling through space. A block of silver burning the fingertips of a grasping child.
- Patti Smith (Bread of Angels)
In this world, everyone thinks someone else is dumb, weak, or less capable.
Someone feels superior because of money.
Someone feels superior because of class.
Someone feels superior because of education, language, or status.
But the same person becomes small in front of someone more powerful than them.
So nothing is fixed.
Everything is relative.
People say ghosts, spirits, and jinns live in different dimensions.
But I think humans also live in different dimensions.
The rich, the poor, the powerful, the helpless, the educated, the forgotten
all live on the same earth, but not in the same world.
And the saddest thing is this:
Everyone thinks their dimension is the real one.
— Arhaan
पिछली सर्दियों में पहला खत उस लड़की तरफ से आया था जिसे मैंने एक कहानी में लिखना शुरू किया था और फिर भूल गया था। उसने लिखा था
"अब हवा अंदर आ रही है लेकिन मैं बाहर किसी के भुला दिए जाने के ठंडे ख्याल से जम गई हूँ।"
फिर और खत। सब अधूरे लोग, आधे लिखे थोड़े मिटाए गए लोग। रात में लगता है जैसे कमरा उनसे भरा हो। सामने बस आधे अधूरे लोग।
क्या जिनके बारे में हम सोचते हैं वो भी हमें याद रखते हैं?
मैं ऐसे लोगों के खत दराज में रख देता हूँ। लेकिन सुबह दराज का ताला खुला मिलता है।
बचपन के घर की छत पर बैठकर मैंने तुम्हें पहली बार देखा था। अब वह छत टूट चुकी है और जंग लगी हुई है। लेकिन उस दिन की धूप अभी भी मेरी आँखों में चमकती है जब भी हवा चलती है।
शाम का वक्त था। मैं खिड़की के पास खड़ा हो गया। बाहर हल्की बारिश टपक रही थी। छत पर छोटी-छोटी आवाजें पड़ रही थीं। मैंने कॉफी बनाई। काली, बिना चीनी के। भाप पतली लकीरों में ऊपर उठती रही। फिर सोफे पर बैठ गया और फिल्म चला दी। नाम था The Killing of a Sacred Deer।
स्क्रीन पर डॉ. स्टीवन मर्फी का संसार धीरे-धीरे खुलने लगा। एक सफल सर्जन। हाथों में जिंदगियाँ संवरती हैं लेकिन चेहरा हमेशा शांत रहता है। उनका घर भी बिल्कुल वैसा ही था। हर चीज अपनी जगह पर। हर कोना साफ। जैसे ऑपरेशन थिएटर की ट्रे पर रखे सामान। पत्नी अन्ना नेत्र चिकित्सक हैं। दो बच्चे, बेटा बॉब और बेटी किम। नाश्ते की मेज पर बातें भी एक खास लय में चलती थीं। रात का खाना, स्कूल की बातें, छोटी मुस्कानें। सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा था।
लेकिन फिर मार्टिन आया।
एक किशोर। आँखें शांत लेकिन देखने का अंदाज कुछ अलग। उसका पिता सालों पहले स्टीवन के ऑपरेशन के दौरान नहीं रहा। मार्टिन धीरे-धीरे करीब आने लगा। पहले बातें, फिर घर आना जाना। परिवार उसे स्वीकार करने लगा। जैसे कोई नया सदस्य जो बिना शोर किए अपनी जगह बना रहा हो।
फिर कुछ बदलने लगा।
बच्चों में एक अजीब सी बीमारी के लक्षण दिखने लगे। पैरों में ताकत चली गई। भूख मिट गई। कोई नाम नहीं उसका। कोई रिपोर्ट कुछ नहीं बता पाती। स्टीवन जो हमेशा इलाज जानता था, अब सिर्फ देखता रहता है। तर्क की दुनिया में दरार पड़ने लगती है। और उस दरार से कुछ पुराना सा रिसता हुआ आता है।
यॉर्गोस लैंथिमोस ने इस कहानी को जिस तरह फिल्माया है वह देखते ही देखते मन में बस जाता है। कैमरा बहुत शांत है। चेहरों पर देर तक टिका रहता है। घर की रोशनी ठंडी लगती है। संवाद कम हैं और जो हैं वे सीधे से हैं। लेकिन उन्हीं सीधी बातों के बीच एक तनाव बनता रहता है।
कॉलिन फैरेल स्टीवन के रूप में बहुत अच्छे लगे। एक आदमी जो हमेशा नियंत्रण में रहने का आदी रहा, अब धीरे-धीरे अपने जीवन से फिसलता हुआ। निकोल किडमैन अन्ना में एक ठंडी शांति है जो कभी डरावनी लगती है। बैरी कीओघन का मार्टिन सबसे ज्यादा याद रहता है। वह कम बोलता है लेकिन उसकी मौजूदगी पूरे घर को बदल देती है। जैसे कोई बिल्ली रात में आ गई हो और अब चली नहीं जा रही।
फिल्म में हास्य भी है लेकिन बहुत अजीब सा। हँसी नहीं आती, कुछ और महसूस होता है। दृश्य सुंदर हैं लेकिन उनमें एक ठंडक है।
देखने के बाद कई दिन तक मन में कुछ घूमता रहा। रात को लेटते वक्त वही घर याद आता। वही रसोई। वही मार्टिन जो चुपचाप देखता रहता है।
मुझे लगा जैसे हमारे अपने जीवन में भी कहीं कोई ऐसा दरवाजा खुला पड़ा हो। कोई पुराना कर्ज जो चुपचाप लौट रहा हो।
यह फिल्म हमें कुछ नहीं समझाती। सिर्फ दिखाती है। जीवन कितना नाजुक है। हम जो कुछ भी बनाते हैं वह सब किसी अनजाने धागे से बँधा हो सकता है। अतीत कभी पूरी तरह मिटता नहीं। वह किसी न किसी रूप में वापस आता है और कुछ माँगता है। और जवाब देने के लिए हमारे पास न शब्द काफी होते हैं न हिम्मत।
फिल्म खत्म होने के बाद स्क्रीन कुछ देर खाली रही। या शायद खाली नहीं थी। शायद उसमें अभी भी कुछ चल रहा था। कोई हल्की साँस। कोई दूर की आवाज।
मैंने कप खाली किया। बारिश अभी भी हो रही थी। शहर वही था। लेकिन कुछ देर के लिए सब कुछ थोड़ा अलग सा लग रहा था। जैसे कोई चीज जो पहले नहीं दिख रही थी अब किनारे पर खड़ी हो गई हो।
और शायद यही सबसे बड़ी बात है इस फिल्म की। कि वह हमें एक ऐसी जगह पर छोड़ जाती है जहाँ हम अपने जीवन को थोड़ी देर के लिए नई नजरों से देखने लगते हैं।
तुम्हारा दुपट्टा आज भी मेरे पास है। दराज़ के एक कोने में दबा हुआ। उसका रंग कभी हल्का नीला था, छोटे-छोटे फूलों से भरा हुआ। अब वे फूल फीके पड़ गए हैं। जैसे समय ने धीरे-धीरे उनका रंग अपने भीतर खींच लिया हो। फिर भी जब मैं उसे निकालता हूँ, तो लगता है जैसे तुमने उसे कल ही अपने कंधे से उतारा था। उसकी तहों में अब भी तुम्हारी देह की कोई बहुत हल्की, लगभग खो चुकी गर्मी बची हुई लगती है।
हमारे घरों के बीच एक छोटी-सी दीवार थी। इतनी छोटी कि हाथ बढ़ाकर दूसरी तरफ रखा जा सकता था। तुम उस पार रहती थीं और मैं इस पार। रात को जब घरों की बत्तियाँ बुझ जातीं और सब सो जाते, हम चुपचाप उसी दीवार के पास आ जाते। हम बहुत कम बोलते थे। ज़्यादातर एक-दूसरे को देखते रहते थे। तुम्हारी आँखों में एक अजीब-सी चुप्पी थी। ऐसी चुप्पी, जिसमें शब्दों से ज़्यादा बातें थीं।
शायद प्रेम की शुरुआत भी ऐसे ही होती है। बिना घोषणा के। बिना किसी बड़े वाक्य के। बस दो लोग होते हैं, एक छोटी-सी दीवार होती है, और उस दीवार के दोनों तरफ एक-एक धड़कता हुआ डर।
उस रात आसमान साफ था। हवा धीमे-धीमे चल रही थी। मैंने दीवार के ऊपर से अपना हाथ बढ़ाया। तुमने अपना दुपट्टा मेरी तरफ कर दिया। मैं उसे उँगलियों से छूने लगा। अँधेरे में उसका रंग साफ दिखाई नहीं दे रहा था, पर कपड़े की बनावट महसूस हो रही थी। जैसे मैं दुपट्टे को नहीं, तुम्हारे होने को छू रहा था। जैसे किसी चीज़ को छूते हुए मैं पहली बार समझ रहा था कि पास होना कितना सुंदर और कितना डरावना होता है।
तभी अचानक एक आवाज़ आई।
वह आवाज़ न बहुत तेज़ थी, न बहुत धीमी। बस अजीब थी। जैसे कहीं दूर कोई पुराना रेडियो अपने आप चालू हो गया हो। या जैसे ज़मीन के नीचे कोई भूला हुआ कुआँ अचानक खुल गया हो। तुम घबरा गईं। तुमने हाथ झटका। दुपट्टा मेरे हाथ में फँस गया और तुम भाग गईं।
तुम्हारे नंगे पाँवों की आवाज़ कुछ देर तक पत्थरों पर सुनाई देती रही। फिर वह गली के मोड़ पर जाकर खो गई। मैं वहीं खड़ा रह गया। हाथ में तुम्हारा दुपट्टा था, पर तुम नहीं थीं। उस पल मुझे लगा, जैसे किसी ने मेरे हाथ में तुम्हारी जगह तुम्हारी अनुपस्थिति रख दी हो।
उसके बाद मैंने तुम्हें कभी नहीं देखा।
दुपट्टा मेरे पास रह गया। या शायद सच यह है कि मैं उसी दुपट्टे के पास रह गया। अब भी कुछ रातों में, जब घर शांत हो जाता है और अपनी ही साँसों की आवाज़ सुनाई देने लगती है, मैं उसे दराज़ से निकालता हूँ। देर तक हाथ में लिए बैठा रहता हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ कि उसे फिर उसी दीवार के पास ले जाऊँ और हवा में लहरा दूँ। शायद तुम लौट आओ। शायद तुम अँधेरे से निकलकर फिर सामने खड़ी हो जाओ। जैसे कोई बहुत पुरानी याद अचानक बिना आवाज़ किए लौट आती है।
लेकिन तुम नहीं आतीं।
सिर्फ हवा आती है।
कभी-कभी मुझे लगता है कि उस रात जो आवाज़ आई थी, वह बाहर से नहीं आई थी। वह मेरे भीतर से आई थी। शायद मैं ही डर गया था। शायद मुझे डर इस बात से लगा था कि तुम सचमुच इतनी पास आ गई थीं। प्रेम दूर हो तो सुरक्षित लगता है। वह कल्पना बना रहता है। कविता बना रहता है। लेकिन जब वह हाथ की पहुँच में आ जाता है, तो आदमी अपनी ही इच्छा से डरने लगता है।
अब तुम्हारे न होने के बाद मेरे पास बस यही दुपट्टा है। कपड़े का एक छोटा-सा टुकड़ा। किसी और के लिए शायद बिल्कुल बेकार। लेकिन मेरे लिए वह एक पूरी रात का बचा हुआ प्रमाण है। वह मुझे याद दिलाता है कि कभी एक दीवार थी। उस दीवार के दोनों ओर हम थे। और एक क्षण ऐसा भी था जब दुनिया बहुत छोटी लगने लगी थी।
फिर एक आवाज़ आई और सब बदल गया।
कभी-कभी सोचता हूँ, दुनिया में ऐसी कितनी दीवारें होंगी। हर दीवार के दूसरी तरफ कोई न कोई खड़ा होगा। कोई हाथ बढ़ा रहा होगा। कोई कुछ कहना चाहता होगा। कोई किसी को छूने ही वाला होगा। और तभी कहीं से कोई आवाज़ आती होगी। लोग डर जाते होंगे। लौट जाते होंगे। अपने-अपने हिस्से की चुप्पी में।
और पीछे रह जाती होगी कोई चीज़।
कभी दुपट्टा। कभी चिट्ठी। कभी कोई अधूरा वाक्य।
ऐसी चीज़, जो अब किसी काम की नहीं होती, फिर भी कोई उसे जीवन भर संभालकर रखता है।