Hi all
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Thanks
From an idea → to an industry → to an ecosystem.
12 years of building capabilities that help India make, innovate and scale.
Make in India. Innovate for India. Scale for the World.
#MakeInnovateScale
@KraantiKumar सवाल सिर्फ ये नहीं कि AI कितना ताकतवर होगा, ये भी है कि उसे कितनी छूट देंगे और गलती पर जिम्मेदारी किसकी होगी। मदद लेने का मतलब पूरा कंट्रोल सौंपना नहीं होना चाहिए।
@BRICSinfo The real test is whether these new engines of growth improve ordinary people’s lives or just give them a different set of billionaires to read about.
Who gets a say in the world’s money decisions?
• BRICS finance leaders have called for changes to institutions including the International Monetary Fund and World Bank.
• They want developing economies to have stronger representation as their contribution to the global economy grows.
• They also called for cheaper, faster and safer payments between countries.
• The statement came ahead of the BRICS leaders’ summit in New Delhi.
The real test is what changes for ordinary people and businesses.
More seats at the table should lead to fairer access to finance and easier payments.
Otherwise, institutional reform remains a conversation among officials.
आस्था की आलोचना कैसे ��ो?
किसी चमत्कार के दावे पर सवाल उठाना जरूरी हो सकता है। किसी संस्था के शोषण की जाँच भी जरूरी हो सकती है।
लेकिन उसी संस्था से किसी अकेले या दुखी इंसान को सहारा मिलता हो, तो उसके अनुभव को मूर्खता कहकर खारिज करना बातचीत बंद कर देता है।
ड्यूरांट धर्म के इतिहास में सांत्वना और सेवा भी देखते हैं, सत्ता, धोखे और हिंसा की भूमिका भी।
इन दोनों को साथ देखना किसी गलती को माफ करना नहीं है। यह समझना है कि इंसान और संस्था की कहानी एक ही रंग की नहीं होती।
दावे को प्रमाण पर परखिए। शोषण को नाम दीजिए। और विश्वास रखने वाले व्यक्ति से सम्मान के साथ बात कीजिए।
क्या पहले सब अच्छे थे?
आज का कोई घोटाला देखते ही हम पुराने समय को ईमानदार घोषित कर देते हैं। लेकिन किताब पुराने दौर की मिलावट, भ्रष्टाचार और छल की शिकायतें भी सामने रखती है।
इससे आज की गलती छोटी नहीं हो जाती। ब�� यह दावा कमजोर पड़ता है कि बुराई हमारी पीढ़ी का नया आविष्कार है।
उलटी सावधानी भी जरूरी है। केवल अपराधों का इतिहास पढ़कर यह मान लेना कि पहले हर व्यक्ति बुरा था, उतना ही गलत होगा।
अधिकतर लोगों की जिंदगी घर, काम, बच्चों और छोटे सहयोगों में बीतती थी। ऐसी जिंदगी अक्सर इतिहास के बड़े पन्नों से गायब रहती है।
अतीत को न स्वर्ग बनाइए, न अपराधों का गोदाम। उसमें हमारे जैसे अधूरे लोग रहते थे।
सत्ता बदल गई, आदतें?
विरोध में खड़ा व्यक्ति सत्ता की मनमानी बहुत साफ देख सकता है। वही व्यक्ति कुर्सी मिलने पर अपनी मनमानी को जरूरत का नाम दे सकता है।
ड्यूरांट इतिहास में सफल विद्रोहियों के पुराने ��ासकों जैसे तरीके अपनाने की ओर ध्यान दिलाते हैं।
इसलिए अच्छे इरादों की घोषणा उपयोगी है, लेकिन पर्याप्त नहीं। असहमति, आलोचना और जवाबदेही के लिए जगह भी चाहिए।
बदलाव की जाँच इन सवालों से कीजिए: क्या कमजोर व्यक्ति बोल सकता है? क्या नियम नए शासक पर भी लागू होते हैं? क्या गलती स्वीकार होती है?
कुर्सी पर कौन बैठा है, यह महत्वपूर्ण है। उस कुर्सी पर बैठकर कोई क्या कर सकता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण ��ै।