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शंकर कौन हैं,और गुरु को शंकर क्यों कहा गया? आध्यात्मिक स्वरूप विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
#गुरुपूर्णीमा
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स्वर्ग नरक की वास्तविकता क्या है? स्वर्ग नरक के विषय अनेक प्रकार की भ्रांतियां है, इसकी वास्तविक स्वरूप, विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
#स्वर्ग_नरक
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सनातन धर्म में चार वर्ण किसने बनाए? विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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स्थितप्रज्ञ महापुरुष के क्या लक्षण हैं? महापुरुष के लक्षण और कार्यप्रणाली को विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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अभ्यास और वैराग्य क्या है, कैसे करें? विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।।
जैसे नदियों के बहुत-से जल-प्रवाह (अपने में विकराल होते हुए भी) समुद्र की ओर दौड़ते हैं, समुद्र में प्रवेश करते हैं, ठीक उसी प्रकार वे शूरवीर मनुष्यों के समुदाय आपके
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गजेन्द्र उद्धार हरी अवतार की कथा? विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात
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ईष्ट कौन है, पूज्यनीय कौन है? सर्वत्र पूजा किसी न किसी की होती ही है, जानना जरूरी है, कि ईष्ट कौन है और पूज्यनीय कौन है, विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
#इष्टदेव
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पांच प्रकार की वृत्तियों का क्या रहस्य है? विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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परमात्मा के द्वारा प्रेरित गुरुमंत्र क्या है, जिसे सभी गुरुओं ने अपने शिष्यों के अंदर जागृत किया? गुरुमंत्र की वास्तविक क्रियाविधि को विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी।श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात
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।। "श्वेताश्वतर" - उपनिषद् ।।
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा
सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः।
हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो
य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ।।१३।।
("श्वेताश्वतर" उपनिषद् - तृतीयोऽध्यायः)
श्वेताश्वतरोपनिषद् का तृतीय अध्याय साधक को बाह्य जगत् की विविधता से उठाकर उसके अन्तःकरण में स्थित उस परम चैतन्य का साक्षात्कार कराने की दिशा में अग्रसर करता है। प्रस्तुत मन्त्र उपनिषद् के उन महत्त्वपूर्ण मन्त्रों में है, जो स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा कोई दूरस्थ सत्ता नहीं, अपितु प्रत्येक जीव के हृदय में अन्तरात्मा के रूप में सदैव विराजमान है।
भगवत्पादाचार्य भगवान् आदि शंकराचार्य इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि यहाँ वर्णित ‘अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः’ का अर्थ किसी आकार-विशिष्ट आत्मा से नहीं है। आत्मा तो निरवयव, निराकार, सर्वव्यापक और अनन्त है। ‘अङ्गुष्ठमात्र’ का प्रयोग केवल उपासनोपयोगी प्रतीक है, जिससे साधक अपने हृदयप्रदेश में स्थित चैतन्य का ध्यान कर सके। अतः इस मन्त्र का उद्देश्य आत्मा की परिमिति बताना नहीं, बल्कि उसकी अन्तःस्थिति का बोध कराना है।
‘अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः’ प्रतीक, परिमाण नहीं ! प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि उपनिषद् आत्मा का आकार अँगूठे के समान बता रहा है, किन्तु भगवान आदि शंकराचार्य इस भ्रान्ति का पूर्णतः निराकरण करते हैं। उनके अनुसार आत्मा सर्वव्यापक है; जो अनन्त है उसका कोई भौतिक माप नहीं हो सकता। इसलिए ‘अङ्गुष्ठमात्रः’ शब्द केवल ध्यान की सुविधा के लिए प्रयुक्त हुआ है। हृदयकमल में प्रकाशित चेतना का ध्यान करने हेतु उपनिषद् ने यह सांकेतिक रूप प्रदान किया है। जैसे- विशाल आकाश छोटे से पात्र में प्रतिबिम्बित दिखाई देता है, वैसे ही अनन्त ब्रह्म हृदयगुहा में अनुभवगम्य प्रतीत होता है। इससे उसकी वास्तविक व्यापकता में कोई कमी नहीं आती।
‘अन्तरात्मा’ प्रत्येक जीव का वास्तविक स्वरूप ! मन्त्र कहता है- “अन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः।”
परमात्मा प्रत्येक प्राणी के भीतर अन्तरात्मा के रूप में सदैव स्थित है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य के अनुसार यह ‘अन्तःस्थिति’ किसी स्थान-विशेष में प्रवेश करना नहीं है। ब्रह्म तो सर्वव्यापक है। ‘हृदय’ का अर्थ यहाँ बुद्धि का वह सूक्ष्म क्षेत्र है, जहाँ आत्मचैतन्य का अनुभव सम्भव होता है। आत्मा न बाहर से आती है, न भीतर जाती है। वह सदा विद्यमान है। केवल अविद्या के कारण उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हो पाता। इसी सत्य को कठोपनिषद् भी उद्घोषित करती है- “अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति।” और भगवद्गीता कहती है- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
‘हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तः’ आत्मा का ज्ञान कैसे सम्भव है? यह मन्त्र साधना का भी मार्ग बताता है।
”हृदा”- निर्मल अन्तःकरण द्वारा।
“मनीषा”- विवेकपूर्ण, सूक्ष्म और स्थिर बुद्धि द्वारा।
”मनसा अभिक्लृप्तः”- एकाग्र, संयमित और शुद्ध मन द्वारा।
भगवान आदि शंकराचार्य के अनुसार आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है। उसे आँखें नहीं देख सकतीं, वाणी व्यक्त नहीं कर सकती, और मन भी उसे वस्तु की भाँति ग्रहण नहीं कर सकता। परन्तु जब मन शुद्ध, बुद्धि विवेकी और अन्तःकरण निर्मल हो जाता है, तब वही आत्मा अपने स्वरूप में स्वयं प्रकाशित होती है। अतः आत्मज्ञान किसी बाहरी प्रमाण से नहीं, अपितु अन्तःकरण की परिशुद्धि और आत्मविचार से प्रकट होता है।
‘य एतद्विदुः अमृतास्ते भवन्ति’ ज्ञान ही अमृतत्व है ! मन्त्र का निष्कर्ष अत्यन्त स्पष्ट है कि जो इस सत्य को जान लेते हैं, वे अमृत हो जाते हैं। यहाँ ‘अमृतत्व’ का अर्थ शरीर की अमरता नहीं है। भगवत्पाद आदि शंकराचार्य कहते हैं कि जन्म और मृत्यु शरीर के धर्म हैं, आत्मा के नहीं। जो अपने को शरीर मानता है, वही मृत्यु का भय अनुभव करता है। जो अपने को आत्मा के रूप में जान लेता है, वह जानता है कि उसका वास्तविक स्वरूप न जन्म लेता है, न नष्ट होता है। यही कारण है कि उपनिषद् का अमृतत्व आत्मस्वरूप की अनुभूति है, न कि कालातीत शरीर की कल्पना।
अविद्या और आत्मविस्मृति : अद्वैत वेदान्त का मूल सिद्धान्त है कि जीव और ब्रह्म में कोई वास्तविक भेद नहीं है। भेद केवल अविद्या का परिणाम है। मनुष्य शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार और सम्बन्धों को अपना स्वरूप मान लेता है। यही बन्धन है। जब आत्मविचार के द्वारा यह मिथ्या पहचान समाप्त होती है, तब वही जीव अपने ब्रह्मस्वरूप का अनुभव करता है।
ध्यान का वास्तविक स्वरूप: इस मन्त्र में ध्यान की अत्यन्त सूक्ष्म पद्धति निहित है। साधक को बाह्य जगत् से मन हटाकर हृदयस्थ आत्मचैतन्य में स्थित होना चाहिए। ध्यान का उद्देश्य किसी नवीन वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि सदैव विद्यमान आत्मा के आवरणों को हटाना है।
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।। ॐ ।।
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।।
विश्व में सर्वत्र अणुरूप से व्याप्त हे विष्णो! आकाश को स्पर्श किये हुए, प्रकाशमान, अनेक रूपों से युक्त, फैलाये हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों
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सेवा क्या है, किसकी सेवा से सब कुछ मिलता है? सेवा का वास्तविक दृष्टिकोण एवं महत्व विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी।श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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भजन करने का सही मार्ग क्या है, कैसे किया जाता है, किसका किया जाता है,और क्यों भजन किया जाता है? विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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भगवत प्राप्ति साधना के चार प्रमुख अंग (नाम रूप लीला और धाम) क्या है? विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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संतों सोई सदगुरु मोहि भावे,...
पद की आध्यात्मिक सरल व्याख्या स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी द्वारा। विस्तार से समझें, प्रस्तुत सत्संग द्वारा। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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कबीरवाणी - बलम राउर देशवा में चुनरी बिकाय की व्याख्या? चेतावनी पद को विस्तार से समझें प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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कबीरवाणी - बलम राउर देशवा में चुनरी बिकाय की व्याख्या? विस्तार से समझें प्रस्तुत सत्संग द्वारा। स्वामी श्री राजेश्वरानंद महाराज जी। श्री परमहंस आश्रम राजकोट गुजरात।
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