असम ने चुनाव से पहले 30 लाख महिलाओं को 9000 रू प्रति महिला देने का एलान किया है.
बिहार सहित कई राज्यों ने सत्ता में लौटने का शायद यह तरीका अपनाया है. गरीबी है, लोग बेहक जाते हैं. इसलिये पार्टियां इसे दोहरा सकती हैं.
चुनाव आयोग रोकेगा नहीं, यह देख लिया. सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही रेवड़ी कल्चर पर बोला ज़रूर है, परन्तु कड़े कदम उठाए, मुश्किल लगता है.
इसलिए जनता को ही जागना होगा. नगद राशि के स्थान पर रोजगार माँगना होगा. किये गये कामों का ब्यौरा माँगना होगा.
सन 2017 की बात है।
यूरोपियन सिविल एविएशन अथॉरिटी ने एक नियम सख्ती से लागू किया। कहा कि पायलटों के लिए साल में सिर्फ 900 घंटे फ्लाइंग लिमिट रहेगी।
आयरिश एयरलाइंस रेयान एयर को भी आदेश मिला। उसने एक गलती कर दी। नया ड्यूटी रोस्टर बनाना था-अप्रैल से मार्च का (फाइनांशियल ईयर) बना दिया जनवरी-दिसंबर, याने कैलेंडर ईयर का।
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कैलेंडर वर्ष बदलते ही गलत ड्यूटी रोस्टर वाले पायलट फ्लाई नहीं कर सके। 2,100 उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। करीब 3,15,000 यात्री प्रभावित हुए।
संकट रोल-ओवर होकर इतना बड़ा हो गया कि अगले कुछ हफ्तों में 18,000 और उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। तो क्या किया EU रेगुलेटर्स ने?क्या नियम से चटपट छूट दे दी?
जा रेयान एयर!!
जी ले अपनी जिंदगी??
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नहीं। EU की सरकारों और रेगुलेटर्स ने तुरंत एक्शन लिया। EU261 रेगुलेशन के तहत हर प्रभावित यात्री को €250 से €600 (लगभग ₹22,500 से ₹54,000) तक का नकद मुआवजा (जुर्माना) अनिवार्य था, फ्लाइट की दूरी के आधार पर।
इसके अलावा रिफंड, वैकल्पिक उड़ानें, भोजन, होटल और संचार सुविधाएं प्रदान करनी पड़ीं। कंपनी को “रीजनेबल” आउट-ऑफ-पॉकेट खर्चे भी रीइंबर्स करने पड़े।
कुल मुआवजे का बोझ €50 मिलियन (लगभग ₹450 करोड़) से ज्यादा था, जिसमें कैंसलेशन का सीधा खर्च €22 मिलियन और स्टॉक वैल्यू में €320 मिलियन की गिरावट शामिल थी।
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मामला केवल सरकारी एक्शन तक सीमित न रहा।
कंज्यूमर कानून इतने तगड़े हैं कि अदालतों में कई क्लास एक्शन (समूहों द्वारा दायर केस) हुए। EU कमीशन ने जांच कराई। कंपनी पर जबरदस्त दबाव पड़ा।
सबक गहरा था।
लापरवाही महंगी पड़ेगी। तुम्हारा कॉर्पोरेट अहंकार कानूनों के आगे नहीं टिक सकता।
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IndiGo संकट भी लगभग ऐसा ही है।
यहाँ तो नियम पालन के लिए 2 साल का समय मिला था। लेकिन कंपनी निश्चिंत हो गई। न रोस्टर बनाया, न पायलट हायर किए। बस फ्लाइट कैंसिल कर दी।
अव्यवस्था से घबराई सरकार ने तुरंत नियम ही सस्पेंड कर दिया। IndiGo का 60%+ मार्केट शेयर उसे इतनी हिम्मत देता है कि अमृतकाल में, घर में घुसकर मारने वाली सरकार को ठेंगे पर रखती है।
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यूँ तो भारत में कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट से क्लास एक्शन संभव है। लेकिन केस बरसों चलेगा। यात्रियों को जानकारी नहीं, लड़ने की इच्छा नहीं।
रिफंड को जाने दो – “मेरा लगेज ही लौटा दो”
रोते हुए यात्री कातर पुकार कर रहे हैं,
और सुनने वाला कोई नहीं। रेयान एयर केस में CEO माइकल ओ’लेरी को सार्वजनिक माफी मांगनी पड़ी। यहाँ छोटे-छोटे बैगेज हैंडलर और काउंटर स्टाफ गालियाँ सुन रहे हैं।और मालिकान कहीं ढिठाई से बैठे हँस रहे हैं।
वे निश्चिंत हैं कि उनका बाल भी बाँका नहीं होगा।
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यूरोप में सरकारें यात्री-केंद्रित रेगुलेशंस (EU261) से एयरलाइंस को जवाबदेह बनाती हैं, जबकि भारत में मोनोपॉली मॉडल आम आदमी को लूटता है।
परेशान करता है और ठठाकर हँसता है।
यह मोनोपॉली हर सेक्टर में खड़ी हो गई है। स्टील, माइनिंग, पावर, एविएशन, टेलिफोनी, ट्रांसपोर्ट, पेट्रोलियम – हर जगह एक-दो हाथों में आपकी जिंदगी अटकी है।
वे जब चाहें, आम आदमी का टेंटुआ दबा दें। याद है कोविड वैक्सीन के लिए तमाम बड़े बड़े मुख्यमंत्री, अडार पूनावाला के सामने कैसे गिड़गिड़ा रहे थे?
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ऐसी समस्याएं दूसरे कारणों से भी आ सकती है। 2017 में ब्रिटिश एयरवेज के आईटी मेल्टडाउन से 800 उड़ानें रद्द हुईं। 2025 में केएलएम ने 2,760 उड़ानें कैंसिल कीं। कोविड में पूरा यूरोपीय एविएशन ठप हो गया था।
पर EU ने हर बार यात्री की राहत को पहले रखा। वैकल्पिक ट्रांसपोर्ट, होटल, एयरपोर्ट पर फ़ूड, और हेल्पसेन्टर्स। पॉलिसी चेंजेस किये। 2022 में तो पूरा ‘कंटिंजेंसी प्लान फॉर ट्रांसपोर्ट’ ही बना दिया।
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यहाँ भारत में स्किल, स्केल, स्पीड, विश्वगुरु, अमृतकाल, 5 ट्रिलियन इकॉनमी का जाप करने वाले इस हड़कंप को IndiGo का घरेलू मामला मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे हैं।
हालात देखकर राहत इंदौरी का शेर याद आता है –
अड़े थे ज़िद पर कि सूरज बनाके छोड़ेंगे
पसीने छूट गए एक दीया जलाने में।
#अबकी_बार_बेबस_सरकार
लेसन्स फ्रॉम जोहराम ममदानी..
न्यूयॉर्क की ठंडी हवा में एक आम अमेरिकन खड़ा है। सामान्य वस्त्रभूषा, खिला हुआ दोस्ताना मुखमंडल। कंधे पर बैग, हाथ मे चोंगा माइक.. 34 साल के जोहरान की शुरआत ऐसे ही हुई।
उसकी बातें- मकानों का किराया कैसे कम हो, मेट्रो कैसे दौड़े, पुलिस कैसे इंसाफ़ करे। गरीबो, बूढों, कामगारों की सामाजिक सुरक्षा कैसे मजबूत हो।
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उसकी पहचान उछाली जाती है- मुस्लिम है, इमिग्रेंट है, उसकी पत्नी सीरियाई है। खुद गुजराती है, जो युगांडा में जन्मा, 8 साल की उम्र में न्यूयार्क आया।
उसे आतंकवादी, रेडिकल, वामपन्थी कहा गया। खुद राष्ट्रपति ने जहर उगला। रिपोर्टरों ने उस पर फिलिस्तीन का प्रश्न फेंका।जोहरान ने इंसानी हक़ की ज़ुबान में जवाब दिया।
मंच पर मुट्ठी भांज “अल्लाहु अकबर” नहीं कहा।
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असम में तरुण गोगोई की सरकार है। अचानक चाय बागानों के बीच बदरुद्दीन अजमल खड़े होते हैं। टोपी सिर पर, मुस्लिम वेशभूषा, माइक थामे कहते हैं-
"मुस्लिम मुख्यमंत्री चाहिए"
तमाम मस्जिदों में दुआएँ, वोटों की अपील। अजमल का दल सिर्फ मुस्लिम क्षेत्रो में उतरता है। 2011 में 18 विधायक जीतते हैं। लगता है, अब आवाज़ बुलंद होगी।
कि तभी हेमंता बिस्वाशर्मा चीखते है- घुसपैठिए, हिंदू खतरे में, मुसलमानो की सरकार। अब हिंदू एकजुट होते हैं। बीजेपी सत्ता में है। NRC, और तमाम वे फैसले जो मुसलमानो को तंग करें, और हिन्दुओ को परपीड़ा का सुख दें।
पहचान और धर्म की राजनीति से अजमल की छोटी जीत पाई। लेकिन बड़ा खेल पलट दिया। आगे अजमल हारते हैं- रिकार्ड दस लाख वोटों से।
अपने समाज के हित को स्थाई डेमेज देकर।
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चारमीनार से कुछ दूर, असदुद्दीन ओवैसी खड़े हैं। सूट बूट, दाढ़ी तराशी हुई। संविधान और रोजगार की भाषा, लेकिन छोटा भाई 5 मिनट पुलिस हटा लेने की चुनौती देता है।
ओवैसी मुस्लिम इलाक़ों में लड़ते हैं। इसके बाहर वे “जय भीम, जय मीम” कहते हैं। तो हैदराबाद में जीत जाते हैं, लेकिन बाहर सन्नाटा है।
कभी बिहार महाराष्ट्र में कुछ मिला, तो फिर हाथ से निकल गया। इस बीच वे काम उनका बना गए, जो जमकर मुसलमानो के अहित की राजनीति करते हैं।
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न्यूयॉर्क में मुसलमान 3% हैं। असम में 34, हैदराबाद में 50% के करीब। पर आँकड़े बेमानी हैं। ज़ोहरान जीतते हैं, अजमल हारते हैं। ओवैसी मझधार में हैं।
ज़ोहरान को यहूदी, हिस्पैनिक, ब्लैक वोट मिला। वो खुद को डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट कहते हैं। वे हाउसिंग पर बोले, स्कूल पर बोले।
इस्लामोफोबिया और “ला इलाहा इल्लल्लाह” का मंत्र फूंका होता, तो फॉक्स न्यूज़ हेडलाइन बनाती, वोटर भाग जाता।
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ज़ोहरान ने जो किया, वो सबसे मुश्किल नहीं था। मस्जिद गए, नमाज़ पढ़ी, लेकिन कैंपेन में नमाज़ नहीं दिखाई। इस्लाम पहचान था, जिससे वे पीछे नही हटे।
पर इस्लाम, मुसलमान उनका एजेंडा नहीं थे। वे प्रोग्रेसिव यहूदियों से गले मिले। सबके हक की बात की। उनकी हंसी जबसे घातक हथियार थी। उनकी पार्टी DSA थी—आर्थिक न्याय की।
यहाँ अजमल ने गुस्सा बेचा। उनक जमीयत उल उलेमा ए हिन्द ने असम के मुस्लिमो का बेड़ा गर्क कर दिया।
ओवैसी सेकुलरिज्म की जबान बोलते हैं। लेकिन उनकी पार्टी का नाम ही “मजलिस- ए- इत्तेहादुल मुस्लिमीन” है।
उनका एजेंडा, मुसलमान की पहचान है।
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दुनिया जीतने के लिए, पहले अपनी दीवारें तोड़नी होती हैं। कभी नेहरू ने मुस्लिन कॉन्फ्रेंस का नाम बदलकर नेशनल कांफ्रेंस रखने सुझाव दिया। शेख अब्दुल्ला ने माना।
आज वह सेक्युलर पहचान की दल है। तमाम हिन्दूओ ने उसे 1935 से आज तक पाला है। दरअसल लोकतंत्र में बहुसंख्यक को डर बेचने की छूट है। लेकिन अल्पसंख्यक को स्वीकार्यता के लिए हमेशा प्यार बेचना पड़ता है।
इंसानियत का बड़ा दायरा लेना पड़ता है।
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लेकिन मेरी पोस्ट अजमल या ओवैसी के लिए नही। उन प्रतिभावान मुस्लिम युवाओं के लिए है जो राजनीतिक आकांक्षा रखते हैं। देश की 20 करोड़ आबादी में हजारों जोहरान है।
इस देश को उनकी जरूरत है।
लेकिन अलग दल, ठेठ धार्मिक पहचान, बाहुबल की राह उन्हें थोड़ी दूर ही ले जाएगी। उनकी उतनी सी यात्रा ही पूरे अल्पसंख्यक समाज के लिए घातक होगी।
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सार्वजनिक जीवन मे उतरने के पहले उन्हें याद रखना चाहिए। दुनिया जीतने के लिए पहले अपनी दीवार तोड़िये। आप अगर अल्पसंख्यक हैं, तो ज़ोहरान ही बनना पड़ेगा।
अफसोस, बहुसंख्यक को मोदी बनने की इजाज़त है।