अरे भाई ! सब न सही, क्या भगवान् भी अपने शरणगतोंकी रक्षा नहीं करते ? ऐसी स्थितिमें बुद्धिमान् लोग भी धनके नशेमें चूर घमंडी धनियोंकी चापलूसी क्यों करते हैं ? ॥
अर्थात्
पहननेको क्या रास्तोंमें चिथड़े नहीं हैं ? भूख लगनेपर दूसरोंके लिये ही शरीर धारण करनेवाले वृक्ष क्या फल-फूलकी भिक्षा नहीं देते ? जल चाहनेवालोंके लिये नदियाँ क्या बिलकुल सूख गयी हैं ? रहनेके लिये क्या पहाड़ोंकी गुफाएँ बंद कर दी गयी हैं ?
@profalokkumar@IIM_Calcutta It is a matter of pride and honor for us. Surely, an atmosphere brimming with vibrant energy is being transmitted there. Even while being here, we can feel the positive vibrations of that gathering. Congratulations to you once again and again.
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@LUMBA_Lucknow@profalokkumar@dswlkouniv न रत्नमन्विष्यति मृग्यते हि तत्।।
Diamonds and other gems are never in search of buyers; rather, it is the buyers who seek them out.
-Kumarsambhav, Kalidas
कार्यार्थी भजते लोकं यावत् कार्यं न सिद्धति!
उत्तीर्णे च परे पारे नौकायां किं प्रयोजनम् !!
अर्थात् : जिस तरह नदी पार करने के बाद लोग नाव को भूल जाते हैं ठीक उसी तरह से लोग अपने काम पूरा होने तक दूसरों की प्रसंशा करते हैं और काम पूरा हो जाने के बाद दूसरे व्यक्ति को भूल जाते हैं।
नैवार्थेन न कामेन विक्रमेण न चाज्ञया।
शक्या दैवगतिर्लोके निवर्तयितुमुद्यता।।
अर्थात् इस संसार में ईश्वरीय विधान को न तो धन से, न इच्छा-शक्ति से, न पराक्रम से, और न ही राजाज्ञा से बदला जा सकता है।
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रामायणम् ६.११३.२५
यशो यशस्विनां शुद्धं श्लाघ्या ये गुणिनां गुणाः।
लोभः स्वल्पोऽपि तान् हन्ति श्वित्रो रूपमिवेप्सितम्॥
अर्थात्
जैसे थोड़ासा भी कोढ़ सर्वांगसुन्दर स्वरूपको बिगाड़ देता है, वैसे ही तनिक-सा भी लोभ यशस्वियोंके शुद्ध यश और गुणियोंके प्रशंसनीय गुणोंपर पानी फेर देता है॥
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भागवत ११.२३.१६
शास्ता विष्णुरशेषस्य जगतो यो हृदि स्थितः ।
तमृते परमात्मानं तात ! कः केन शास्यते ।।
सम्पूर्ण जगत् के हृदय में विद्यमान भगवान् विष्णु ही सबके उपदेष्टा हैं; उन परमात्मा को छोड़कर कौन किसी को कुछ सिखा सकता है ?
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विष्णुपुराणम्
पश्यामि धनिनां क्लेशं लुब्धानामजितात्मनाम् । भयादलब्धनिद्राणां सर्वतोऽभिविशङ्किनाम् ॥
लोभी और इन्द्रियों के वशमें रहने वाले धनियों का दुःख तो मैं देखता ही रहता हूँ। भयके मारे उन्हें नींद नहीं आती। सबपर उनका सन्देह बना रहता है ॥
श्रीमद्भागवत ७.१३.३१
बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।
जिसने स्वयं से स्वयं को जीत लिया है, उसके लिये स्वयं ही अपना बन्धु है और जिसने स्वयं को नहीं जीता है, वह स्वयं स्वयं के लिए शत्रु की तरह बर्ताव करता है।
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गीता ६.६
सत्यं मनोरमा रामाः सत्यं रम्या विभूतयः।
किन्तु मत्ताङ्गनापाङ्गभङ्गलोलं हि जीवितम्।।
It is true that worldly pleasures and opulence are very beautiful. But all these are as fleeting as the blink of an eye of a passionate, doe-eyed woman.
@profalokkumar मनसा चिन्तितं कर्म वचसा न प्रकाशयेत्।
अन्यलक्षितकार्यस्य यतः सिद्धिर्न जायते॥
The work that is conceived in the mind should not be spoken out. Because the accomplishment of the work is hindered when it is revealed to others.
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Chānakya nīti.
@profalokkumar Just as Charaka's contributions to the field of medicine in India are significant, so too are Abu Ali Ibn Sina's contributions in the Central Asian region.