@AshutoshRanka जंतर मंतर चले जाओ अगर आदमी हो तो।
वहां भी इ��ी देश के नागरिक बैठे हैं धरने पर, और हां वो जुनैद की भी लेते जाना खाने की व्यवस्था के लिए।
जल्दी करो वरना दोगले कहे जाओगे।
आप सबने एक चीज नोटिस की ���ै? पेपर लीक के खिलाफ जब जंतर मंतर पर आंदोलन और प्रदर्शन हुआ था तो बहुत सारे नेता उसके समर्थन में थे, विपक्ष भी सरकार को घेर रहा था लेकिन यहां विपक्ष सहित सभी नेता असमंजस में हैं कि विरोध करूं या समर्थन इसीलिए सब चुप्पी साधे हैं कोई एक इकलौता नेता आरक्षण के विरोध में नहीं बोल रहा है, और न ही इस आंदोलन को समर्थन कर रहा है।
#21AugReservationHataoAndolan
कहां हो सभी प्रकार की मीडिया वालों?
@ravish_journo@ajitanjum@Abhinavpinch
and so on
जिस आंदोलन में समानता की बात हो रही है वहां भी पहुंचिए।
जय हिंद
जय भारत।
@meevkt जिस dm को बारिश और जलभराव नहीं दिखाई पड़ता है, वो आने से रहे यहां।
एक भी दिन रेनी डे नहीं किया dm ने lko में जबकि कई बार स्कूल टाइम पर मूसलाधार बारिश तक हुई।
जिस देश का जुवा, पीएचडी करने के बाद, कांस्टेबल और चपरासी का फॉर्म भरता है, और कहता है कि “नौकरी” नहीं मिल रही है।
उस देश का युवा, AI या डेटा माइनिंग, या डेटा एनालसिस जैसे गंभीर विषयों पर काम कर पाएगा?
और क्रिएटिविटी का तो यह हाल है कि हमारा पूरा सिनेमा कॉपी पेस्ट है। और साहित्य व पत्रकारिता तो फलाने-फलाने दादा के अनुसार ही सही मानी जाती है।
रील पर ही देखिए त�� माई बॉडी दिखाकर बॉलीवुडिया गानों पर नाच करने के अलावा जुवा क्या कर रहा है? क्रिएटिव म्यूजिक बनाकर कोई बीटल्स, माइकल जैक्सन, शकीरा नहीं ना बन रहा है?
और जुवा का यह हाल है कि 140 रूपया का सब्सक्रिप्शन लगाकर बिकनी पोज दिखाने के लिए, गाली बककर वायरल हुआ जा रहा है। और राजनीति में राहुल और अखिलेश हैं, जो इस���ें किराँति खोज रहे हैं।
तो जुवा कुछ कर सकता है? हमें तो नहीं लगता।
#राग_जनतंत्र
न कोई पूर्व। सूचना न पहले से कोई तैयारी। विद्यालय का आकस्मिक निरीक्षण सुबह हर घर तिरंगा। यात्रा के लिए घर से जल्दी निकलना पड़ा था। नास्ता भी नहीं किया। भूख बहुत तेज लगी थी भी,लेकिन जब स्कूल में एमडीएम देखा तो अपने आपको रोक नहीं सका। बच्चों के साथ बैठ गया, मेनू के अनुसार आज रोटी दाल बनी थी। इतना बेहतर स्वाद आया वैसा शायद ही किसी बड़े ���ोटल में मिले जब मुझे ताजारसोई का बना व्यंजन मिलता है।
तो? बरबस बचपन याद आ जाता है और इस खाने में रसोइयों की मेहनत, प्रधानाध्यापक का त्याग, किसान की मेहनत सब कुछ एक साथ शामिल होते हैं। इसलिए इसमें स्वाद कुछ अधिक होता है। कुछ लोगों को स्कूलों का एमडीएम बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। ऐसा नहीं है कि एमडीएम अच्छा नहीं बनता है, बनता है। लगभग सभी स्कूलों में अच्छा बनता है, लेकिन कुछ लोगों ने अपने चश्मे का कलर ब्लैक एंड वाइट कर लिया है, उनको लगता है क��� हम अच्छा रंगीन कुछ भी नहीं देखेंगे। जो देखेंगे गलत ही देखेंगे अगर अच्छा भी है तो उसे हम ब्लैक एंड फाइट ही देखेंगे। कुछ लोगों को लगता है कि हमारी ये व्यक्तिगत सोच की सरकारी स्कूल कमतर है या कि उन्हें कैसे बदनाम किया जाए।और अपनी सोच को सभी तक प्रेषित करना चाहते उसके लिए उन्हें सबसे आसान और सरल माध्यम स्कूल ही मिलता है, और कैसे भी करके शिक्षकों द्वारा किए जा रहे अच्छे कार्यों को कमतर साबित करना चाहिए। ��ह विद्यालय पठन पाठन के केन्द्र है है। किसी अन्य तरह की महत्वाकांक्षा को पूर्ति करने के साधन नहीं। कृपया उन गुरुओं का सम्मान करें जिन्होंने आपको पढ़ा लिखा कर इस लायक बनाया है कि आप फोटो खींच सकें। वीडियो बना सकें हां, स्कूलों में कोई कमी आपको दिखती है तो उसके सुधार के लिए आप सुझाव दे सकते हैं, सहयोग दे सकते हैं। स्कूल को मजबूत कैसे किया जाए, इस पर मनन और चिंतन कर सकते हैं, न कि पूर्वाग्रह से ग्रस���त हो करके कुछ चिन्हित वीडियो बना करके। शिक्षक समाज को बदनाम करके, मुझे तो इस सरकारी स्कूल का एमडीएम इतना अच्छा लगा कि रोटी खाने के बाद दाल बच गई थी, लेकिन उसका भी मोह नहीं छोड़ नहीं पाया और दाल को पी गया। आपको प्राथमिक स्कूल का एमडीएम कैसा लगा लगता है बताइए हमारी शिक्षा व्यवस्था में हमारे एमडीएम में कुछ कमियां होंगी तो हम सभी मिलकर से सही करेंगे। राकेश सिंह जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी आ��रा 13/8/26