In AIIMS New Delhi Medical Recruitment for Senior Resident( SR) and Senior Demonstrator(SD) Positions, shows that it is the SC,ST,OBCs who now have started taking the lead in occuping the General Seats.
You can see
Rank 1- SC
Rank 2- OBC
Rank 3- OBC
Rank 6- SC
Rank 7-SC
Rank 10- OBC
Rank 14-SC
All of them were allotted Unreserved seats.
Who hell was that who was telling Reserved category doctors dont make it in Merit?
Here it is clear that reserved doctors have swept the Merit seats.
Kahan hai merit ....
I ❤️ Ranchi
राँची शहर बहुत ही सौभाग्यशाली है. ऐसा इसलिए कि यह झारखंड की राजधानी है. मुख्यमंत्री, राज्यपाल, सभी मंत्रीगण यहीं रहते हैं. राष्ट्रीय नेताओं का आना जाना लगा रहता है.
शहर की देखभाल करने के लिए रांची नगर निगम है विभिन्न विभाग हैं, चार चार विधायकों का सेवा इस शहर को मिलता है, सांसद जो कि केंद्र में राज्य मंत्री हैं वे शहर के उत्थान के लिए अपने जान जिगर से लगे रहते हैं. तीन तीन राज्य सभा सांसद अपने पूरे फंड का अधिकांश हिस्सा इसी शहर पर न्योछावर कर देते हैं.
मनुष्य के कई र���प होते हैं लेकिन मुख्य रूप से दो रूप होते हैं, एक जो बाहर से दिखता है और एक जो अंदर से होता है. दूर से लोग बाहरी व्यक्तित्व को ही देख पाते हैं, जो करीबी होते हैं वही व्यक्ति के मूल को जानता है.
उसी तरह शहर के भी दो रूप होते हैं एक जो बाहर से दिखता है या दिखाया जाता है और दूसरा शहर के निवासी देख रहे होते हैं जो उस शहर को जीते हैं.
लोग हो बाहर से आते हैं वे देखते हैं चौड़ी सड़कें, ऊंचे ऊंचे अट्टालिकाएं, बड़े बड़े मॉल, मल्टीप्लेक्स, कई सितारा होटल्स वगैरह वगैरह.
लेकिन यहां के लोग जीते हैं टूटी गढ्ढेनुमा गलियों में. चलते हैं अतिक्रमण से भरी पतली सड़कों पर. धूल भरी हवाओं में सांस लेते है. कचरे का तो कहना ही क्या? नगर निगम शायद सबसे अधिक फंड कचरे के प्रबंधन पर खर्च करती होगी लेकिन लेकिन ही है.
पार्किंग की सुविधा तो ऐसी है कि किसी सड़क पर एक भी व���हन पार्क किया हुआ नहीं दिखता है.
हर घर जल से हरेक घर में इतना जल आ जा रहा है कि लोगों को घर में अलग से टैंक बनवाने पड़ रहे हैं. ये तो छोड़िए माननीयों ने इतने धरती में छेद कर करके टंकियां बिठाई हैं कि हरेक गली में पानी की धारा बह रही है लेकिन फिर भी यहां की जनता प्यासी ही रह जाती है.
शहर में एक मात्र हरमू नदी थी वैसे तो शहर के नक्शे पर आज भी है लेकिन बरसात के अलावा बाकी समय में ये नालों का पितामह बना ��हता है.
शिकायतें तो कई है लेकिन फिर भी
I ❤️ Ranchi
हंगामा बरपा है
बिहार में विधानसभा के चुनाव संपन्न हुए, 20 नवंबर को ��पथ ग्रहण कार्यक्रम था. मुख्यमंत्री सहित कई मंत्रियों ने शपथ ग्रहण किया. इनमें जो सबसे अधिक विवाद का विषय रहा वह उपेन्द्र कुशवाहा के पुत्र दीपक प्रकाश के शपथ ग्रहण से हुआ.
NDA गठबंधन में उपेन्द्र कुशवाहा को एक मंत्री पद मिला जिसके लिए उन्होंने अपने पुत्र दीपक प्रकाश का चयन किया. इसी विषय को लेकर बवाल मचा हुआ है कि जहां एक तरफ परिवार वाद के आरोप लग रहे हैं तो दूसरी तरफ यह कि दीपक प्रकाश किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं.
परिवारवाद से कोई भी पार्टी अछूती नहीं है शायद ही कोई पार्टी है जिसमें नेताओं के पारिवारिक सदस्य ने राजनीति में कदम न रखा हो. किसी पार्टी में कम, किसी में ज्यादा. इसके कई उदाहरण हैं. कईयों के नाम तो आप भी गिनवा सकते हैं.
बिना किसी सदन के सदस्य रहते हुए मंत्री बनना, ये भी राजनीति में असंभव नहीं है. कई बार केंद्र में भी ऐसे नेताओं को मंत्री पद दिया गया जो किसी सदन के सदस्य नहीं थ��. मंत्री तो छोड़िए मुख्यमंत्री भी कई बनाए गए या बने ��ैं. ऐसे मुख्यमंत्रियों में कई बड़े नाम रहे हैं.
झारखंड में शिबू सोरेन, उत्तर प्रदेश में त्रिभुवन नारायण सिंह, महाराष्ट्र में पृथ्वीराज चव्हाण, उद्धव ठाकरे भी बिना किसी सदन के सदस्य होते हुए मुख्यमंत्री बन गए.
एक और सिर्फ जानकारी के लिए कि गुजरात में पहली बार जब नरेंद्र मोदी जी मुख्यमंत्री बने थे तब वे भी किसी सदन के सदस्य नहीं थे.
खैर हमारा क्या है हम तो आम आदमी ठहरे. राजनेता ही देश व राज्य चलाते हैं उन्हें ही चलाना है. आम आदमी सिर्फ चर्चा, बहस में समय बर्बाद करता रहता है.
अभी-अभी एस.पी. बोकारो को इस गंभीर मामले से अवगत कराया है। मैंने सारी जानकारियां उनसे साझा कर दी है, उन्होंने आश्वस्त किया है कि @MNQUASMIMD नामक व्यक्ति, जिसने पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान का समर्थन किया और लगातार हिंदू विरोधी ज़हर फैला रहा है, उसे पकड़कर उसके खिलाफ जल्द से जल्द कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
अब मैं @JharkhandPolice से अपेक्षा करता हूँ कि इस मामले में पूरी गंभीरता से संज्ञान लें और कठोर से कठोर धाराओं में कार्रवाई सुनिश्चित करें।
यह सिर्फ एक पोस्ट नहीं, एक मानसिकता है जो भारत के लिए ख़तरा है। अब नरमी नहीं, सख्ती ज़रूरी है।
@JharkhandCMO@BokaroDc@bokaropolice@sp_bokaro
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इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान बना. विभाजन की आधी रात को पाकिस्तान से हिन्दू पलायन कर रहे थे.
एक जाति को पाकिस्तान छोड़ने से मना कर दिया गया,
भंगी.
संडास साफ करने के लिए, शौचालय साफ करने के लिए, गंदी नाली साफ करने के लिए और कूड़ा करकट उठाने के लिए भंगी, जिन्हें मेहतर भी कहा जाता है इन्हें भारत जाने से रोक दिया गया.
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कहानी मलाला यूसुफजई की नही, कहानी इकबाल मसीह की है जिसे दुनिय��� ने भुला दिया.
लेकिन हम इतिहास को खोद कर ऐसे शख्सियत को ज़िंदा करते हैं जिन्होंने दुनिया को सुंदर बनाने के लिए अपनी जाम कुर्बान कर दी.
हम उसकी कहानी लिखते हैं जिनके बारें में लिखने से ज्यादातर लोगों के हाथ कांपते हैं.
कहानी इकबाल मसीह पाकिस्तान का बाल मजदूर नेता की, जो खुद बाल था, यानी बालक.
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खाने को रोटी थी तो सब्ज़ी नही थी. चावल था तो दाल नही थी. खाने को था तो पहनने को नही था. पहनने को था तब खाने को नही था.
यह कहानी पाकिस्तान के उस हर परिवार की है जो दिहाड़ी मजदूर हैं.
बिरयानी, मटन, चिकन, पाया, ल��्सी पीना खाना तो पाकिस्तान के मध्यवर्गीय और अमीरों का खाना है.
पिता दिहाड़ी मजदूर थे और माता मोहल्ला घूम घूम कर शौचालय साफ करने का काम करती थी.
परिवार का धर्म ईसाईयत था, देवता ईसा मसीह जीसस क्राइस्ट थे. लेकिन धर्म बदलने के बावजूद जाति वही थी.
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पाकिस्तान, भारत, नेपाल और बांग्लादेश में धर्म बदलता है लेकिन जाति नही बदलती.
1986 में पिता ने कारपेट माफिया से 600 रुपया कर्ज़ लिया. यह कर्ज़ गुलामी का अंधा कुआं साबित हुआ.
छुपे हुए ब्याज की जानकारी नही थी. दो सालों में मूल और ब्याज 13,000 रुपए हो गया.
कर्ज़ चुकाने के लिए पिता ने अपने 5 साल के बेटे इकबाल मसीह को कारपेट फैक्ट्री में काम पर लगा दिया. लेकिन ये काम नही गुलामी थी.
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पांच साल के इकबाल मसीह को जंजीरों में बांधकर 15 घण्टे काम किया जाता.
वो अकेला इस जाल में नही फंसा था उसकी तरह हज़ारों लोग थे. जो कर्ज़ के जाल में फंसकर बंधुआ मजदूर बन गए थे.
10 साल का होने पर इकबाल मसीह ��ैक्टरी की दीवार से कूद कर भाग गया.
सामाजिक कार्यकर्ताओं का साथ मिला. मामला लाहौर से इस्लामाबाद और इस्लामाबाद से यूरोप और अमेरिका तक पहुंच गया.
इकबाल मसीह को बाल मजदूरी के आज़ादी का प्रतीक बनाया गया. उसने पढ़ाई लिखाई शुरू की, चार साल की पढ़ाई 2 साल में पूरी की.
अमेरिका और यूरोप में पाकिस्तान की बाल मजदूरी पर भाषण दिया और कहा मैं अब्राहम लिंकन की तरह पाकिस्तान के सभी बाल मजदूर गुलामों को आज़ा��� कराना चाहता हूँ.
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इकबाल मसीह की गूंज के बाद पाकिस्तान सरकार ने 3000 बाल मजदूरों को कारपेट फैक्टरी से आज़ाद कराया.
इकबाल मसीह वकील बनकर मानव अधिकारों के लिए काम करना चाहता था.
मलाला यूसुफजई की तरह इकबाल मसीह भी फेमस पर्सनालिटी था. उस दौर में मोबाइल नही था. सोशल मीडिया नही था, केवल अख़बार थे.
1995 में इकबाल मसीह को कारपेट माफिया गैंग ने गोली मारकर हत्या कर दी.
अपनी मौत के समय वो केवल 13 साल का था. इस खबर को पाकिस्तान के हर अखबार ने कवर किया.
उसका गुनाह केवल इतना ही था वो खुद की आज़ादी के बाद दूसरों की भी आज़ादी चाहता था.
��कबाल मसीह को पाकिस्तान ने भुला दिया. यूरोप और अमेरिका ने भुला दिया.
लेकिन हम नही भूलेंगे.
जब तक सूरज चंद रहेगा इकबाल मसीह तेरा नाम रहेगा.
Photo : इकबाल मसीह
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सम्राट असोक की छवि को धूमिल करना स��स्कृतिकरण का अहम हिस्सा है. धम्म असोक या धर्म असोक को चण्ड अशोक की अवधारणा गड़ी जा रही है.
यह काम RSS के करीबी सवर्ण इतिहासकार करने की कोशिश कर रहे हैं. एक नाटककार को चण्ड असोक पर नाटक लिखने के लिए BJP ने हिंदी साहित्य अकादमी पुरस्कार देकर सम्मानित किया.
चण्ड असोक की बुनियाद सिंहली भाषा की अनुश्रुति से ली गयी है जिसमें असोक द्वारा राजगद्दी के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या का जिक्र है.
जबकि इसका कोई ऐतिहासिक और पुरातात्विक सबूत नही है. चण्ड असोक की उपाधि का कोई प्रमाण या शिलालेख नही मिलता.
सम्राट अशोक के 99 भाई बहन नही थे. इतने भाइयों की कहानी झूठी और मिथ है.
सम्राट असोक ने स्वयं अपने पांचवे शिलालेख में अपने भाई बहनों का पूरा विवरण दिया हुआ है.
चीनी यात्री फ़ाहियान और ह्वेन त्सांग ने अपनी रचनाओं में असोक के भाई प्रेम की चर्चा की है. असोक के भाई क्यो राज्यों में गवर्नर थे.
बोधगया में ज़मी��� के नीचे मिले शिलालेख में सम्राट असोक को जम्बोद्विप का महान सम्राट बताया गया है, जिसने 84,000 स्तूप बनाए.
इनमें एक स्तूप बौद्ध गया में भी बनाया, उसी स्थान पर जहां सुजाता ने तथागत बुद्ध को खीर खिलाई थी.
अमेरिका, यूरोप, रूस, चीन और सारा एशिया सम्राट असोक को प्रियदर्शिनी सम्राट असोक कहते हैं.
RSS के मनुवादी इतिहासकारों से बिनती है सत्ता के दम पर धम्म असोक को बदनाम ना करें.
अखंड भारत का निर्माण करने व���ले महान धम्म असोक को कोटि कोटि प्रणाम 🙏
पेशे के आधार पर जाति का विभाजन किया गया है.
जिसका पेशा जितना आराम दायक, कम मेहनतकश उनकी जाति उतनी ऊंची.
जिनका पेशा श्रम उत्पादन से जुड़ा है. मेहनत अधिक लगती हो. बुद्धि के साथ बल प्रयोग ज्यादा इस्तेमाल होता है, उनकी जाति को नीचा स्थान दिया गया है.
सवर्ण परिवारों में बच्चों को बचपन से सिखाया जाता है श्रम उत्पादन से जुड़े हुए लोग नीची जाति के होते हैं.
इसी कारण चेद्दु चमार ज��से मेहनतकश व्यक्ति को अपमानित किया जाता है.
चेद्दु चमार कौन ?
जिन्होंने चमड़े का आविष्कार किया वो चमार.
जिन्होंने जूते चप्पल का आविष्कार किया.
जिन्होंने धरती का सीना चीरकर अन्न पैदा किया.
जिन्होंने अपने मेहनत और ताकत के बल पर कृषि उपज को बढ़ाया.
कौशांबी के पुलिस अधिकारी को चेद्दु चमार से माफी मांगनी चाहिए.
#ArrestSatendraTiwari
फासिस्ट विचारधारा का नायक बेनिटो मुसोलिनी को आज ही के दिन 1945 में इटली के एक गांव में गोली मारकर हत्या कर दी गयी.
दूसरे दिन उसकी लाश को मिलान शहर के चौराहे पर लाकर लटका दिया गया.
इटली की जनता ने मुसोलिनी की लाश को पत्थर मारा, किसी ने गोली मारी. किसी ने गाली दी. ऐसा करने वालों में किसी ने अपना ���ति खोया था. किसी ने अपना बेटा खोया था.
एडोल्फ हिटलर इस खबर को सुनकर दहशत में आ गया. रूसी लाल सेना बर्लिन शहर की दहलीज पर आ गयी थी.
एडोल्फ हिटलर ने अपने करीबी से कहा आत्महत्या करने के बाद मेरी लाश को जला देना. नही तो मुसोलिनी की लाश की तरह मेरी लाश का हश्र भी बुरा होगा.
30 अप्रैल 1945 को एडोल्फ हिटलर ने अपनी प्रेमिका ईवा ब्राउन के साथ आत्महत्या कर ली.
इनके अहंकार और फासिस्ट विचारधारा के कारण द्विती�� विश्वयुद्ध में 7.5 करोड़ लोग मारे गए.
इनका शासक बनना कोई चमत्कार नही, दुनिया का दुर्भाग्य था.
Photo : Benito Mussolini एंड Adolf Hitler.
आजादी के पहले भारत में 560 से अधिक छोटी और बड़ी रियासतें थीं. इनमें पड़ने वाला कुल इलाका अविभाजित भारत के क्षेत्रफल का एक तिहाई था. देश की कुल 25 फीसदी आबादी यहां रहती थी. ये रियासतें ब्रिटिश राज के अधीन थीं. इनके रक्षा और विदेश मामले ब्रिटिश सरकार देखती थी.
इन रियासतों के शासक नाममात्र के राजा थे, हालांकि, इन्हें क्षेत्रीय-स्वायत्तता प्राप्त थी. जिसकी जितनी हैसियत, उसे उतना भत्ता ब्रिटिश सरकार देती थी.
जब भारत की आजादी की तारीख तय हुई तब लार्ड माउंटबेटन ने इन रियासतों के राजाओं और नवाबों को भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ जुड़ने की खुली छूट दी.
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येही खुली छूट इन रियासतों को भारत और पाकिस्तान से जुड़ने के एवज में मोल भाव करना शुरू किया. कुछ रियासतों ने तो अपने इलाकों को लेकर स्वतंत्र राज्य का ख्वाब पाले हुए थे.
सरदार वल्लभ भाई पटेल की कूटनीति के आगे सभी रियासतें परा���्त हो गयीं. सभी रियासतों का विलय किया गया लेकिन रियासतों के इरादों को परास्त करने की कीमत चुकानी पड़ी.
भारत सरकार और रियासतों के बी�� समझौता हुआ, रक्षा की जिम्मेदारी, विदेशी मामले और संचार की व्यवस्था सरकार के अधीन होगा. 15 अगस्त से पहले लगभग सभी रियासतों ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए.
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राजाओं को अपनी रियासतों की जमीन देने के बदले सरकार ने उन्हें भारी कीमत और रियात दी.
रियासतों का ख़ज़ाना, महल और किले उनके ही अधिकार में रखे गए. यही नहीं, उन्हें किसी भी तरह का टैक्स से छूट दी गयी. और सबसे बड़ी बात उन्हें प्रिवी पर्स दिया गया. इसके तहत राजाओं को हर साल एक निश्चित रकम दी जाती थी.
राजाओं को प्रिवी पर्स की गारंटी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 291 के तहत दी गई थी. आप प्रिवी पर्स को पेंशन कह सकते हैं.
प्रिवी पर्स के अलावा राजाओं का सम्मान और पद बना रहे, इसके लिए भारत सरकार ने संविधान में अनुच्छेद 362 जोड़ा. इसके जरिए रियासतों को विशेषाधिकार और उनकी मान्यता को बनाए रखा गया.
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संविधान के अनुच्छेद 362 के तहत राष्ट्रपति ने खुद राजाओं को शासक के रूप में मान्यता दी. भले ही उनके पास कोई अधिकार या शक्ति ��हीं थी, लेकिन उन्हें उनकी पदवियां रखने की इजाजत दी गई. वे पहले की तरह ही अपने दरबार लगा सकते थे, आधिकारिक वाहन रख सकते थे और राज्यपाल की तरह गणमान्य व्यक्तियों की मेजबानी भी कर सकते थे.
राजाओं को प्रिवी पर्स में 5,000 रुपए से लेकर 26 लाख रुपए तक मिलते थे. भारत में 6 सबसे महत्वपूर्ण रियासतें हैदराबाद, मैसूर, त्रावणकोर, बड़ौदा, जयपुर और पटियाला थीं.
26 लाख रुपए की सबसे मोटी रकम मैसूर को मिलती थी. हैदराब��द को 20 लाख, त्रावणकोर और जयपुर को 18-18 लाख और पटियाला को 17 लाख रुपए मिलते थे.
102 रियासतें ऐसी थीं, जिन्हें 1 से 2 लाख रुपए के बीच की रकम दी जाती थी. देश में 83 ऐसे राजा भी थे, जिन्हें 25 हजार रुपए या उससे भी कम रुपए मिलते थे. सबसे कम 192 रुपए सौराष्ट्र के कटौदिया के राजा को मिलते थे.
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1967 के बाद प्रिवी पर्स के खिलाफ देश में आवाजें उठने लगी थीं. माना जाने लगा कि भारत सरकार प्रिवीपर्स के तौर पर जनता की भलाई पर खर्च होने वाले धन को बर्बाद कर रहा है. राजाओं के पास पहले से ही बेहिसाब धन-दौलत और संपत्ति, उस पर से उन्हें मोटा प्रिवीपर्स क्यों ?
देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं. उन्हें भी राजाओं का राजतंत्र पसंद नही था. राजाओं और नवाबों के अधिकारों को खत्म कर भारत को पूर्ण लोकतांत्रिक देश बनाना चाहती थीं.
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राजाओं और नवाबों को साफ़ क कि वे वंशवाद और सामंतवाद से बाहर निकलें.
अनुच्छेद 291 (प्रिवी पर्स) और अनुच्छेद 362 (राजाओं के अधिकार) को खत्म करने के लिए 18 म��� 1970 को इंदिरा गांधी सरकार ने संसद में बिल पेश कर दिया. बिल लोकसभा में पारित हुआ लेकिन राज्यसभा में बिल गिर गया.
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1971 में इंदिरा भारी बहुमत से चुनाव जीतकर सत्ता में लौटीं, उनकी पार्टी को 518 में से 352 सीटों पर जीत मिली.
चुनाव जीतने के बाद इंदिरा गांधी ने संविधान में 26 वां संशोधन किया. जिसके तहत अनुच्छेद 291 और 362 को संविधान से हटा दिया गया. संविधान में अनुच्छेद 363A को जोड़ा गया जिसमें ये कहा गया कि राजा���ं की मान्यता, विशेषाधिकार और प्रिवी पर्स हमेशा के लिए बंद किए जाते हैं.
प्रिवी पर्स बंद करने के विरोध में कई राजाओं ने 1971 के चुनाव में खड़े होने और नई पार्टी बनाने का फैसला किया लेकिन उन्हें ��फलता नहीं मिल पाई.
राजाओं और नवाबों ने इंदिरा गांधी मुर्दाबाद के नारे लगाए. तो दूसरी ओर करोड़ों जनता के इंदिरा गांधी जिंदाबाद के नारे लगाए.
इन नारों ने भारत से बचे खुचे राजतंत्र को उखाड़ कर फेंक दिया और पूर्ण लोकतंत्र की नींव रखी.
‘‘म���ं केवल देह नहीं
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ
पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं
मैं भी मर नहीं सकता
मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता
उलगुलान!
उलगुलान!!
उलगुलान!!!’’
भारतीय रेल का लेट होना सामान्य बात है लेकिन 10 घंटे के रास्ते के लिए 12 घंटे से अधिक का समय लेना थोड़ा चिंताजनक है वैसे हम भारतीयों के पास समय बहुत होता है 2-4 घंटे का समय कोई समय थोड़े होता है।
आदिम युग में यहूदियों ने मूसा के नेतृत्व में कुछ जंगे जीती है. मिस्र के फेरोह को पराजित कर यहूदियों को गुलामी से आज़ाद कराने की कहानी भी है.
इसके अलावा यहूदी कभी ताकतवर कौम नही ���े. प्रथम यहूदी टेम्पल को बेबीलोनियन साम्राज्य ने ध्वस्त कर दिया. द्वितीय टेम्पल को रोमन साम्राज्य ने तोड़ा.
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ईसा मसीह के समय इजरायल और यहूदियों पर रोमन साम्राज्य का शासन था. यहूदी बहुत ज्यादा अमीर भी थे, लेकिन ज्यादातर यहूदी दरिद्र और दीनहीन थे.
रोमन साम्राज्य के पतन के बाद इजराइल पर ईसाई बाईजेन्टाइन साम्राज्य का शासन स्थापित हुआ.
313 - 636 AD के बीच बाईजेन्टाइन सम्राट कांस्टेनटाइन ने इजराइल को ईसाईयों का पवित्र भूमि घोषित कर नाज़ारेथ, बेथलेम, यरूशलेम औ��� गैलिली में भव्य गिरजाघरों का निर्माण कराया.
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7वीं शताब्दी में इस्लाम का उदय हुआ. इसके बाद इजराइल का इस्लामीकरण और अरबीकरण का दौर शुरू हुआ. 15वीं शताब्दी इजराइल ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा बना.
16वीं शताब्दी में केवल 7000 यहूदी आबादी थी इजराइल में. ज्यादातर यहूदी पलायन कर यूरोप चले गए. कुछ ईसाई और मुसलमान बन गए.
मध्यकालीन यूरोप में भी यहूदियों को बीमारी और भूत प्रेत फैलाने के आरोप में जिंदा ज��ाया गया. आधुनिक युग हिटलर ने यहूदियों का नरसंहार क���या.
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1948 में इजराइल देश मिलने के बाद यहूदी सुपरपावर बने. यहूदियों को सुपरपावर विज्ञान और व्यापार ने बनाया. 17वीं शताब्दी में यहूदी व्यापार और विज्ञान पर अपनी पकड़ जमा चुके थे. 19वीं शताब्दी में यहुदी वैज्ञानिकों ने एक से बढ़कर एक आविष्कार किया.
अब 954 नोबल पुरस्कार विजेताओं में 212 केवल यहूदी थे.
प्राचीन सुपरपावर ग्रीस के पास आज ब्रेड खरीदने के पैसे नही है. साइंस और व्यापार ने यहूदियों को घातक बना दिया है.
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✍🏻Kranti Kumar