एक दिन हम सब बीत जाएंगें ..........
रह जाएगा तो हमारा जमीर ... हमारे कर्म ...
नहीं मरता है पुण्य , मरता है तो मनुष्य ...... उसकी देह ...... शायद यही धरा के कार्यान्वन के सिद्धान्तों में प्रमुख है।
अमरत्व की प्राप्ति आसान कहाँ है ...... जिसे जीता नहीं जा सकता ... पाना होता है।
आते हुए मिलें हम कि जाते हुए मिलें
जब भी मिलें किसी से मुस्कुराते हुए मिलें
कितनी अजीज होगी सबको वो मुलाक़ात
जो दिल भी दिल से हाथ मिलाते हुए मिलें
मैं ढूंढता हूं ऐसे लोगों को शहर शहर
जो मुश्किलों की खाक़ उड़ाते हुए मिलें
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वे बोले ये राजनीति है
तुम भी इसे प्यार से सह लो
हमने कहा उठाओ मस्तक
खुलकर बोलो, खुलकर कह लो
बोले इसपर राजमुकुट है
जो भी चाहे जैसे सह लो
इस गीली ज्वाला मे हम कबतक बहते
हम कबीर के वंशज चुप कैसे रहते
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@DrKumarVishwas
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लॉरेंस फ़र्लिंगहेटी के जन्मदिन पर उनकी एक कविता-
त���स आता है उस देश पर
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तरस आता है उस देश पर जहाँ लोग भेड़ें हैं
और जिन्हें उनका गड़ेरिया भटकाता है.
तरस आता है उस देश पर जिसके नेता झूठे हैं
जिसके मनीषियों को चुप करा दिया गया है
और जिसके धर्मांध वायुतरंगों पर प्रेतों की तरह मंडराते हैं.
तरस आता है उस देश पर
जो विजेताओं की प्रशंसा करने
और दबंग को नायक मानने
और ताक़त व यातना के ज़रिये
दुनिया पर राज करने की कोशिश के अलावा
कभी भी अपनी आ��ाज़ ��हीं उठाता.
तरस आता है उस देश पर जिसे
अपनी भाषा के अलावा कोई और भाषा नहीं आती
और जिसे अपनी संस्कृति को छोड़कर
किसी और संस्कृति का पता नहीं.
तरस आता है उस देश पर
पैसा जिसकी साँस है
और जो खाये-अघाये की नींद सोता है.
तरस आता है उस देश पर, आह, उन लोगों पर
जो अपने अधिकारों को ख़त्म होने देते हैं
और अपनी आज़ादी को बह जाने देते हैं.
{मेरे देश, तुम्हारे आँसू
प्यारी धरती आज़ादी की!}
– लॉरेंस फ़र्लिंगहेट�� (आफ़्टर खलील जिब्रान, 2007)
अनुवाद : @pkray11