ज़िंदगी का सबब उदासी को
लोग कहते हैं अब उदासी को
बस हटा दीजिए ख़ुशी का नक़ाब
देख पाएँगे सब उदासी को
हम नहीं कह सके मगर इरफ़ान
तुमने पहना ग़ज़ब उदासी को
@kavishala@Kavishala_Hindi
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लबालब भर दिया जाए ये प्याला
बिना दौलत कोई ममनूँ न गुज़रे
नहीं देखा है यानी तुम ने सूरज
तुम्हारी आँख से जुगनूँ न गुज़रे
ये आईना इशारा कर रहा है
मिरे लब से भी अब हाँ-हूँ न गुज़रे
@kavitaaGhar@kavishala@prakhyatsahitya@thepoetichouse
दिलों की दास्ताँ से यूँ न गुज़रे
गली से इश्क़ की मजनूँ न गुज़रे
यही अफ़्सोस है दीवानगी में
गुज़र जाने की हद से क्यूँ न गुज़रे
तो क्या हो जो रवाँ हो सिर्फ़ पानी
मुसलसल ही रगों से ख़ूँ न गुज़रे
I am not surprised. I am angry. This is exactly what happened in Hitler's Germany. Fascism is unfolding before our eyes.
The Anand Niketan School in Ahmedabad, Gujarat was fined ₹10,000 by authorities for keeping books like Anne Frank’s The Diary of a Young Girl and Malala Yousafzai’s I Am Malala in its library. These books were "optional". They also terminated the services of a curriculum consultant.
Ahmedabad citizens decided to read books in public to protest against this action. BJP/RSS goons attacked in large numbers. The police has refused to register an FIR.
नहीं चेहरा नहीं आईना पहन कर निकले
उससे कहना यही आइंदा पहन कर निकले
असलियत उसकी नज़र आएगी कहना उससे
जब भी लोगों से मिले पर्दा पहनकर निकले
इतनी कमज़ोर थी बीनाई कि हम-साया लोग
एक-दूजे की तरफ चश्मा पहनकर निकले
हयात-ए-ग़म उठाना चाहते हैं
मगर कुछ कम उठाना चाहते हैं
इजाजत दीजिए कि उँगली उट्ठे
नजर पैहम उठाना चाहते हैं
पलक की कोशिशें जारी हैं अपनी
गिरे शबनम उठाना चाहते हैं
बस एक याद लगी है उदास होने में
और एक चोट मुझे बद-हवास होने में
तमाम दुनिया को पाने से कुछ ज़ियादा ही
सुकून है जो तेरे आसपास होने में
लगेगी उम्र बदन जाँचने परखने में
अभी तो वक्त लगेगा लिबास होने में
बोलती है कमाल पर दुनिया
चुप है मेरे सवाल पर दुनिया
छोड़ देनी थी फूँक देना था
एक तेरे मलाल पर दुनिया
सोच कर मुस्कुराना पड़ता है
जब भी रोती है हाल पर दुनिया
नाम पढ़ते हैं लोग ओहदे से
जात लिखती है खाल पर दुनिया
धूप में होती हुई बरसात से वाकिफ़ थे हम
जब किसी के दिन किसी की रात से वाक़िफ़ थे हम
दर्द आँसू ग़म परेशानी मसाइल हादसे
आप के और इश्क़ के सौगात से वाक़िफ़ थे हम
जिस तरह माँगी गई थी दी गई है जिस तरह
साफ लगता है मदद है ही नहीं एहसान है
तीस का होकर समझ आया है जीवन का गणित
साँस लेना जीने से कुछ सौ गुना आसान है
बोझ कम था इसलिए इक भीड़ से आगे हूँ मैं
इक बदन है रूह है इक और कुछ सामान है