धर्म से ज़्यादा मुक्तिप्रद कुछ नहीं और धर्म से बड़ा बंधन भी कुछ नहीं
समझे बिना बस कर्मकांड निभाना, क्या यही धर्म है? धर्म न तो जानने की, न समझने की इच्छा बची है, लोग बस दायित्व निभाते चले जा रहे हैं।
बिना समझे पूजा पाठ करने का ही नतीजा है कि अब एक पीढ़ी कहती है, “इन चीज़ों का कोई अर्थ नहीं, इसलिए हमें ये करने ही नहीं चाहिए।” न पूजा, न प्रार्थना, न भजन कीर्तन, इस पीढ़ी को दोष नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उन्होंने अपने माता पिता, अपने घर में यही देखा है कि बिना समझे बस रीति निभाई जा रही है। धर्म से बड़ी कोई मुक्ति नहीं, और धर्म से बड़ा कोई बंधन भी नहीं, अफ़सोस की बात है कि हमने धर्म को ही बंधन बना डाला है।
बेचैन युवा की भटकती जवानी - पहुँचना कहाँ है?
- हम जितना पा लेते हैं, बेचैनी उतनी कम क्यों नहीं होती?
- अच्छी नौकरी, अच्छा घर, फिर भी अंदर की खाली जगह भर पाती है क्या?
- हमारी पसंद, हमारे सपने, क्या यह सच में हमारे अपने हैं?
आज ही गीता मिशन से जुड़ें। ⬇️
https://t.co/OLVaf79jZM