मैं कोई ख़्वाब देखूं
वो टूटे न
ऐसे कैसे
मैं किसी का हाथ पकड़ूं
वो छूटे न
ऐसे कैसे
ये क्रम ठीक
वैसे ही चलता है
जैसे
पहाड़ों से छूटती हैं
नदियां
जैसे
पेड़ों से टूटते हैं
पत्ते
जैसे
आसमानों से टूटते हैं
तारे
इस छूटने और टूटने
के क्रम में
मेरा स्थायी होना
नियत है
बाँकि सब नियति
आंखों की बात मैं लफ़्ज़ों से कह नहीं सकता
राज अब कुछ भी हो मैं छुपा नहीं सकता
मंज़िल मिले न मिले, ये मुक़द्दर की बात है,
लेकिन मैं अपना रास्ता बदल नहीं सकता
___Askrit Tripathi
तुम जाओगे भी तो रोकेंगे नहीं
हाथ छोड़ेंगे लेकिन साथ छोड़ेंगे नहीं
अब मुकद्दर में लिखा है बिछड़ना तो बिछड़ेगें
वरना सोचा तो नहीं था इस क़दर बिछड़ेगें हम
__Askrit Tripathi