भला ये कौन से मुँह से ख़ुदा से माँगते हैं,
दुहाई है कि लुटेरे ख़ुदा से माँगते हैं!!
हमारी मुफ़लिसी पर तंज़ मत करो लोगों,
हमे सिखाओ कि कैसे ख़ुदा से माँगते है!!
तहो में मछलियाँ बच्चों की खैर चाहतीं हैं,
तो सहिलों पे मछेरे ख़ुदा से माँगते हैं !!
हमारी बेटीयों का ज़र्फ़ देख ले दुनियाँ,
हम उनके सामने बेटे ख़ुदा से माँगते हैं!!
~ अहमद सलीम रफ़ी
क्या हम अपराध को आंकड़ों से परखते हैं या सुर्खियों से ?
हाल के दिनों में पत्नी द्वारा पति की हत्या और मंगेतर द्वारा अपने साथी की हत्या के कुछ मामलों ने सोशल मीडिया और मुख्यधारा की मीडिया में असाधारण जगह बनाई। कई दिनों तक ऐसा लगा मानो अपराध की दुनिया में इससे बड़ी कोई ख़बर ही नहीं है।
हत्या जघन्य अपराध है। जिसने भी यह अपराध किया है, उसे कानून के अनुसार कठोर दंड मिलना चाहिए।
लेकिन इन घटनाओं के बीच एक सवाल भी उठता है -
क्या ऐसा माहौल नहीं बन रहा है कि लड़कियाँ ही खलनायक हैं और अब हर पुरुष को उनसे सावधान रहने की आवश्यकता है?
यदि हम व्यापक तस्वीर देखें, तो पिछले एक वर्ष में अकेले झालावाड़ में पति द्वारा पत्नी की हत्या के 5 प्रकरण दर्ज हुए। इसके विपरीत, पत्नी द्वारा पति की हत्या का एक भी मामला सामने नहीं आया। देश के अधिकांश हिस्सों में भी गंभीर हिंसा के आँकड़े महिलाओं के विरुद्ध कमोबेश ठीक ऐसे ही हैं ।
फिर ऐसा क्यों है कि पति द्वारा पत्नी की हत्या सामान्य चर्चा का विषय नहीं बनती, जबकि इसके उलट होने वाली घटनाएँ कई दिनों तक सार्वजनिक विमर्श पर छाई रहती हैं?
इसका एक कारण मनोविज्ञान का Availability Heuristic है। जब किसी दुर्लभ घटना को लगातार, भावनात्मक और व्यापक तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, तो वह वास्तविकता से कहीं अधिक गंभीर प्रतीत होने लगती है।
दूसरा कारण यह हो सकता है कि समाज महिलाओं के विरुद्ध होने वाली हिंसा का इतना अभ्यस्त हो चुका है कि वह कई बार उतनी चर्चा नहीं बटोर पाती, जबकि इसके विपरीत होने वाली घटनाएँ असामान्य होने के कारण अधिक ध्यान आकर्षित करती हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि पुरुष पीड़ित नहीं हो सकते। वे भी होते हैं, और उनके साथ होने वाले अपराध भी उतनी ही गंभीरता से लिए जाने चाहिए।
लेकिन सार्वजनिक विमर्श का आधार अपवाद नहीं, बल्कि व्यापक वास्तविकता होनी चाहिए।
जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया है, उनका दुख समान रूप से गहरा है। हर आरोपी को कानून के अनुसार कठोर सज़ा मिलनी चाहिए।
साथ ही, हमें उन महिलाओं की पीड़ा को भी उतनी ही जगह देनी चाहिए जो प्रतिदिन घरेलू हिंसा, दहेज, उत्पीड़न और हत्या जैसे अपराधों का सामना करती हैं।
घूंघट के इतिहास की बात आई है तो बता दूं कि मैं सहमत हूं इस बात से कि हिंदु महिलाओं ने बहुत कुछ झेला है और मज़बूरी में उन्हें घूंघट रखना पड़ा, घूंघट कभी सनातन संस्कृति का हिस्सा नहीं था। अब चूंकि वो मजबूरियां उन मुगल आक्रांताओं के साथ ही ख़त्म हो चुकी हैं तो अब भी उस मजबूरी को शान, मर्यादा, संस्कार का तमगा दे कर क्यों ढोते रहना? कोई महिला अपनी मर्ज़ी से फ़ैशन या सौन्दर्य बोध के चलते इसे प्रयोग कर रही है तो ठीक है लेकिन ये सभ्यता, मर्यादा, शान, संस्कार वाला दवाब बनाना तुच्छ मानसिकता है।
अब बात करते हैं बुरके की...
ज़रा सोचो, जो पुरुष अपनी स्त्री से मर्यादा, संस्कार, शान के नाम पर घूंघट निकलवाना चाहता है और पराई स्त्री को बिना बुरके देखना चाहता है उसके संस्कार कितने निम्न स्तरीय होंगे? पराई स्त्री के हुस्न के दीदार की आग लगी पड़ी है और ख़ुद वाली को ढकना मर्यादा है? फिर क्या फ़र्क बचा उन वहशी मुगल आक्रांताओं में और आप में? वो भी तो यही करते थे, ख़ुद की औरतों को ढक कर रखते थे और हिंदू महिलाओं पर बुरी नजर रखते थे। यक़ीन मानिए आप घूंघट को शान और बुरके को गलत समझते हैं तो आप बिल्कुल उन्हीं दरिंदों की राह पर हैं... मुबारक हो।
अच्छी पहल है...वैसे देना भी नहीं चाहिए..!!
कल से पूरे राजस्थान में CASH में भीख देना बंद।
भिखारियों को (भोजन + पानी+ कपड़े या जरुरत का सामान) जरूर दें, लेकिन एक भी रुपया कैश नहीं दे ।
पूरे राजस्थान में इस तरह का एक अलग आंदोलन शुरू हुआ हो, चाहे किसी भी प्रकार का भिखारी हो।
और यह आंदोलन बिल्कुल सही है।
चाहे कोई भी (महिला / पुरुष / वृद्ध / दिव्यांग / बच्चा) भीख मांग रहा हो, हम पैसे की बजाय (भोजन + पानी) देंगे, लेकिन आज से पैसे की भीख नहीं देंगे।
इसका परिणाम यह होगा कि अंतरराष्ट्रीय / राष्ट्रीय / राज्य स्तर पर सक्रिय ‘भिखारी’ गिरोह टूट जाएंगे और छोटे बच्चों का अपहरण अपने आप बंद हो जाएगा। अपराध की दुनिया में सक्रिय ऐसे गिरोहों का अंत होगा।
कृपया एक भी रुपया भिखारी को न दें।
अगर बहुत दया आती हो तो गाड़ी में 2 बिस्किट के पैकेट रखें, लेकिन पैसे न दें। 🙏
यदि आप इस अभियान से सहमत हैं तो यह विचार कम से कम 10 लोगों को और कम से कम अगले 3 ग्रुप्स में जरूर भेजें।
विचार अच्छा लगे तो आगे जरूर भेजें। 🙏🏻
" सार्थक परिणाम मिलने से पहले, कोशिशों ने बहुत ताने सुने हैं।
रास्ते में पड़ा हर पत्थर हमें रोकने के लिए नहीं होता—
कभी-कभी वो हमारी सहनशक्ति की परीक्षा भी होता है।"
लोगों का उपहास, आलोचना, अपमान…
ये सब उस प्रक्रिया का हिस्सा हैं,
जिससे गुज़र कर ही कोई इंसान कच्चे को अनुभव में,
और अनुभव को सफलता में बदलता है।
नदी हो या अभ्यर्थी—
जब तक मंज़िल न मिले,
दुनिया कंकर-पत्थर मारती रहती है।
लेकिन याद रखो—
पत्थर गिरने से नदी रुकती नहीं,
बल्कि और तेज़ बहती है।
इसलिए,
_जितने ताने मिलें, उतनी ही गहराई से मुस्कुराओ...
हर व्यंग्य को ईंधन बना दो…_
और शांत मन से आगे बढ़ते रहो।
क्योंकि दुनिया पत्थर उन्हीं पर फेंकती है
जो रास्ते में खड़े होकर पहाड़ बन चुके होते हैं।
डॉ. धीर सिंह धाभाई
https://t.co/WnREH0xitJ
#psychology
*अपनी कीमत किसी और की नज़रों से मत तौलो”*
कल RAS का परिणाम आया है
और बहुत से लोग दूसरों की फोटो, उनके नाम और रिश्तेदारी दिखाकर
यह जताने में लगे हैं कि — “वो हमारे रिश्तेदार हैं…”
भले इससे कुछ क्षणों के लिए मन को सुकून मिले,
पर सच्चाई यह है —
रिश्ते हमेशा बराबरी या अपने से अधिक शक्तिशाली लोगों से ही बनाए जाते हैं।
यह समाज व्यक्ति की नहीं, पद की पूजा करता है।
जब तक तुम समान स्थिति में नहीं पहुँचते,
वही लोग जो कभी तुम्हें पहचानते तक नहीं थे,
तुम्हारे संघर्ष को भी अनदेखा कर देते हैं।
पर जैसे ही तुम सफल हो जाते हो,
सबसे पहले वही कहते हैं —
“वो तो हमारे अपने हैं…”
🌿
प्रिय अभ्यर्थियों,
दूसरों की सफलता पर ताली बजाने में बुरा कुछ नहीं,
पर अगर उसी में तुम्हारा समय और आत्मविश्वास चला जाए —
तो वह तुम्हारे सपनों के साथ अन्याय है।
यह समय किसी और की तस्वीर लगाने का नहीं,
अपने भविष्य की रूपरेखा गढ़ने का है।
समाज हमेशा परिणाम देखता है,
पर जीवन परिणाम से नहीं, प्रक्रिया से बदलता है।
आज जो सफल हुए हैं,
वो भी कभी तुम्हारी ही तरह थके, गिरे, रोए थे —
पर उन्होंने हार नहीं मानी, बस चलते रहे।
और यही निरंतरता उन्हें वहाँ ले गई,
जहाँ पहुँचना तुम भी चाहते हो।
इसलिए आज से एक संकल्प लो —
“मैं किसी और की सफलता से नहीं,
अपनी तैयारी से प्रेरणा लूँगा।
क्योंकि असली सम्मान वही है,
जो मैं खुद अपनी मेहनत से अर्जित करूँ।”
🌿
अपनी तुलना मत करो, निर्माण करो।
क्योंकि जिस दिन तुम खड़े हो जाओगे,
दुनिया खुद तुम्हें पहचानने दौड़ेगी।
वही लोग, जो आज मौन हैं —
कल तुम्हारे सम्मान में खड़े होंगे।
✍️ डॉ. धीर सिंह धाभाई
🔗 https://t.co/WnREH0xitJ
#ras #result
*हर मोड़ एक नया जन्म है”*
हर अधूरी इच्छा, किसी बड़ी प्राप्ति की तैयारी होती है।
बस विश्वास रखो —
जो हो रहा है, वह तुम्हारे विरुद्ध नहीं,
तुम्हारे भीतर के विस्तार के पक्ष में है।
कभी-कभी जीवन तुम्हारी मनचाही दिशा में नहीं चलता,
तुम सोचते हो — “सब खत्म हो गया…”
पर सच्चाई यह है कि वही मोड़
अक्सर तुम्हें उस जगह ले जाता है,
जहाँ तुम्हारा होना पहले से तय था।
जब भी कोई राह बंद दिखे,
तुम मुस्कुरा कर कहो —
“शायद यही मेरी नई शुरुआत है।”
डॉ धीर सिंह धाभाई
#psychology
जाट और राजपूत एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
एक वक्त था जब जाटों ओर राजपूतों में आपसी प्रेम और भाईचारा था। दोनों एक दूसरे का खुद से भी ज्यादा सम्मान करते थे।
वक्त बीतता गया,वक्त के साथ दूरियां भी बढ़ती गई।
लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि इन बढ़ती दूरियों का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर क्या पड़ेगा।
इस वीरभूमि पर बारम्बार होते आक्रमण ओर युद्धों से जूझते हुए दोनों कौमे आगे बढ़ रही थी।
बार बार अकाल पड़ रहे थे फिर भी खुश थे।
लेकिन लुट और बार बार के युद्ध से दोनों समाज में अविश्वास का प्रसार हुआ।
राजाओं ने विश्वास बनाए रखने के लिए शत्रुओ से ना चाहते हुए भी समझौते किए।
जब अंग्रेज आए तो
राजा ओर सामंत अंग्रेजों के स्वामिभक्त बन कर रह गए,
धीरे धीरे स्वार्थ ने राजाओं और सामंतों को अंधा बना दिया।
उनकी यही उदासीनता और स्वार्थ आगे चलकर किसान आंदोलनों में तब्दील हुए
किसान आंदोलनों को कुचलने में राजाओं और सामंतों ने शक्ति और बल का प्रयोग किया।
इसी दौरान हुई कई निंदनीय घटनाओं ने उस समय की पीढी के मन में नफरत और द्वेष को पैदा किया।
देश आजाद हुआ आजादी के साथ राजशाही तथा सामंतशाही का अंत
और लोकतंत्र लागू हुआ ।
लेकिन नफरत और द्वेष खत्म नहीं हुआ।
समय ने करवट ली देश का हर वर्ग राजनीति और सत्ता में सक्रिय हुआ।
सत्ता की लालसा ने जो जातिवाद की जो कसर अंग्रेजों के वक्त रही उसे पूरा कर दिया।
नेताओं के निजी व्यक्तिगत स्वार्थ ने सिर्फ ओर सिर्फ दो समाजों को लड़ाने का ही कार्य किया है।
ओर हम लोग मूर्खों की तरह आपस में एक दूसरे की मां बहन बेटी को गाली दे रहे हैं।
सोचो आपकी आपसी लड़ाई में मां बहन बेटी की क्या गलती है।
कभी एकांत में बैठकर सोचना कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या देकर जा रहे हैं।
प्यार, भाईचारा, सहयोग , सम्मान
या फिर नफरत, द्वेष,जातिय कुंठा दुर्भावना।
अगर मेरी बात से सहमत हो तो बैठ कर विचार करना कि किस दिशा में जा रहे हैं हम और हमारा समाज।
ग़म की दौलत मुफ़्त लुटा दूँ बिल्कुल नहीं
अश्कों में ये दर्द बहा दूँ बिल्कुल नहीं
तूने तो औक़ात दिखा दी है अपनी
मैं अपना मेयार गिरा दूँ बिल्कुल नहीं
मेरे अंदर इक ख़ामोशी चीखती है
तो क्या मैं भी शोर मचा दूँ बिल्कुल नहीं
🖤🌸
- Mehshar Afridi
RAS भर्ती परीक्षा हो या अन्य कोई भर्ती इनको कैलेंडर के अनुसार ही करवाना ठीक है।
परीक्षाएं आगे बढ़ाने से सीधा फायदा कोचिंग संस्थानों को होना है और यह युवाओं के भविष्य के नाम पर करोड़ो का कारोबार है!
समय कम मिला या ज्यादा सबके लिए एक है, यह मांग करना और नेताओं के चक्कर काटना समय व्यर्थ करने जैसा है।
पढ़ो लिखो और मेहनत करो और सरकार से बस पारदर्शिता की मांग करो।
#Rajasthan