What exactly is an E20-compliant vehicle? By definition, it's a vehicle engineered to safely and reliably run on E20 fuel. That also implies a non-E20-compliant vehicle is not designed for E20. Otherwise, the term "compliant" becomes meaningless.
So my question to Mr. @nitin_gadkari is simple: Why was E20 fuel rolled out nationwide when most vehicles on Indian roads were not E20-compliant?
If the answer is, "Nothing happens. Non-compliant vehicles can also run on E20," then what was the rationale behind mandating manufacturers to produce E20-compliant vehicles in the first place? Either E20 compatibility is technically necessary, in which case introducing E20 before the vehicle fleet was ready was questionable. Or it isn't necessary, in which case the compliance requirement itself appears redundant.
You can't simultaneously argue that E20 compliance is important enough to mandate for new vehicles, yet claim it doesn't matter because older, non-compliant vehicles can run on E20 anyway.
By the same logic, why stop at E20? Why not go full aatm-nirbhar and switch directly to E100? If compatibility doesn't matter, then non-E100-compliant vehicles should run on E100 too. Clearly, that's not how engineering works. So where exactly is the technical justification?
राजस्थान में चुनाव होते तो आज मोदी जी का ट्वीट आता कि राणा सांगा ने किस वीरता का परिचय दिया था। वो उनके भाले, घोड़े, कवच में हुए छेदों की संख्या गिनाते और मूर्ति पर माल्यार्पण करते।
राणा सांगा के साथ समस्या यह हो गई कि वो दलीत-पीड़ीत-शोषीत-वंचीत समाज से भी नहीं आते कि हों महाराष्ट्र के, और थोप दिए जाएँ पूरे देश पर!
ऐसे राजा होने का क्या लाभ जब ब्रह्मा जी को ‘रंडीबाज’ और ‘बेटीचो*’ भी न कह पाएँ, न ही बाईस प्रतिज्ञा ले पाएँ! फुले जी ने पुस्तक लिखी और आज देखिए कि महाराष्ट्र में चुनाव नहीं है पर पीएम सात ट्वीट धकापेल लिख दिए।
उत्तर प्रदेश की पुलिस गौरक्षकों को जूते से पीटते हुए, बाल पकड़ कर ले जा रही है। दिल्ली पुलिस तरुण कातिक के परिजनों को पीट-पीट कर खून निकाल दे रही है क्योंकि वो कल प्रदर्शन पर बैठे थे।
दिल्ली पुलिस ही कल, सुदर्शन न्यूज़ के वीडियो के अनुसार, मुसलमानों द्वारा काटे गए गाय के मांस आदि के अवशेष को ले कर भागती दिखी। दिल्ली पुलिस ने कल पत्रकारों को भी पकड़ कर डिटेन किया क्योंकि वो उत्तम नगर पर रिपोर्टिंग के लिए गए हुए थे!
समाचार समाप्त हुए!
जिस राष्ट्र में 30 वर्ष पहले घटे हिंदू/ब्राह्मण नरसंहार पर कोर्ट यह कह देती हो कि गड़े मुर्दे उखाड़ने का क्या लाभ, जिनके हत्यारे बाहर घूम रहे हों और सरकार केवल रैलियों में अपना कन्सर्न दिखाती हो, वहाँ यदि कोर्ट ने 'ब्राह्मण घृणा' को पहचानने से इनकार कर ही दिया तो क्या बड़ी बात हो गई!
भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार बिहार के सारन में राजपूत बच्ची को पाँच पासवान लड़कों ने खींचा, रेप किया और मरने के लिए कुएँ में फेंकने के पश्चात् व्हाट्सएप पर स्टेटस लगाया कि ‘दुल्हन बना कर ले जाएँगे’।
जब रुचि तिवारी को उसके ब्राह्मण होने के कारण पुलिसकर्मियों के सामने से दिल्ली में, भरी दोपहरी में खींचा गया था, मैंने तब भी कहा था कि अगली वारदात खुल्लमखुल्ला रेप और हत्या की होगी। वह आज हो गई है।
प्रदीप भारद्वाज को बाथरूम में बंद कर अग्निशामक चला कर मारने का प्रयास रुचि तिवारी के रेप/हत्या के प्रयास के कुछ ही दिनों के भीतर हुआ। दोनों में ही, मुझे संदेह है कि पुलिस ने अटेम्प्ट टू मर्डर या रेप के चार्ज लगाए होंगे।
जब पुलिस मूक हो जाती है, सत्ता पक्ष सामान्य वर्ग को सताने की नई नीतियों के आविष्कार में व्यस्त रहता है, तब ऐसे ही सवर्ण समाज की बच्चियाँ सत्ताधीश की जातिवादी कुंठा की बलि चढ़ जाती हैं।
@narendramodi जी, 22 से 47 नहीं, 87 कर दो, पर क्या उत्तर दोगे इस बच्ची की माँ को? @BJP4India के नेताओं, तुम्हारी मूक सहमति ऐसी क्रूरता को जनती है।
यही कारण है कि हमारी लड़ाई केवल UGC रोलबैक की नहीं है, हमारी लड़ाई इस तंत्र से है जिसने सामान्य वर्ग की बच्चियों को रेप-हत्या का सामान बना दिया है, जिसमें हमारी सुनवाई है ही नहीं।
राजपूत-ब्राह्मण-भूमिहार-लाला आदि को ले कर घृणा इतनी मेनस्ट्रीम हो गई है कि किसी पासवान समाज के दलित-पीड़ित-शोषित-वंचित को लगता है कि सवर्ण बच्ची का रेप करना, उसके पूर्वजों के साथ हुए कथित अपमान का उचित बदला है।
उसे इसी सरकार ने यह हथियार थमाया है कि दीवारों पर लिखे नारों के मुँह तक पहुँचने, और देश छोड़ने के नारों से कब्र खुदने की बात तक, सवर्णों के प्रति घृणा सामान्यीकृत की जा चुकी है। ये नारे अब केवल नारे नहीं हैं, ये नारे दिल्ली में लगते हैं, बिहार में फोन पर देखे जाते हैं और किसी बच्ची को इस दुष्कृत्य का शिकार बना दिया जाता है।
आप ही बताइए, मैं केवल यूजीसी रोल बैक पर कैसे रुक जाऊँ?
1) Anti CAA protest in Delhi:
3 months in Shaheen Bagh with a road blockade
2) Anti Farm laws protest:
1 year with highways blocked at Singhu and Tikri borders
3) Anti UGC rules protest:
Entry to protest site at Ramlila Maidan blocked & several protestors put under house arrest
चार को थी होली, पाँच को तो न्यूज ही आई। छः को वैरिफाय किया होगा। फिर सात-आठ मार्च तो वीकेंड था। अब ज्योंहि समय मिला परिजनों से मिलने चली गईं।
ये अच्छा लगा कि तरुण भाई का घर इतना सुंदर और भव्य है। एकदम मुख्यमंत्री कार्यालय जैसा लग रहा है। रेखा जी को साधुवाद कि उन्होंने व्यस्त कार्यक्रमों से समय निकाल कर एक छोटे व्यक्ति की मृत्यु पर पाँच दिन बाद शोक व्यक्त किया।
हमारी कौन सी माँग अनुचित है: (24/02 का पोस्ट)
पिछले 50 दिनों में जो घटा है, घट रहा है और जो घटता रहेगा, उसे यदि भाजपा के नेतृत्व और कर्ता-धर्ता थोड़ा भी ठीक करना चाहते हैं तो मैं इनके विचार हेतु, पहले भी दिए कुछ सुझाव वापस रख रहा हूँ:
१. धर्मेंद्र प्रधान बिना किसी स्पष्टीकरण के हटाए जाएँ।
२. यूजीसी वाली संसदीय कमिटी में जो भी सदस्य भाजपा के थे, उनमें से जो भी वामपंथियों के साथ कॉम्प्रोमाइज्ड हैं, उन्हें निकाला जाए।
३. अतिमहत्वपूर्ण: सामान्य वर्ग के निर्धन छात्र-छात्राओं को अनुसूचित जाति के स्तर की निःशुल्क/सब्सिडी की सुविधा- निःशुल्क कोचिंग, परीक्षा के फॉर्म, हॉस्टल की फीस, कोर्स की फीस आदि SC के समकक्ष। ऐसा करने से किसी को कोई समस्या नहीं होगी।
४. UGC-AICTE को समाप्त करने वाले बिल को बजट सत्र में ही ला कर यह कहें कि पूर्व के जो भी नियम हैं, उन्हें वर्तमान परिस्थितियों के आलोक में समीक्षा के उपरांत ही लागू किया जाएगा एवम् समाज के हर वर्ग का उचित ध्यान रखा जाएगा। कैम्पस को पुलिस थाना नहीं बनने देंगे।
५. हर नेता की भाषा में ‘दलित-वंचित-पीड़ित’ जैसी शब्दावली का लोप और ‘हर वर्ग के लिए समर्पित’ जैसे वाक्यांशों का प्रयोग। टोन में परिवर्तन करें।
६. अम्बेडकर को बाप मानना बंद करें। जितना कर दिए, वही जितनी घृणा उत्पन्न कर रहा है, वह आपसे हैंडल नहीं हो सकेगा।
७. वैसी कोई योजना न बनाएँ जिसमें SC/ST/OBC का तुष्टिकरण स्पष्ट दिखे। जिन चीजों को माँगा न जाए, वो दे कर पागल न करें।
८. कैम्पस और सोशल मीडिया में ब्राह्मण-घृणा फैलाने वाले लोगों पर पुलिसिया कार्रवाई, हैंडलों पर भारत में प्रतिबंध। इस बात की स्वीकार्यता हो कि ऐसी कोई बात हो रही है देश में जो नारेबाजी से आरंभ हो कर अब एक ब्राह्मण छात्र को बाथरूम में बंद कर, अग्निशामक से शुष्क कार्बन डाई ऑक्साइड चला कर मारने तक पहुँच चुका है। विक्टिम कार्ड नहीं, उचित कार्रवाई का आश्वासन और एक्शन।
९. हर राज्य में कुकुरमुत्ते की तरह पास होते सामान्य वर्ग के हिन्दुओं को अपराधी बनाने वाले कानून (BC एट्रोसिटी एक्ट) पर आपकी पार्टी के वकील उसका प्रतिकार कोर्ट में करें। या, आप उसे सर्वसमावेशी बनाने पर बल दें कि जातिवादी घृणा का शिकार किसी भी जाति का व्यक्ति हो सकता है।
१०. जो भी ऐसा कानून आए, चाहे वह राज्यों में हो या अंततः कॉलेज परिसरों के लिए, शिकायतों के झूठा पाए जाने पर उचित जेल और ₹१० लाख का आर्थिक दंड प्रस्तावित हो।
११. कोर्ट यदि ऐसे मामलों में कोई निर्णय दे, तो उसे पलट कर राजीव गाँधी न बनें, मोदी भी न बनें।
हित वचन तूने नहीं माना
मैत्री का मूल्य न पहचाना
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ
बहुत-बहुत धन्यवाद @BJP4India! नमन रहेगा @narendramodi यह दिन दिखाने के लिए कि इस राष्ट्र में आतंकवादी सड़क घेर सकते हैं, दंगे कर सकते हैं, फिर वापस प्रदर्शन कर सकते हैं, पर आपकी कायर सरकार को समस्या मेरे जैसों से है।
आज मैं अपने घर में कैद हूँ। आज मेरा आना-जाना बंद है। न तो व्यक्ति अमर होता है, न सत्ता!
आप लोग कायरों का एक समूह मात्र हैं। आप समाज को बाँटने वाले, डरपोक हो जो ट्रोल बंदरों की एक सेना बिठा कर हमें कलंकित करना चाहते हो।
दिल्ली में आए मित्रों का आह्वान करता हूँ कि रामलीला मैदान की ‘मोदी छावनी’ तक पहुँचिए। मोदी ने छावनी बनवाई है तो आप उसी मोदी तक अपने नारों को पहुँचाइए।
ये आपके बच्चों को जन्मजात अपराधी बना चुके हैं और आपको आतंकवादी की तरह देखते हैं। आप सवर्ण हैं तो इसका प्रतिकार कीजिए।
#March8DelhiChalo
Whosoever has been selected in UPSC, a small piece of advice for your own good.
In the coming days, you’ll be giving plenty of interviews and media bytes. Just say you’re happy, that your efforts paid off; thank your parents and teachers, standard stuff.
In the over-excitement, try to avoid grand declarations about changing society, serving humanity, cleaning the system, transforming the system, etc.
Because if you ever get caught in a scam in your pursuit of rashtr-nirmaan, and statistically, some of you will, those very clips will be replayed endlessly by social media and will cause huge embarrassment for you. Better to keep the bytes modest. Future you might be grateful.
DU में जो रुचि तिवारी के साथ हुआ, वह वामपंथी-अम्बेडकरवादी छात्र पार्टियों के कारण हुआ, ऐसा मानना मूर्खता है। घटना का सतही कारण तो अवश्य ही ऐसी पार्टियों के छात्र नेता हैं, पर जड़ में क्या है?
जड़ में जातिवादी तुष्टिकरण और ब्राह्मण घृणा के नारों का सामान्यीकरण है। मोदी सरकार की उपलब्धि यही है कि अब भीमवादी खुल्ला घूम रहे हैं। कल तक जो दीवारों पर ‘ब्राह्मण बनिया कैम्पस छोड़ो’, ‘देयर विल बी ब्लड’, ‘ब्राह्मणों भारत छोड़ो’ लिखा करते थे, अब वह ‘ब्राह्मणों की कब्र खुदेगी’ के नारों से होते हुए, अब एक लड़की के कपड़े फाड़ने पर आ चुकी है क्योंकि उसका नाम ‘तिवारी’ है।
वामपंथी पार्टियों को अब हम नहीं कोसते क्योंकि हम जानते हैं उन्हें सशक्त करने वाले लोग सत्ता में हैं, जो ‘बँटेंगे तो कटेंगे’ का नकली नारा रैलियों में लगा कर एकता का स्वांग रचते हैं।
जेएनयू में हाल ही में कुछ छात्रों को रस्टिकेट किया गया, जो एक अच्छा उदाहरण है, पर आगे क्या? कैम्पस में एक छात्रा के कपड़े फाड़ने के प्रयास करने वाले को जेल होनी चाहिए।
आज रुचि तिवारी के पास कौन से विधिक विकल्प हैं? क्या वह कोर्ट में ‘जातिवादी घृणा’ का आधार बना सकती है? नहीं, क्योंकि वो जिस समाज से आती है, उसके पास ऐसा कोई विकल्प नहीं। उसे कोर्ट में यह बताना होगा कि उस पर हुए अपराध की जड़ में जातिवादी घृणा है, पर प्रतिवादी वकील कहेगा कि ब्राह्मणों के साथ कैसा जातिवाद?
यह विषाक्त वातावरण नरेन्द्र मोदी और भाजपा की ही देन है। नाम उसी का लिया जाएगा जो ई-रिक्शा से वंदे भारत तक हर उपलब्धि का क्रेडिट लेता है। यह क्रेडिट भी मोदी जी का ही है।
यूजीसी और मोदी: जुड़े गाँठ पड़ जाए
यूजीसी पर सवर्णों का विरोध यूजीसी को ले कर नहीं बल्कि सरकार की हर नीति में ‘दलित, वंचित, शोषित’ की चटनी को ले कर था।
सोच-समझकर जब आप एक वर्ग को, चाहे वह एक ही प्रतिशत क्यों न हो, उपेक्षित रखते हैं, और चुनावी भाषणों में आपको उनकी याद ‘बँटेंगे तो कटेंगे’ के नारों के लिए आती है, तब एक दिन ऐसा आता है, जब उसको दिखता है कि भाई, हमारा तो ये *** काट रहे हैं।
IAS की कोचिंग हो या उद्यमी को सपोर्ट, हर जगह यह वर्गीकरण हो रहा था। और यह फायनेंस कौन कर रहा था? उसकी फंडिंग का एक बहुत बड़ी हिस्सा इनकम टैक्स और परोक्ष करों के माध्यम से यही सवर्ण दे रहा था क्योंकि कमाने और उपभोग की शक्ति इनके ही पास है।
फिर भी, ‘चुनमंगे’ और ‘ठाकुर का कुआँ’ जैसे विमर्श चले। यूरेशिया भेजो, भारत छोड़ो, वी आर कमिंग फॉर यू लिखा गया और सवर्णों के नरसंहार की बातें ‘डिसेंट’ कह कर डिसेंट्री की तरह उपचार-रहित हो कर फैलती रही।
यही सरकार मुँहठोकबा बन कर ताकती रही। सवर्ण चार पोस्ट लिख कर बताता रहा कि अब अति हो रही है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को लगा कि थोड़ा और ढकेलते हैं इनको… सवर्ण को उबलते गर्म पानी के पतीले में कैद मेढक समझा गया।
पर सवर्ण बहुत कुछ है, **या तो बिलकुल नहीं, उतना बड़ा *ति* तो बिलकुल ही नहीं, उस कोटि का चू** तो एकदम भी नहीं। वही तुम्हारा विमर्श चला रहे हैं और तुम उन्हीं को डंडा डाल रहे हो? ये कौन सा मास्टरस्ट्रोक है?
स्थिति यह है कि चाहे @RSSorg हो या @BJP4India, जो वातावरण ‘बँटेंगे तो कटेंगे’ का इन्होंने बनाया था, अब इन पर किसी का विश्वास नहीं रहेगा। केवल वही विश्वास करने का ढोंग करेंगे, जिन्हें राजनैतिक रूप से कहीं जाना है। परंतु वह भी, अपने लोगों के बीच, यही कहते पाए जाते हैं: अजीत भाई, ब्लंडर हो गया, उबरना मुश्किल है।
जब आपका पूरा फोकस न केवल बाकी हर समाज के लिए जात्योन्मुखी योजनाओं को लाने का रहे, बल्कि आप लक्षित करके उसके प्रति होती घृणा पर चुप रहें, और अंततः अपनी नीतियों से उसकी उपेक्षा दिखा कर, बाकियों को यह कहें कि देखो, उन्हें पेल दिया, तुम भी ‘हिसाब चुकता करो’, तब वह सोचने लगता है।
सवर्ण अभी वही सोच रहा है। अगले छः माह तक, ये जब भी कुछ सकारात्मक करेंगे, इनका उपहास किया जाएगा। ये त्रिपुंड लगाएँगे, लोग कहेंगे कि तुम ढोंगी हो। ये रैली से ‘समभाव’ की बात करेंगे, लोग कहेंगे कि रहने दे भाई!
240 के बाद का एकजुट होता समाज, इनकी अनेक बकलोलियों के वर्तमान परिणाम के कारण राजनैतिक रूप से टूट रहा है। अब बात ‘जुड़े गाँठ पड़ जाए’ वाली बात हो गई है। जिनको समझना है समझें कि सवर्ण किसी पार्टी के बँधुआ श्रमिक नहीं हैं।
Now it will be implied how the govt influenced the Supreme Court to put the UGC regulations on hold.
Just a few days ago, it was being said that the govt could do nothing. The Supreme Court had directed that the regulations be made, so they had to be made. The govt was helpless.
Our fights will continue for-
1. Full UGC Roll back
2. SC/ST Creamy layer
3. One Family One Reservations
4. Sunset clause- Reservation ends after fixed period
5. Abolition of SC/ST Act
Friends, the Deep State is too strong, and Modiji alone is not able to thwart its attempts to destabilize India through internal sabotage.
To support Modiji, I am starting a new elite force called the Shallow State. If you want to join, please reply with your superpowers and what you can do for the Shallow State in our attempt to fight the Deep State.
One of the biggest mistakes Modi govt made since 2014 is not dismantling the Marxist ecosystem in education on priority.
Didn’t touch it. Allowed it to flourish. In fact, didn’t touch education for two full terms and even boasted about it.
On one hand, govt gave a free hand to Marxists to carry on their agenda of ideological indoctrination of Dalits by constantly feeding them the “atrocity narrative”, not to empower, but to harden grievance and convert it into a political weapon. And on the other hand, instead of countering that grievance through social reform, dialogue, and genuine integration, govt appeased that anger by giving them weapons like strengthening the Atrocities Act and now the UGC regulations to take out that grudge and seek revenge.
जो लिखित परीक्षा में ही तीस ला रहे हैं, उनको इंटरव्यू में अस्सी किस तर्क से मिल जाएगा? सब बात में जातिवाद! अरे पढ़ो-लिखो, भगवान/बाबा साहेब ने वही दिमाग तुम्हें भी दिया है।