सबसे पह���े Elon Musk को यह समझ लेना चाहिए कि भारत कोई 'Banana Republic' नहीं है। यहां नियम, कानून और व्यवस्था के तहत ही सारे निर्णय लिए जाएंगे।
जिन्हें वे इशारों में Oligarch वगैरह कह रहे हैं, वे लोग भी स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। चाहे जियो हो या एयरटेल, वे सभी स्टारलिंक के साथ कतार में हैं और प्रतीक्षा कर रहे हैं।
लेकिन सबसे मजेदार प्रतिक्रिया तो राहुल गांधी जी की है। वे तो हम सबको कह रहे थे कि आप एलन मस्क और ट्रम्प के सामने सरेंडर कर देते हैं, आप सरेंडर करने वाली पार्टी हैं। अब क्या हो गया कि वे खुद इतना सरेंडर हो रहे हैं? इतने उतावले क्यों हो रहे हैं कि एलन मस्क को कोई मुश्किल हो रही है? कुछ महीनों पहले इन्हीं के नेता जयराम रमेश कह रहे थे कि एलन मस्क का स्टारलिंक देश की सुरक्षा के लिए खतरा है। उनके सलाहकार भी इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे थे। फिर अचानक वे 'सरेंडर गांधी' कैसे बन गए?
इस बीच ऐसा क्या मिल गया कि जो कल तक हमारे ऊपर आरोप लगा रहे थे, आज अचानक एलन मस्क की सेवा में उतर गए?
राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी अच्छी तरह समझ लें कि उनकी UPA सरकार के दौरान स्पेक्ट्रम को लेकर बहुत बड़ा भ्रष्टाचार हुआ था और स्पेक्ट्रम अनाप-शनाप तरीके से बेचा गया था।
लेकिन यह मोदी जी की सरकार है, यहां सब कुछ नियम-कायदे और कानून के अनुरूप ही होगा। जिसे जब मिलना होगा, बिना किसी भेदभाव के मिलेगा... 'सरेंडर गांधी' एलन मस्क को खुश करने की कितनी भी कोशिश कर लें!
पता नहीं अचानक राहुल गांधी जी को एलन मस्क से इतना प्रेम कैसे हो गया। वे चाहे जितना प्रयास कर लें, निर्णय कानून और भारत के नियमों के अनुसार ही होगा। जैसा कि प्रधानमंत्री जी ने कल स्पष्ट कहा है कि मोबाइल की सुरक्षा, नेटवर्क की सुरक्षा, स्पेक्ट्रम और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही निर्णय लिया जाएगा। सरकार इस विषय पर पहले ही अपना स्पष्टीकरण दे चुकी है।
- श्री @rammadhav_
अब तो कट्टर काँग्रेस समर्थक पत्रकार भी 'काँग्रेस' से परेशान हो गए है...
'वोट चोरी' के मुद्दे पर 'राजदीप सरदेसाई' ने काँग्रेस को घेरा
कहा, तब क्या हुआ था जब 2018 में काँग्रेस 'मध्यप्रदेश राजस्थान छत्��ीसगढ़' में चुनाव जीती थी
काँग्रेस को खुद के अंदर झाँकना चाहिए।
भाजपा जीती, कांग्रेस फिर सोचती रह गई—
“आखिर हुआ क्या?” 😂
उत्तराखंड के जिला सहकारी बैंकों के चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने एक बार फिर साफ कर दिया.....जहाँ संगठन मजबूत हो, कार्यकर्ता मैदान में हों और जनता का विश्वास साथ हो, वहाँ परिणाम भी “9–0” आते हैं।
देहरादून आने से पहले उत्तराखंड की जनता और युवाओं को पूरा सच भी बता दीजिए।
उत्तराखंड को भर्ती घोटालों का “epicentre” किसने बनाया था? इतिहास गवाह है कि इसकी जड़ें कांग्रेस के शासनकाल में हैं।
एन.डी. तिवारी सरकार (2002–2007) के दौरान:
• दरोगा भर्ती में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगे। मामला इतना गंभीर था कि जांच CBI तक पहुंची।
• पटवारी भर��ती में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों के आरोप लगे। एक ही परिवार के कई सदस्यों के चयन और लेन-देन के आरोपों के बाद भर्ती निरस्त करनी पड़ी।
हरीश रावत सरकार (2014–2017) के दौरान:
• 2016 की UKSSSC VPDO भर्ती परीक्षा विवादों में रही। बाद की जांच में आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष, सचिव और परीक्षा नियंत्रक सहित कई लोगों की गिरफ्तारी हुई।
• ��िडकुल भर्ती विवाद में पक्षपात और प्रभावशाली लोगों के रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाने के आरोप लगे। SIT जांच तक करनी पड़ी।
• UBTER और आयुर्वेद विश्वविद्यालय की भर्तियां भी लगातार विवादों और अनियमितताओं के आरोपों में घिरी रहीं।
यानी जिस दौर में कांग्रेस सत्ता में थी, उस समय भर्ती प्रक्रियाओं पर लगातार सवाल उठे, जांच एजेंसियां लगीं, भर्तियां रद्द हुईं और युवाओं का विश्वास टूटता गया।
अब वर्तमान की भी बात कर लेते हैं।
जब मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल में UKSSSC भर्ती घोटाले का मामला सामने आया, तो क्या उसे दबाया गया? नहीं।
• देश का सबसे कठोर नकल-विरोधी कानून बनाया गया।
• 100 से अधिक नकल माफियाओं को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
• भर्ती प्रक्रियाओं को पूरी तरह पारदर्शी बनाने के लिए व्यापक सुधार किए गए।
• पिछले चार वर्षों में 34,000 से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियां पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से मिली हैं।
यही फर्क है।
कांग्रेस के दौर में घोटाले होते थे, कार्रवाई नहीं होती थी। भाजपा सरकार में गड़बड़ी सामने आई तो कानून बना, माफिया जेल गए, जांच हुई, गिरफ्तारियां हुईं और व्यवस्था बदली गई।
युवाओं के भविष्य पर राजनीति करने से पहले यह भी बताइए कि जिन भर्ती घोटालों की नींव कांग्रेस के शासनकाल में पड़ी, उनके लिए जवाबदेह ��ौन था?
उत्तराखंड का युवा सब याद रखता है। उसे भाषण नहीं, रिकॉर्ड दिखाई देता है। एक तरफ भर्ती घोटालों का इतिहास है, दूसरी तरफ कठोर कानून, माफियाओं पर कार्रवाई, पारदर्शी भर्ती व्यवस्था और हजारों युवाओं को योग्यता के आधार पर मिली सरकारी नौकरियां।
युवाओं के सपनों की सबसे बड़ी दुश्मन वह राजनीति है जिसने वर्षों तक व्यवस्था को सड़ने दिया। और युवाओं का सबसे बड़ा साथी वह शासन है जिसने व्यवस्था को साफ किया, कानून को सख्ती से लागू किया और भर्ती प्रक्रिया में विश्वास बहाल किया।