मैं थप्पड़ संस्कृति में यकीन नही करता ,लेकिन कंगना ने जो टिप्पणी की थी ,वह किसी भी महिला के सम्मान पर करारा हमला थी ।ऐसे में आत्म रक्षा के लिए उठाए गए हर हाथ का मैं समर्थन करूंगा ।आत्मरक्षा केवल देह की नही होती ,आत्म सम्मान की भी होती है ।
चुनावआयोग का गठन होने के बाद पहले चुनाव में72साल पहले60फ़ीसदी मतदान हुआ था।आज भी हम60 से 70 के बीच फंसे हुए हैं । सौ फ़ीसदी मतदान पर हम नहीं पहुंच पा रहे हैं ? अनेक चुनाव देश में एक सप्ताह में हुए हैं ।लेकिन अब दो ढाई महीने चलते हैं । इसी पर केंद्रित है लोकमत समाचार में यह आलेख ।
भाई राकेश पाठक ने आज उस पुण्यात्मा का स्मरण करते हुए दिन भर उपवास किया,जिसने मुल्क को आज़ादी दिलाई। मैं भी इस अवसर पर उपस्थित था । पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर और समानता को साथ लेकर चलने वाले डॉक्टर सुनीलम,गांधीभवन न्यास के सचिव दयाराम नामदेव समेत सैकड़ों लोग उनका साथ देने पहुंचे ।
भारतीय लोकतंत्र में नीतीश कुमार ने एक और स्याह अध्याय लिख दिया ।वे भजनलाल और रामविलास पासवान की परंपरा को आगे बढ़ा तो रहे हैं पर अपनी साख मिट्टी में मिला चुके हैं ।अब उनका स्वार्थ सिर्फ मुख्यमंत्री बने रहना है ।वैचारिक आधार की वे होली जला चुके हैं ।
मंदिर तो उन रामलला के लिए बना है ,जो वर्षों से टेंट में बैठे थे ।अब बालक राम जी का मंदिर बन गया ,तो वे रामलला कहां होंगे,जिनमें प्राण प्रतिष्ठित थे । वैसे तो हम सब के लिए राम एक ही हैं ,लेकिन मन में सवाल आया इसलिए ।
शिवराज सिंह ने कहा कि कभी कभी बड़े उद्देश्य के लिए राजतिलक होते होते वनवास हो जाता है । राम का वनवास रावण को मारने के लिए हुआ था ।शिवराज का निशाना कौन है ? उस निशाने के बाद क्या वे भारत का प्रधानमंत्री बनेंगे ?
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नीरज से पुलिस कहती थी कि वे अपना मृत्युगीत न सुनाएं।गीत सुनकर लोग आत्महत्या करते थे।
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नीरज का आज जन्मदिन है।उनका जन्म शताब्दी वर्ष शुरू हो रहा है। ग्यारह बरस पहले मैनें उनके सफरनामें पर यह फ़िल्म बनाई थी ।
शिवराज सिंह चौहान इतने मासूम हैं क्या ,जो कहते हैं कि कभी कभी राजतिलक होते होते वनवास हो जाता है । यह तो चुनाव से पहले साफ था कि वे मुख्यमंत्री नही बनने वाले हैं ।
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फणीश्वरनाथ रेणु क्रान्तिकारी भी थे । नेपाल की आज़ादी के आंदोलन में वे एक हाथ में बंदूक लेकर लड़ रहे थे ।उनकी कलम आग उगल रही थी । खुफिया रेडियो भी चला रहे थे। देखिए यह उनका अनोखा रूप ।
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क्रांतिकारी ग़ज़ल के जनक दुष्यंत कुमार की पुण्यतिथि 30 दिसंबर को है। वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन अपनी रचनाओं के ज़रिए वे अमर हैं । हमेशा वे हमारे दिलों में धड़कते रहेंगे । कुछ बरस पहले मैंने उन पर फ़िल्म बनाई थी । पेश है श्रद्धांजलिस्वरूप यह फ़िल्म