इन मूर्खो को पता नहीं कि बैंक पहले प्राईवेट थे। कांग्रेस सरकार ने उनका राष्ट्रीयकरण कर दिया, बिना कोई मुवावजा दिये। तब जाकर बैंक @NationalDastak जैसे लोगों के बाप की हुई। इनके जैसे इनके बापों को भी बिना काम किए मुफ्त की दौलत और नौकरी चाहिए। अपने बाप जैसे ही मुफ्त के खाने की आदत आज़ के आरक्षण धारियों को लगी हुई है। 2014 में जन धन योजना आने से पहले इन लोगों में से 95% का एकाउंट बैंक में नहीं था फिर भी अपनी मुफ्त में खाने की पुश्तैनी आदत के कारण सामान्य वर्ग के उस पैसे को भी अपने बाप का मानते हैं।2014 के जन धन योजना के बाद भी बैंकों में 95% जमा पैसा सामान्य वर्ग का है, जिसमें से लोन लेकर प्राईवेट सेक्टर फला फूला है। फिर भी आरक्षण धारी उसे अपने बाप का समझकर, नीजि क्षेत्रों में भी आरक्षण चाहते हैं, ऐसा न करने पर वे देश और सामान्य वर्ग को बदनाम करेंगे, जैसे उनके पूर्वजों ने ठाकुर को बदनाम किया जब उन्हें किसी ठाकुर के नीजि कुआं से पानी नहीं भरने दिया गया।
प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण इस देश की रियलिटी है। अगर मोदी नहीं करेंगे, तो कोई और करेगा। जो प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण लागू करेगा, वही चुनाव जीतेगा। जो नहीं करेगा, वह चुनाव हारेगा। हमें क्या, मोदी चुनाव हारें! हम तो यही चाहते हैं।
जो एससी, एसटी और ओबीसी के अधिकार लागू करेगा, वही चुनाव जीतेगा। ये देश की लगभग 85% आबादी हैं। इससे किसी का नुकसान नहीं होगा। उल्टा, निजी कंपनियों को योग्य उम्मीदवार मिलेंगे। डाइवर्सिटी बढ़ेगी, तो गुणवत्ता भी बढ़ेगी।
आज प्राइवेट सेक्टर ठहरे हुए पानी का तालाब बन गया है। खुद नई तकनीक विकसित करने के बजाय विदेशों से तकनीक लाकर यहाँ बेचता है। इसलिए न इनोवेशन हो रहा है, न उतना मुनाफा।
इन लोगों को सामान्य वर्ग की कितनी फ़िक्र है। कह रहे हैं कि सामान्य वर्ग के सामान्य लोग आंदोलन करने पर जेल चले जाएंगे।
ये वही लोग हैं जो कभी कहते हैं कि आरक्षण हटा तो "भूचाल ला देंगे" तो कभी कहते हैं कि "किसी के बाप में दम है तो आरक्षण हटा कर दिखाए"!्
आरक्षण के खिलाफ ये लोग ज्यादा उछल रहे हैं
शुभम शर्मा
पीयूष मिश्रा
अजीत भारती
हर्ष दुवे
प्रतीक पांडेय
नेहा दास
अनुराधा तिवारी
आदित्य राज
मैं दावे के साथ कह सकता हु इनमें से एक भी जंतर मंतर पर आंदोलन करने नहीं जाएगा केवल ये युवाओं को भड़काकर उन पर मुकद्दमे लगवा देंगे और खुद पूरे मामले से दूर हटकर सोशल मीडिया पर पंचायत करेंगे।
आरक्षण व्यवस्था को संविधान में आवश्यक संशोधन करके स्थायी रूप से सुनिश्चित किया जाए और इसे न्यायिक हस्तक्षेप से सुरक्षित रखा जाए। आरक्षण की संवैधानिक सीमा बढ़ाकर 85% की जाए, ताकि देश की सामाजिक संरचना और वंचित वर्गों की वास्तविक जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
और आरक्षण विरोध को अपराध के श्रेणी में लाया जाए।
इन मूर्खो को कौन बताए कि मेरिट वाले बड़े बड़े तीर मार रहे है। आज भारत अंतरिक्ष में अपने रौकेट और उपग्रह स्थापित कर पाया है, तो मेरिट वालों की वजह से। विदेश से लोग यहां सस्ती और ऊंच्च दर्जें का ईलाज कराने आते हैं, तों मेरिट वालों की वजह से। आज देश एक आर्थिक और सामरिक महाशक्ति बनने की राह पर है, तो मेरिट वालों की वजह से।
अगर आरक्षण नहीं होता तो देश अबतक विकसित हो गया होता। आरक्षण भारत देश के विकास में बाधक है।
50% आरक्षण पा कर आरक्षण धारियों ने क्या आविष्कार कर दिया। बस उन्हें बिना पढ़े और सोते-सोते सरकार की नौकरी और करदाताओं की मेहनत का पैसा चाहिए। आरक्षण धारी इसलिए नहीं पिछड़े कि कोई उनका उत्पीड़न कर रहा था। वे पिछड़े क्योंकि वो आलसी और कामचोर थे और हैं। आज भी किसी आरक्षण धारी को नौकरी पर रख कर देखिए, वो बिना काम करें मुफ्त में सेलरी चाहेगा।
जब आरक्षण 50% सरकारी सीटों पर नहीं है, सरकार के कैबिनेट में नहीं है, देश और राज्यों की नीतियाँ बनाने वाले सचिव स्तर के पदों पर नहीं है, प्राइवेट सेक्टर में नहीं है, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में नहीं है, ग्रुप A से ऊपर की सेवाओं, सुपर-स्पेशियलिटी शिक्षा और कई अन्य एलीट क्षेत्रों में नहीं है, तो फिर ये तथाकथित ‘मेरिट’ वाले लोगों ने कौन-सा तीर मार लिया?
इन मूर्खो को कौन बताए कि भगवान शंकराचार्य अपने ज्ञान, सनातन हिन्दू धर्म को बचाने की इच्छाशक्ति और बल, तिब्र बुद्धि के कारण शंकराचार्य होते हैं।
इन मूर्खो को बिना पढ़े हर जगह सिर्फ इनके तथाकथित पिछड़ी जातियों में जन्म लेने के कारण हर जगह आरक्षण चाहिए।
चार शंकराचार्य में एक सामान्य , एक पिछड़ा, एक दलित, एक आदिवसी होना चाहिए। ऐसे ही सभी मंदिरों में होना चाहिए। उसके बाद आरक्षण समाप्त करने की बात करनी चाहिए।
बताओ सावरकर समग्र के खंड सात में सावरकर जी क्या गलत लिखते है ?
डॉ. अंबेडकर नामक व्यक्ति भिक्षु अंबेडकर हो जाए तो भी किसी हिंदू को किसी तरह का सूतक नहीं लगने वाला है। न हर्ष, न विमर्श, जहां स्वयं बुद्ध हार गए वहां अम्बेडकर किस झाड़ की पत्ती हैं?
सावरकर जी दूरदर्शिता को सही साबित करती यह वीडियो।
I demand 100% reservation for SC/ST/OBC in government jobs. We general category people don't want your jobs. We will strive for becoming enterpreneurs and making our Bharat great again. But for God sake don't legislate for giving reservation in private sector.
क्या आपके जैसे परिवारों को अभी भी आरक्षण चाहिए? अगर आपका जवाब हां में है, तो आप एक घटिया मनुष्य हैं जो दूसरे गरीबों का हक मार रहें हैं। हम लोग ये नहीं कह रहे कि आरक्षण हटाओ। हमलोग कहना चाह रहे हैं कि आजादी के ७९ साल बाद भी आप जैसे लोगों को आरक्षण क्यों चाहिए। दूसरे गरीबों को मौका क्यों नहीं देते? आरक्षण धारियों में जो अमीर और रसूख वाले हैं, सिर्फ उन्हें हीं आरक्षण का मजा क्यों मिल रहा है। बाकी गरिबों को क्यों नहीं।
आज हम इंटरनेट और Gen-Z के इस आधुनिक युग में आ गए हैं, लेकिन यह देखकर बहुत दुख होता है कि कुछ लोग आज भी सोशल मीडिया पर आरक्षण के संवैधानिक अधिकार को 'भीख' या 'कैंसर' कहकर अपमानित करते हैं। यह सोचकर मन व्यथित होता है कि ऐसी नफरत भरी बातें पढ़कर हमारे आरक्षित और वंचित वर्ग के युवाओं के दिलों पर क्या बीतती होगी।
आज हालात ऐसे बन गए हैं कि कई जगहों पर हमारे युवा अपनी जाति बताने से भी शर्माते हैं। जब मैं इंटरनेट पर आने वाले भद्दे कमेंट्स और उनका हमारे युवाओं पर पड़ने वाला मानसिक परिणाम देखता हूँ, तो साफ लगता है कि कुछ लोग अपनी ओछी राजनीति चमकाने के लिए समाज को किस तरह से तोड़ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर जिस 'क्रिएटिव' तरीके से यह भावनात्मक भेदभाव किया जा रहा है, मैं इसे 'राष्ट्रद्रोह' की तरह देखता हूँ; क्योंकि यह देश को बांटने का काम है। कुछ ताकतों ने हमारे बच्चों के दिलों में बहुत बड़ी गलतफहमी खड़ी कर दी है। उनके मन में द्वेष का जो जहर घोल दिया गया है, हमें उसे हर हाल में दूर करना है।
हम विकास में बहुत आगे आ गए हैं, लेकिन कुछ लोगों की मानसिकता में आज भी बीमारी है। पर मेरे युवा साथियों, हमें निराश नहीं होना है! हमें इस नफरत को प्यार से हराना है और समानता का सपना सच करना है। ऐसे जाहिल लोगों की बातों पर बिल्कुल ध्यान न दें।
आज भी कई बच्चे जाति या पैसे की कमी के कारण अपने मुकाम तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। उन सभी को न्याय और अवसर दिलाना ही हमारा लक्ष्य है।
एकजुट रहें, आगे बढ़ें!
भारत में संस्थागत जातिय भेदभाव नहीं है। अगर कुछ लोग जातिये भेदभाव से ग्रस्त है तो उसके लिए सम्पूर्ण समाज को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। आप शोशल मिडिया पर देख लिजिए, सबसे ज्यादा जातिवादी वहीं है जिन्हें आरक्षण मिला हुआ है। भूतकाल में भी संस्थागत भेदभाव का कोई उदाहरण नहीं है। इसलिए आरक्षण एक भेदभाव करने वाला प्रावधान है जो भारतीय समाज में वैमनस्य पैदा कर रहा है।
आरक्षण की अवधारणा को समझना बहुत ज़रूरी है। किसी इंसान की आर्थिक स्थिति उसकी दलित होने की पहचान नहीं बदलती। भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर जी ने साफ कहा था जब तक जातीय भेदभाव है, तब तक आरक्षण रहेगा। EWS अलग विषय है वह आज के गरीब सामान्य वर्ग के लिए है, उसे आरक्षण के विरुद्ध खड़ा करना बेईमानी है।
दो लोगों की आपसी लड़ाई को नीले आतंकी दो जातियों की लड़ाई बताकर राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं।इसे अगड़ा बनाम पिछड़े की लड़ाई बताने वाले हीं देश तोड़क आतंकवादी हैं।
चारपाई दलित की
घर दलित का
बैठा दलित है
इस जातीय आतंकी 52 को तकलीफ हो रही है
अब ऐसे जातीय आतंकियों पर sc /st एक्ट क्यों न लगे
52 गैंग फिर रोती है, की फर्जी sc/ St ACT लग गया
अपने आतंकियों को समझाती नहीं
इस आतंकी को बेल्ट ट्रीटमेंट भी देना था
SC/SC/OBC का जातिगत आरक्षण खत्म कर के सबको EWS वाला हीं आरक्षण दे दिया जाए, तो सारी जातिवादी राजनीति और सारा झगड़ा हीं खत्म हो जाए। वैसे तो कोई आरक्षण नहीं होना चाहिए, पर अगर देना ही पड़े तो इनकम के आधार पर होना चाहिए।
इन्होंने जो एक काल्पनिक स्थिति बयान किया है वो लालू की पुत्रियां और पुत्रों पर बिल्कुल सटीक बैठता है। पैसा और सत्ता के बल पर मेरिट नहीं होने के बावजूद किसी पुत्री को डॉक्टर बनाया तो किसी को इंजिनियर। अनपढ़ पत्नी और पुत्रों को क्रमश: बिहार में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और मंत्री बना दिया।
तथाकथित सवर्ण में ऐसा एक राहुल गांधी जी हीं फिट बैठतें है।
बिना किसी ज्ञान के ज्ञानी होने का स्वांग दिमाग से कचड़ा हीं निकालता है। प्राईवेट सेक्टर में आरक्षण आने के बाद जो पढ़ाई करके शून्य से भी कम नम्बर लाते हैं, उनके ज्ञान से नई - नई तकनीक खोजी जाएगी। आरक्षण धारियों के पिछवाड़े से लिथियम आयन बैटरी निकलेगी। आरक्षण धारियों को नौकरी दो, उन्हें खिलाओ और उनके पिछवाड़े से जी भरकर लिथियम आयन बैटरी निकालो।
प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण न होने के बावजूद स्थिति यह है कि हम एक कार की बैटरी तक खुद नहीं बना पा रहे और इसके लिए चीन पर निर्भर हैं। देश में मौजूद निजी कंपनियां अपनी किसी स्वदेशी या खुद की विकसित तकनीक से उत्पाद नहीं बनातीं। वे सारी तकनीक, उपकरण और स्पेयर पार्ट्स विदेशों से आयात करती हैं, जिन्हें यहाँ बेहद खराब ढंग से असेंबल करके बेच दिया जाता है। आरक्षण के बिना इस तथाकथित 'मेरिट' का ये हाल है?