कौन कहता है। कि देश मुसलमानों का भी है आजादी के बाद उनको पाकिस्तान मिला ।हिन्द्ओ को क्या मिला भारत वो भी सेकुलर। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना है।#hindurastra
आज भोपाल निवास में सागर जिले के प्रतिभाशाली युवा बुंदेली गायक श्री सुनील लोधी जी एवं उनके माता-पिता का सम्मान किया।
फिल्म 'हनुमान अंश' में उनके लोकप्रिय गीत ने जन-जन को भाव-विभोर किया है। उन्हें ₹1 लाख की सम्मान निधि दी जाएगी। श्री लोधी की आंखों की रोशनी लाने के लिए जांच भी कराएंगे।
Hanuman Ansh is a movie which has turned theatres into Mandir ❤️
At Inox City Mall, Gorakhpur, after watching the Hanuman Ansh movie, all Ram bhakts are being served laddu, pani, and a copy of the Sunderkand path 🚩
This is not just a film, but a lesson for humans to take good steps and to eliminate the virus of vulgar films spreading in society. Do take your entire family and children to watch Hanuman Ansh. Jai Sitaram
ये है हनुमान अंश मूवी के सिंगर सुनील लोधी भैया जी यह अपनी आँखों से दुनिया तो नहीं देख नहीं सकते लेकिन इन्होने अपनी आवाज को दुनिया तक पहुंचा दिया.. बहुत प्यारी आवाज है भैया जी की भगवान आपको हमेशा खुश रखे।
जय श्री राम 🙏 जय श्री सीताराम 🚩
#hanumananshmovie#singar
पिछले कुछ दिनों से एक चीज़ देखकर मन बहुत खुश है। बुंदेली बोली अचानक उस दायरे से बाहर निकलकर सुनाई दे रही है, जहाँ हम उसे वर्षों से सुनते आए थे।
उत्तर भारत की क्षेत्रीय बोलियों की बात होती रही तो भोजपुरी ने बहुत बड़ी जगह बनाई, अवध और पूर्वांचल की बोलियाँ फिल्मों और गीतों के माध्यम से लगातार सुनाई देती रहीं। लेकिन बुंदेली की अपनी मिठास, अपना ठेठपन और अपनी अद्भुत अभिव्यक्ति होने के बावजूद वह लंबे समय तक मुख्यधारा से कुछ दूर ही रही।
बुंदेली कभी बिल्कुल अनसुनी नहीं थी। देशराज पटेरिया जैसे अद्भुत लोकगायकों ने इसे वर्षों तक जीवित रखा। हमारे इलाके में उनके गीत घरों, मेलों, शादियों और कैसेटों में खूब बजते थे, लेकिन वह लोकप्रियता मुख्यतः बुंदेलखंड की सीमाओं के भीतर रही। फिर फिल्मों ने कभी-कभी इस बोली की ताकत देश को दिखाई।
Bandit Queen के समय बुंदेलखंड की भाषा और उसका कच्चापन लोगों के कानों तक पहुँचा। बाद में Paan Singh Tomar ने भी बुंदेलखंड के बोलने के अंदाज़ को एक अलग पहचान दी। लेकिन दोनों जगह पहचान मुख्यतः संवादों से बनी, गीतों के माध्यम से बुंदेली का राष्ट्रीय स्तर पर सामने आना बहुत कम हुआ।
फिर सोशल मीडिया आया। Instagram और YouTube ने वह काम करना शुरू किया जो शायद मुख्यधारा का मनोरंजन उद्योग नहीं कर पाया। बुंदेलखंड के छोटे शहरों और कस्बों से लोग अपनी ही बोली में बोलने लगे, हास्य करने लगे, कहानियाँ सुनाने लगे और लाखों लोगों तक पहुँचने लगे। धीरे-धीरे अपनी बोली बोलना पिछड़ेपन की निशानी नहीं, अपनी पहचान का गर्व बनने लगा।
और अब “पार्वती” जैसे गीत को जिस तरह पूरे देश में सुना जा रहा है, वह मेरे लिए केवल किसी एक गीत का वायरल होना नहीं है। यह उस बोली का सामने आना है जिसमें पीढ़ियों ने प्रेम किया, नाराज़ हुए, हँसे, पूजा की, किस्से सुनाए और अपना जीवन जिया।
गीत की सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि उसने बुंदेली को बदलकर या उसे किसी शहरी साँचे में ढालकर प्रस्तुत नहीं किया। उसने उसी मिट्टी, उसी उच्चारण और उसी सहजता के साथ उसे सामने रखा और लोगों ने उसे वैसे ही स्वीकार किया।
और मुझसे ज्यादा खुशी शायद किसे होगी। आखिर मैं भी उसी बुंदेलखंड की मिट्टी से निकला हूँ। कभी जिस बोली को अपने इलाके से बाहर सुनना दुर्लभ था, आज उसी बुंदेली को लोग गुनगुना रहे हैं।
समय बदलता है और कभी-कभी अपनी मिट्टी की आवाज़ को वापस आने में बस एक अच्छे गीत की जरूरत होती है।
Well said! The labels like GenZ and Gen Alpha are created to cause friction in families and societies and weaponize them for ideological battles and woke consumerism market!