विद्यार्थी का अपना कोई धर्म नही होता,उसे अशोक भी पढ़ना है और अलेक्जेंडर एवं अकबर भी।
उसे पढ़नी है कांशी की भव्यता भी ओर येरुशलम की पवित्रता भी।उसे जानना होगा सिक्खों के ओंकार को,महावीर के कैवल्य को ओर बुद्ध के निर्वाण को।
#always_a_student.
दी लास्ट स्टैंड।
आज का Cape Verde vs Argentina का मैच फुटबॉल इतिहास में दर्ज होगा।
डिफेंडिंग चैंपियंस के ख़िलाफ़ एक हंबल बैकग्राउंड वाली टीम ने क्या ग़ज़ब लड़ाई लड़ी है। लोपेज का 103वें मिनट पर मारा गया सनसनीखेज एक्वलाइजर। दुनिया के सबसे ज़िद्दी गोलकीपर के सामने इतना क्लीन फिनिश। दूसरी तरफ़ Cape Verde के चालीस साल के गोल कीपर वोज़हिना अर्जेंटीना के हर हमले के ख़िलाफ़ ‘लास्ट मैन स्टेंडिंग’ की तरह डटे रहे।
अगर आपको स्पोर्टिंग स्प्रिट पसंद है तो आप ये मैच देख डालिए। Cape Verde ने कल फुटबॉल के मैदान में महाकाव्य रचा है।
ज़मीन अपनी…
सूर्य की तपिश अगर सहन ��रने के हिसाब से बाँटी जाए…
तो आधा सूर्य भी मारवाड़ का ही है…
और मौज ले रहे हैं ये सोलर कम्पनियों वाले…!!
सौर ऊर्जा पैदा करने मे कौनसी रॉकेट साइंस लगती हैं..
वो तो हम भी कर सकते हैं…
लेकिन अगर लोगों को रोज़गार मिलना शुरू हो गया…
तो नेताओं को ये बात कैसे हज़म होगी…
दस्त लगने शुरू हो जाएँगे नेताओं को तो…!!!
राहुल गाँधी #घोरकलजुग के नास्त्रेदमस है उन्होंने के कहा था देखना भारत रूस से तेल खरीदने से पहले भी अमेरिका से इजाज़त मांगेगा और आज वो ही हो रहा है #IranWar
सवाल — BJP और नरेंद्र मोदी का आरोप है कि आप कमजोर प्रधानमंत्री हैं। आपका क्या ख्याल है?
डॉ. मनमोहन सिंह 🔥 — मैं नहीं स���झता कि मैं कमजोर प्रधानमंत्री हूं। इसका फैसला इतिहासकार करेंगे।
BJP और उनके लोग जो आरोप लगाना चाहें, लगा सकते हैं।
लेकिन अगर मजबूत प्रधानमंत्री से आपका मतलब निर्दोष नागरिकों का नरसंहार करवाना है तो मैं नहीं मानता कि देश को ऐसी मजबूती की जरूरत हैं।
"घर बाहर जाने के लिए उतना नहीं होता जितना लौट के वापस आने के लिए होता है।"
- नौकर की क़मीज़ (विनोद कुमार शुक्ल)
जिस तरह विश्व साहित्य को मारखेज़ ने magic realism दिया, वैसे ही हमारे विनोद जी ने उसे poetic realism से नवाज़ा। काव्यात्मक यथार्थवाद। ना सिर्फ़ उनके गद्य में भी कविता बोलती थी बल्कि उनके जीवन के हर पहलू, उनकी यात्र��� के हर कदम में कविता की सी लय और सहजता थी।
वो कहते थे वो छोटे छोटे वाक्य लिखते हैं क्योंकि लंबे जटिल वाक्य उन्हें ख़ुद ही समझ नहीं आते। शायद इसलिए भी उनका लिखा मानी से ज़्यादा भाव की सतह पर होता - जैसे मुश्किल वक़्त में अपने हाथ में दोस्त का हाथ।
“एक दिन पत्थर भी नहीं बचेगा। मैं चाहता हूँ पत्थर का बीज जीवित रहे।”
विनोद जी पत्थर का भी बीज बचाना चाहते थे। इस तेज़ी से ग़ायब होती दुनिया में - जहाँ पहाड़ नदियाँ शहर तक ख़त्म हो रहे हैं - वो कविता को संजीवनी की तरह मानते थे।
उनके ये बीज हमारी धरती में हैं। ये सौभाग्य हमें मिला, ये उनकी कविताओं की तरह ही चमत्कारी है।
इसी से जान गया मै कि वक्त ढलने लगे
मैं थक के छाँव में बैठा तो पेड़ चलने लगे
मैं दे रहा था सहारे तो एक हज़ूम में था
जो गिर पड़ा तो सभी रास्ते बदलने लगे।
-फरहत अब्बास शाह
नाम: मंदीप जांगरा
काम: बॉक्सर
काबिलियत: एशियन चैंपियन और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित
उपलब्धि: आज ठोकरें खाने को मजबूर हैं।
इनके सवालों का उत्तर है किसी के पास?