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कौन हो तुम
यहां आए कैसे
छोड़ो सवाल
नीचे है विचार
नहीं रही चिड़िया
आप अंगूठे से
उपर स्क्रॉल करो
थोड़ा हमे पढ़लो
नहीं समझे कुछ
कोई नहीं
गांव की जमीन से
निकला एक फुल हूं
खुद के पास
और आपके करीब
अकेला राज हूं
मैं भूल हूं
नहीं समझे अब भी
तो भी 🆒 हूं ।
🫶🙏✌️
~ बेज़ार
जब समझाता हूं
मां बाप को की गलत है तुम्हारा जीना
बाप बोलता है पैसा चाहिए
मां का वही सब के घर में तो चल रहा है
ऐसा ही रंडी रोना
कैसे किस तरह अब बताऊ
ये जानवरो को
जरूरत है इल��ज की
अपना घमंड अपना कपट
अपना स्वार्थ अपना भूत
छोड़ने की
मैं मजबूरी कितनी झेलूं
और कितना अकेले लड़ूं?
~bz
फिरसे क्��ा घर छोड़ूं
इनका अंधकार मुझे खा रहा
ये लाशे बनके जी रहे
मैं कितना समय खराब करूं
जहां होना चाहिए इनका इलाज
अस्पताल में
कितना घर में इनके साथ सडु
ये सुनते नहीं किसी की
इनको आदत हो गई है
ऐसे जीने की
क्या फिरसे ये गांव छोड़ूं
इस दुनिया से दूर
अपना एक मुक़ाम बनाऊँ।
~बेज़ार
फिर से बाप का तमाशा
वही दारू पीके
मानसिक दुःख क्रोध का इकरार करना
ये सब वो हे जान बुझ कर करता
मां का वही चिढ़ना
मुझे तंग है करता
मैं नहीं बना संत
बहुत काम है मुझ पर करना
कितना खुद को नीचे उतारू
जब ये बातों से नहीं मानते
तो क्या लाते मारु
कितना खुद का अपमान करूं
दूसरों पर क्या निर्भर रहना
कोई नहीं मरता
साथ तुम्हारे
��केला जीना है और मरना
कभी कभी लगता है
लेले क्या जीते जी समाधी
पर क्या मन वहां तक पहुंचा
ये कब तक चलेगा
सब बिकते है पैसे पर
ये घटिया समाज
न ज्ञान की सुनता
याद रखना
सत्यानाश कोई दूसरा नहीं
तुम्हारा अहंकार है करता।
~ बेज़ार
मानसिक अत्याचार की कोई हद नहीं होती
बता रहा हूं मैं तुम्हे
जो भी पढ़ रहा हो ये
बचपन से देखी है हिंसा
लगा पढ़ाई करूंगा और नौकरी करूंगा तो आएगी शांति
साला जिल्हा में टॉप किया
ऑटोनॉमस से इंजिनियर बना
कम्पूटर चला के पैसा कमाया
घर पर दिया कर्जे उतारा
लेकिन घर शांति का दिया न जला
ये तो मिटेगा नहीं कमाके पैसा
तंग आ गया तो छोड़ दी गुलामी
और निकला करने जो था प��ंद
बच्चों को पढ़ाना और लोगों की करना मदत
तब बहुत कुछ हुआ और गेम सब बिगड़ा
जब विरोध मिला घर से
न साथ किसी से
सब जीते है अपने स्वार्थ के लिए
और मैं तमाशा बना
यहां कोई नहीं अपना
तुम चलते रहना देखना सपना
मेरी शांति का
मौन होने का फायदा मत लो
टूंट चुका था
जुड़ रहा हूं
इसका फायदा मत लो
देख रहा हूं
इन खुली आँखों से
सुधर जाओ
मैं तूफान हूं
आग हूं
मेरी शांति भंग न करो
ऐसा जला दूंगा कि
राख भी नसीब नहीं होंगी
जिंदगी मिली है सही जी
वरना लवडों गांड लगेगी
कोई बात नहीं बचेगी।
~ बेज़ार
कमजोर की गांड
मारते है ये लोग
बोलते कुछ और
करते कुछ और
नफरत की आड़ में हंसते है
पीट पीछे वार करते है
कौन है भला ये लोग
एक साथ रहते है
कभी मां कभी
बाप बनते है ये लोग
कोई सगे नहीं हैं किसी के
बस ढोंग करते है लोग
रिश्तेदार तो कभी
पड़ोसी बनते है लोग
दोस्त बनते है लोग ।
~ बेज़ार
दुनिया तमाशा देखती है
पैसे नहीं तो घाव देती है
लोग मतलबी
अपने आप का देखते है
क���म आए तो वाह वाह करती है
कुछ फायदा रहा तो चिपकती है
नहीं तो तु कौन कहती है
मन में कपट और क्रोध पालती है
कपटी है गालियां देती है
ये दुनिया गांव की है
यहां चुगली चलती है
पागलों की भरती है ।
~ बेज़ार
मैं लिख देता हूं
जो मन में आते है विचार
उन्हें उतार देता हूं
परिस्थिति वही है
आजु बाजू लोग वही है
मेरी सोच नई है
कमजोरी काफी हैं
पर खड़ा रहता हूं
कभी अच्छा कभी बुरा बनता हूं
मैं जो हूं लिख देता हूं
रोता नहीं खुद पर हस देता हूं
तुम पागल समझो या मूरख मुझे
मैं परख लेता हूं।
~bz
मैं कितना खुद से कहूं
कितना खुद का मजाक उड़ाऊ
जीना कितना है यहां
कीड़े मकोड़े जैसा इंसान का हाल
सब भूल जाते है
कोई याद नहीं रखता
तो किसपे करे भरोसा
दूसरों पे.. नहीं
खुद को करना है साफ
लड़ाई बहुत भारी
कही शरीर न छूट जाए
कौन चलाएगा ये नाव
जब इंसान तराशता हो
पैसा और प्यार।
~ बेज़ार
लोगों का अच्छा सोच के
खुद कर्जे में बढ़ गया
कितनो को लगा मैं
चुतिया बन गया
समाज की सेवा होगी कैसे
गर मैं गरीब जो ठहरा
ज्ञान की परवा
यहां थोड़ी कोई करता
सबको चाहिए संभोग और पैसा
इस देश का होगा कैसा
जब खाने को नहीं रोटी
और पहन ने को न कपड़ा
केवल नोटों पर हो गांधी छपता।
~ बेज़ार
क्यों करते है शादी लोग
कहा मिल रहा है इन्हें
शारीरिक स���ख
मानसिकता देती इन्हें दुःख
व्यवहार था राज जमाने में
संपति हार के बदले
मिलते थे सुंदर खड्डे
अब तो गरीब लड़की भी
सोचती है वो राजकुमारी
बेरोजगार तो सारे राजकुमार
चला रहे परंपरा
ए पढ़ने वाले तू अपना देखना
उंगली न हिलाना।
~bz
ये क्या हो गया हैं इन लोगों को
सोचना भूल गए है के
बंदर के भी पहले के बन गए
अमीबा के बाप बने बैठे हैं
अकेले का सोचते है
स्वार्थी मतलबी इतने कि
झूठे नाते बनाते हैं
अज्ञानी होके भी ज्ञान बाटते हैं
घर का कचरा रस्ते पे फेंकते है
सोचते हैं इनके देवता आके साफ करेंगे
मंदभक्त है।
~bz
तब जाके मैने घर छोड़ा
जून का महीना
पुणे जाके इतना फूंका
पूरे दिन नशे में धुंध
अपने आप को ढूंढ़ा
तब जाके ��त्तर मिला
मैं तो बचपन से ही निराश
इतना हासिल करके भी
कहां खुश था
गरीबी तो विचारों की है
मैने गलत था समझा
पैसे से घर शांत होगा
वो तो अज्ञान था
खेल अब शुरू हुआ था ...
~ बेजार
साल उन्नीस बीस की बात है
चूत���यों का साथ छोड़े में
अकेले रहने लगा
शरीर पर काम
और नशे से दूर होना था
कब तक अकेला हिलाएगा
कोई साथ चाहिए ऐसे दिमाग ने कहां
दिल तो बेईमान ढूंढता फिरता था
किसी को भी कैसे नंगा करेगा
अपने लायक तो मांगता
दिमाग ने कहां तुझे तो देश बदलना था
तब भी वहीं हाल था
तब चांटा पड़ा था
बाप का दारू पीके तमाशा आम था
गांव में झगड़े छुडाना मेरा काम था
त्योहार खराब करना
घर के कार्यक्रम भंग करना
उसका काम था
पर सर पर मारना
नशे में वो था
मुझे तो शांत रहना था
ये गलत था
बाप और मुझमें फरक क्या
बाप जैसे तो नहीं न था बनना
गहराई में डाला