टीकमगढ़ के स्वास्थ्य केंद्र में कलेक्टर के सामने CHO महिला मरीज का BP नहीं ले पाईं। कलेक्टर को खुद आकर मशीन पकड़कर सिखाना पड़ा। ना जाने यही हालत कितने स्वास्थ्य केन्द्रों की होगी
ये कोई छोटी बात नहीं है। जो बुनियादी जाँच नहीं कर सकता, वो गाँव के स्वास्थ्य केंद्र में कैसे बैठा है? ट्रेनिंग कहाँ हुई? भर्ती कैसे हुई?गाँव के मरीज की जान इन्हीं हाथों में है। स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत यही है और जितनी कमिया और लाचारी स्वास्थ्य विभाग में है उतनी सायद ही किसी में हो ।
भाजपा दीर्घकाल से एक मेरिट विरोधी पार्टी रही है! हर स्तर पर आरक्षण का समर्थन करती रही है। प्राइवेट में आरक्षण के लिए लम्बे समय से दलील दे रही है। मुसलमानों को ओबीसी में हर जगह घुसा रखा है। न्यूनतम मार्क्स का क्राइटेरिया इन्होंने ही हटाया।
और यह जान लीजिए कि राहुल गाँधी विपक्ष में रहते हुए, भाजपा से प्राइवेट में आरक्षण 2028 में ही करवा लेगा। कास्ट सेंसस पर इनकी सहमति केवल और केवल उसी बकलोली के लिए है।
कास्ट सेंसस में कोई री-चेक नहीं है। हमने पढ़ा है कि किसी जगह जैन समाज के लोगों की जातियों के कॉलम में ‘ओबीसी’ लिखा जा रहा है। ऐसे घटिया आँकड़ों के साथ भाजपा सामान्य वर्ग की पीठ में पुनः तलवार मारेगी ही।
इनमें आज तक यह साहस नहीं हुआ है कि ये UGC पर दो शब्द ढंग से बोल सकें। ये पतितों की तरह, ‘स्टे तो लग गया न’ बोल कर काम चला रहे हैं। अबे पापियों, तुम्हारा स्टैंड क्या है इस पर, वो तो बताओ। कोर्ट में तो हम गए तब स्टे मिला, तुमने घंटा दिया?
अतः, जो भी आपको यह चूरन बाँट रहा है कि सोचो, फलाना आ जाएगा, तो उसको बोलिए कि फलाना जो सोच रहा है, वो भाजपा पहले ही कर चुकी है।
मीडिया और सोशल मीडिया पर SC/ST एक्ट को लेकर बहस चल रही है। मैं एक आदिवासी के तौर पर अपनी बात रखती हूँ;
SC/ST एक्ट का इस्तेमाल कौन करता है? मैंने देखा है कि SC/ST एक्ट के तहत ज़्यादातर फ़र्ज़ी मामले अनुसूचित जाति (SC) के लोगों द्वारा दर्ज कराए जाते हैं, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST) के बहुत कम लगभग न के बराबर...
मैं दलितों की बात नहीं करूँगी, वे अपना देखें; मैं सिर्फ़ आदिवासियों (ST) के बारे में लिखूँगी। मैं अपनी ही बात करूं तो अब तक ज़िंदगी में मुझे कभी भी अपनी जाति की वजह से किसी तरह के भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। बल्कि, मुझे समाज के हर वर्ग और जाति के लोगों से प्यार और अच्छा व्यवहार ही मिला है।
मैं झारखंड की आदिवासी हूं। मैंने देखा है जो आदिवासी जंगलों, पहाड़ों और दुर्गम ग्रामीण इलाकों में रहते हैं, उन्हें तो इस एक्ट के प्रावधानों के बारे में 'ABCD' तक नहीं पता। सिर्फ़ तथाकथित आदिवासी एक्टिविस्ट, ज़मीन माफ़िया और आदिवासी नेता ही इसका इस्तेमाल अपने विरोधियों को फंसाने या बदला लेने के लिए राजनीतिक और कानूनी हथियार के तौर पर करते हैं। आम आदिवासी समुदाय का इससे कोई बहुत ज्यादा लेना देना नहीं है। हाँ, कुछ पिछड़े और ग्रामीण इलाकों में थोड़ा-बहुत भेदभाव हो सकता है, इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
कई लोग SC/ST एक्ट को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। मैं SC/ST एक्ट को हटाने कि पक्षधर नहीं, आदिवासी समुदाय के लिए एससी एसटी एक्ट, आदिवासियों को उनके "जल जंगल जमीन" को गैर - आदिवासी (दिकू) भू-माफियाओं से संरक्षित करने और बचाने में कानूनी रूप से कारगर है। SC/ST एक्ट को खत्म करने की नहीं बल्कि इसमें व्यापक संशोधन की ज़रूरत है। किसी सूरत में SC/ST एक्ट का गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। @ajeetbharti
#StopMisuseOfSCSTAct
रिजर्वेशन की बात करते उसे जनरल कास्ट Vs SC/ST/OBC की लड़ाई बनाने की साज़िश वही लोग करते हैं जिन्हें इस वीडियो में बतायी सच्चाई पता है।
देखिए कैसे ओबीसी की 75% जातियों को 3% हिस्सा भी नहीं मिला आरक्षण के फायदे का और 25% जातियां 97% फायदा ले गईं।
उन्हें पता है समीक्षा होगी तो पूरे देश का सच सामने आ जाएगा
Which profession is hardest for a foreign-trained professional to enter and practice in the West?
Answer: Medicine. Why? Common sense. You simply can't entrust the lives and health of your citizens to someone whose training and competence haven't been thoroughly tested. That's why the West has a rigorous, multi-stage licensing process, followed by demanding residency requirements before a foreign-trained doctor can practice independently.
Compare that to India. We have people scoring minus 40 marks who should ideally be banned from ever appearing for medical entrance exams, yet are currently becoming doctors. A profession that deals with life and death, have lowest margin of error, and therefore should demand the highest level of competency, has become one of the biggest laboratories for affirmative action. Really sad state of affairs.
He is the son of a nine-time MP and a three-time MP himself. How much more empowerment does he need?
He has wealth, power, and political clout, so why does he continue to contest from reserved seats? Why not fight from an open seat? By monopolizing a reserved constituency, isn't he actively preventing a less privileged Dalit brother or sister from his party from entering Parliament?
And he isn't alone. There are many like him in every field. This argument is not a conspiracy by the GCs; they gain nothing either way. It is a question of internal accountability. Your own influential elites are holding the broader community back by refusing to step aside. So Dalits should start asking questions about where the real issue lies, instead of blaming GCs for their lack of opportunities.
दुनिया में चीनी उत्पादन में भारत दूसरे नंबर पर है, फिर भी आज चीनी आयात करने की नौबत आ गई है।
सवाल सिर्फ चीनी का नहीं है। देश की Economy और Import-Export पर नजर रखने वाले जिम्मेदार लोगों को क्या इसकी भनक तक नहीं लगती कि जिस देश को Export करना चाहिए, वह लगातार जरूरी चीजों के लिए Import पर निर्भर क्यों होता जा रहा है?
समस्या कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा शायद जिम्मेदारों को न हो, लेकिन इसके परिणाम अब साफ दिखाई देने लगे हैं।