विडंबना देखिए- पितृसत्ता की बेड़ियाँ पुरुषों ने गढ़ीं, मगर कई स्त्रियाँ ही उन्हें दूसरी स्त्रियों के पैरों में कसती रहती हैं; यही मानसिक गुलामी की पराकाष्ठा है।
फागुन का गुलाल आया सुंदर सा दिखाई दे,
नव मेघ घिरे मानो अम्बर सी दिखाई दी।
वो रात की बातें थीं कस्तूरी की ख़ुशबू सी,
धड़कन वो मचलती उस दिलबर सी दिखाई दी।
मुख पर ये तबस्सुम है सावन का हसीं मंज़र,
तपती हैं निगाहें भी जेठर सी दिखाई दी।
प्रेम में दुख अनिवार्य नहीं, पर गहरे प्रेम की संभावना है। जब आप किसी को पूरी तरह खोलकर चाहते हैं, उसकी पीड़ा आपको छूती है, विछोह या असफलता कष्ट देती है। यह दुख प्रेम की गहराई का प्रमाण भी हो सकता है, परंतु स्थायी प्रेम का लक्ष्य सुख और सहयोग ही होना चाहिए।
- भारमल गर्ग "विलक्षण"