आखिर सवाल अभ्यर्थियों की योग्यता पर ही क्यों?
स्कूल व्याख्याता (राजनीति विज्ञान) के 645 पदों के लिए आयोजित परीक्षा में महज 67 अभ्यर्थियों का सफल होना बेहद चिंताजनक है। सबसे पीड़ादायक बात यह है कि राजनीति विज्ञान में लगातार तीसरी भर्ती में पद रिक्त रहने की स्थिति बन रही है।
योग्य उम्मीदवारों की तलाश के लिए सरकार पूरा भर्ती तंत्र खड़ा करती है। परीक्षा आयोजित होती है हजारों अभ्यर्थी आवेदन करते हैं, परीक्षा केंद्र बनाए जाते हैं, कर्मचारी व अधिकारी लगाए जाते हैं और सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च होते हैं।
इतना सरकारी तंत्र और सार्वजनिक धन खर्च होने के बाद भी यदि वैकेंसी के अनुपात में योग्य अभ्यर्थी ही उपलब्ध नहीं हो पाते, तो हर बार सिर्फ अभ्यर्थियों की योग्यता पर सवाल उठाना उचित नहीं है।
एक बार ऐसा हो सकता है कि योग्य उम्मीदवार कम मिले, दो बार हो तो समीक्षा की जरूरत है लेकिन लगातार तीसरी बार वही स्थिति बने तो सवाल परीक्षा व्यवस्था और प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया पर भी उठना स्वाभाविक है।
क्या ऐसा प्रश्नपत्र तैयार नहीं किया जा सकता जिसमें विषय की वास्तविक समझ, शिक्षण क्षमता और अभ्यर्थी की योग्यता परखी जाए और 645 पदों के मुकाबले कम से कम 2-3 गुना अभ्यर्थी सफल होकर उपलब्ध हो सकें?
क्योंकि जब पद खाली रह जाते हैं तो नुकसान सिर्फ नौकरी चाहने वाले युवा का नहीं होता। नुकसान उस विद्यार्थी का भी होता है जो सरकारी स्कूल में शिक्षक का इंतजार कर रहा है।
सबसे दर्दनाक स्थिति उन युवाओं की है जिन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातक किया, फिर मास्टर डिग्री की, वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की और अब लगातार रिक्तियां खाली जाने के कारण अपना विषय छोड़कर दूसरी मास्टर डिग्री करने को मजबूर हो रहे हैं।
अभ्यर्थियों को दोष देने से पहले प्रश्नपत्र निर्माण और परीक्षा प्रणाली की भी ईमानदारी से समीक्षा करने की आवश्यकता है।
क्योंकि सरकारी धन, युवाओं के समय और प्रदेश के विद्यार्थियों के भविष्य को इस तरह दांव पर नहीं लगाया जा सकता।
यह सिर्फ 645 पदों की भर्ती का मामला नहीं है,
यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो योग्य शिक्षक खोजने के लिए बनी है, लेकिन योग्य अभ्यर्थी उपलब्ध कराने में लगातार असफल हो रही है। 🙏
#स्कूल_व्याख्याता #राजनीति_विज्ञान
संसद सत्र की शुरुआत के मौक़े पर कल अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने नेता विपक्ष राहुल गांधी का नाम लिए बग़ैर '56 साल का युवा' कह कर तंज कसा था।
अब वही '56 साल का युवा' पीएम नरेन्द्र मोदी के आवास के बाहर तन गया है। तो क्या '76 साल के युवा' की ज़िम्मेदारी नहीं बनती है कि बाहर निकल कर '56 साल के युवा' को समझाएं!
मैं बस पूछ रहा हूं। आपकी राय क्या है?
रेल मंत्री जी , सवाल बहुत सीधा है।
15 साल बाद भी ट्रेन लेट होने की समस्या जस की तस है।
तत्काल टिकट बुकिंग आज भी टिकट कम और डिजिटल जुआ ज्यादा लगती है।
IRCTC पर लॉगिन , CAPTCHA, OTP, पेमेंट और सीट - सब भगवान भरोसे चलते हैं।
स्टेशन और ट्रेनों में फूड वेंडर मनमानी करते हैं।
कभी ओवरचार्जिंग, कभी खराब क्वालिटी, कभी बिल नहीं - लेकिन कार्रवाई सिर्फ पोस्टर और ऐप में दिखती है।
देश की आबादी बढ़ती रही, यात्री बढ़ते रहे, लेकिन ट्रेन और सीटों का अनुपात उसी पुराने हिसाब में अटका पड़ा है।
त्योहारों पर जनता इंसान कम और मालगाड़ी का सामान ज्यादा महसूस करती है।
सवाल यह है कि जब ट्रेन समय पर नहीं चल रही , टिकट समय पर नहीं मिल रहा , खाना सही दाम पर नहीं मिल रहा और यात्रियों के लिए पर्याप्त ट्रेनें नहीं हैं, तो 2047 का विकसित भारत किस प्लेटफॉर्म से छूटेगा?
रेल मंत्री जी, देश को सिर्फ वंदे भारत की फोटो नहीं चाहिए।
देश को समय पर ट्रेन , आसान टिकट, साफ खाना, सुरक्षित सफर और पर्याप्त सीटें चाहिए।
कृपया बताइए - हम 2047 के बाद अचानक विकसित होंगे, या उससे पहले भी आम यात्रियों के अच्छे दिन आने का कोई chance है?
>मान लिया कि वो टीचर नहीं बिजनेस मैन हैं,
>मान लिया कि वो पैसों के लिए पढ़ाते हैं,
>मान लिया के उन टीचर्स में कुछ कोचिंग माफिया भी हैं,
लेकिन तुम क्या हो?
>तुम्हारे अंदर कौन से गुण मीडिया के हैं,
>अंतिम समय कब जनता की आवाज उठाई थी
>रातों दिन बस सरकार की गुलामी करते हो
>रुपया गिरने का फायदा बताते हो
>मंहगाई के फायदे बताते हो
>टैरिफ में तुम्हारा मुंह नहीं खुलता
>NEET पेपर लीक में तुम्हारा मुंह नहीं खुलता
>भ्रष्टाचार के लिए अंतिम बार कब डिबेट हुई थी?
>बेरोजगारी के लिए कब डिबेट हुई थी?
>लोगों के स्वास्थ्य के लिए कब डिबेट हुई थी?
>बढ़ते प्रदूषण के लिए कब डिबेट हुई थी?
तुमसे अच्छे 499 रुपए लेकर गरीब बच्चों को पढ़ाने वाले टीचर्स हैं।
बेशर्मों
“क्या पाकिस्तान इज़राइल को मान्यता देगा?”
एक पत्रकार पाकिस्तानी विदेश मंत्री डार और अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो से ज़ोर लगा कर पूछते हुए
अमेरिका और पाकिस्तान दोनों के विदेश मंत्रियों ने रिपोर्टरों के सवालों को नज़रअंदाज़ कर दिया
जनता के मुद्दे -
1- शिक्षा
2- स्वास्थ्य
3- रोजगार
4- गरीबी
5- मंहगाई
सरकार के मुद्दे -
1- वंदे मातरम्
2- पाकिस्तान
3- हिंदू मुस्लिम
4- मुझको गाली दी
विपक्ष के मुद्दे -
1- EVM हटाओ
2- जाति जनगणना
4- लोकसभा स्पीकर हटाओ
5- वोट चोरी
मीडिया के मुद्दे -
1- सीमा हैदर का छठा बच्चा
2-मुस्कान को जेल में बेटी हुई है
3- आम काट कर खाते हो या चूसकर
>तर्क देश की जनसंख्या बढ़ रही है , इसलिए सांसदों की संख्या भी बढ़नी चाहिए ,
>जनसंख्या के हिसाबों स्कूलों की संख्या क्यों नहीं बढ़नी चाहिए ?
>सरकारी टीचरों की संख्या क्यों नहीं बढ़नी चाहिए ??
>अस्पतालों की संख्या क्यों नहीं बढ़नी चाहिए??
>इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या क्यों नहीं बढ़नी चाहिए?
>डॉक्टरों की संख्या क्यों नहीं बढ़नी चाहिए ??
“दुनिया के ताकतवर देश अरबों खर्च करते रह गए… और भारत ने चुपचाप वो कर दिखाया, जिसकी उम्मीद भी कम थी!”
भारत ने हाल ही में PFBR यानी Prototype Fast Breeder Reactor में “First Criticality” हासिल कर ली है।
इसका सीधा मतलब है कि इस परमाणु रिएक्टर में पहली बार सफल और नियंत्रित न्यूक्लियर रिएक्शन शुरू हो गया है, यानी अब यह पूरी तरह काम करने के लिए तैयार है।
अब आसान भाषा में समझो - यह कोई साधारण रिएक्टर नहीं है। यह जितना ईंधन इस्तेमाल करता है, उससे ज्यादा नया ईंधन बना सकता है। इसलिए इसे “Breeder Reactor” कहा जाता है।
इस तकनीक का सपना भारत के महान वैज्ञानिक Homi J. Bhabha ने देखा था, ताकि भारत भविष्य में ऊर्जा के लिए किसी पर निर्भर न रहे।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि United States और Japan जैसे देशों ने इस तकनीक पर अरबों रुपये खर्च किए, लेकिन उन्हें बार-बार असफलता मिली।
वहीं भारत ने सीमित बजट में यह बड़ी सफलता हासिल कर ली।
इसका फायदा क्या होगा? भारत के पास थोरियम का बहुत बड़ा भंडार है, और यह रिएक्टर उसी को भविष्य में ईंधन में बदल सकता है। यानी आने वाले समय में भारत सस्ती, सुरक्षित और लंबे समय तक चलने वाली ऊर्जा खुद पैदा कर सकेगा।
और यही असली गेम बदलने वाली बात है - अब भारत सिर्फ ऊर्जा उपभोक्ता नहीं, बल्कि भविष्य का ऊर्जा सुपरपावर बनने की ओर बढ़ रहा है।
~50 रुपए दवा 500 MRP में बिक रही है,
~7 रुपए का इंजेक्शन 700 में बिक रहा है,
~कही ब्लड टेस्ट 200 का है, तो कहीं 2000 का,
~कहीं MRI 3500 रुपए की है, तो कहीं 7000 की,
~कहीं CT स्कैन 2000 रुपए का है, तो कंही 4000 का,
~लेकिन सत्ता पक्ष और विपक्ष का ध्यान है कि कौन सी मूवी अच्छी है कौन सी खराब।
विडंबना
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति में बड़ी हार - समझिए
इजरायल और अमेरिका की विदेश नीति में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बहुत बुरी तरीके से फँस गए हैं और यह भारत की विदेश नीति की बहुत बड़ी हार है।
आप समझिए कि भारत के प्रधानमंत्री के इजरायल दौरे के तुरंत बाद ही ईरान पर हमला क्यों किया गया। इसके पीछे एक बहुत बड़ी रणनीति है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के भारत के कई सारे दौरे रद्द हुए। कई बार प्रयास लगाए गए कि वो भारत यात्रा करेंगे, लेकिन उन्होंने भारत की यात्रा नहीं की। अंत में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वहाँ की यात्रा की और वहाँ गर्मजोशी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत किया गया।
जिस तरीके से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायल के लिए बोला, यह बात इस समय विश्व स्तर पर एक संदेश गई कि भारत इजरायल के साथ खड़ा है। बल्कि असलियत यह है कि ईरान भारत का वो मित्र देश है जो काफी लंबे समय से भारत के साथ खड़ा रहा है। पाकिस्तान जैसे इस्लामिक कट्टरपंथी देश को भी नियंत्रित करने में ईरान का बहुत बड़ा हाथ रहा है। भारत के प्रधानमंत्री को वहाँ की संसद में सम्मानित किया गया।
और जैसे ही भारत के प्रधानमंत्री वहाँ से आए, उसके तुरंत बाद इजरायल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया। यह भारत के प्रधानमंत्री की यात्रा नहीं, बल्कि इजरायल और अमेरिका की एक सुनियोजित योजना थी जो पूरी तरीके से उनके लिए अब कारगर साबित हो रही है।
इजरायल और अमेरिका के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को मार दिया गया है। एक तरफ अमेरिका द्वारा इसी साल वेनेजुएला पर हमला और वहाँ के राष्ट्रपति को अपने नियंत्रण में ले लेना, और दूसरी तरफ अब ईरान में हमला और वहाँ के सर्वोच्च नेता को मार देना। लेकिन अभी तक इसके ऊपर भारत की कोई भी स्पष्ट स्थिति नजर नहीं आई है।
क्या भारत इन दोनों ही हमलों में अमेरिका के साथ है? क्या वो इस हमले में इजरायल के साथ है? इस हमले से बस थोड़े दिन पहले अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहाँ गए और वहाँ पर इजरायल को अपने सबसे अच्छे दोस्तों में से एक बताया, तो दुनिया को अब एक संदेश जाएगा कि भारत इजरायल के साथ खड़ा है।
यह एक सुनियोजित योजना के तहत प्लान किया गया था। वरना इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत का दौरा क्यों नहीं किया? क्यों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इजरायल जाना पड़ा? क्या केवल एक सम्मान दे देने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी राजनीति चमकाने के लिए इजरायल चले गए और यह संदेश देने की कोशिश की कि देखिए इजरायल के साथ हमारे संबंध किस प्रकार के हैं?
लेकिन उसकी वजह से अब भारत की विदेश नीति की बहुत बड़ी हार हुई है। यह कहानी केवल इतनी नहीं है। इस कहानी में इजरायल और अमेरिका की जीत हुई है और भारत की विदेश नीति की हार। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हार हुई है - केवल और केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए।
एक ने सिर्फ एक फोन पर गिड़गिड़ाकर युद्ध बंद कर दिया था…
—
खुद को बचाने के लिए नाच लिया,
दोस्त को बचाने के लिए देश को बेच दिया।
—
और एक था…
जो मिट गया पर झुका नहीं।
न बिका, न डरा।
देश को अपनी जान से ऊपर रखा।
—
देश सरेंडर से नहीं,
संघर्ष और समर्पण से चलते हैं।
#Khamenei
वीर मैदान से भागते नहीं। योद्धा अमर रहते है।
इतिहास उनके देहांत को लिखता है "वीरगति"।
#Khamenei
ये मैटर नहीं करता है की अब ज़िंदा नहीं है . मैटर ये करता है बंदा जिया कैसे है
अमेरिका के सामने ना झुका ना रुका .
ना बंकर में छिपा ना भागा . अपने लोगो के लिए कैसे लड़ना है दुनिया को सीखा गया!
ख़ामनेई अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उन्होंने अंत तक अपने देश को नहीं छोड़ा। ना बंकरों में छिपे, ना किसी दूसरे देश से मदद की भीख मांगी, ना अपने लोगों के साथ विश्वासघात किया।
सत्ता और संघर्ष के बीच खड़े रहना ही नेतृत्व की असली पहचान होती है। इतिहास गवाह है कुछ लोग पद से नहीं, अपने रुख से याद किए जाते हैं।
#Khamenei
📱 टेलीकॉम टैरिफ नहीं बढ़े — जनता की मजबूरी को रेट-कार्ड बना दिया गया है।
पिछले साल जुलाई 2024 में 27% की भारी बढ़ोतरी की गई।
सरकार ने कहा — “मार्केट डिसीजन है”
अब 2025 में एक बार फिर Airtel, Jio और Vodafone
20% से ज़्यादा की बढ़ोतरी — वो भी एक साथ।
ये संयोग नहीं है। ये कार्टेलाइजेशन है।
🔻 तथ्य समझिए:
🔹 Airtel
319 → 419 (28 दिन)
449 पोस्टपेड → 539
🔹 Jio
299 → 359
349 → 429
🔹 Vodafone
340 → 419
579 → 699
तीनों कंपनियों का टाइमिंग एक।
तीनों का प्रतिशत लगभग एक।
तीनों का बहाना एक — “5G, निवेश, लागत”
❓पर सवाल ये है:
क्या नेटवर्क 20% बेहतर हुआ?
क्या कॉल ड्रॉप खत्म हुए?
क्या ग्रामीण भारत में कवरेज बढ़ा?
क्या कस्टमर केयर सुधरा?
❌ जवाब — नहीं।
दिल्ली से मुंबई का किराया = 50 हजार
दिल्ली से जयपुर का किराया = 85 हजार
दिल्ली से उदयपुर का किराया = 70 हजार
दिल्ली से कोलकाता का किराया =45 हजार
दिल्ली से हैदराबाद का किराया =1 लाख
दिल्ली से मुंबई और दिल्ली से बेंगलुरु के बीच कोई उड़ान उपलब्ध नहीं..
इसे कहते हैं आपदा में अवसर तलाशना...
सच यह है कि जब Jio ने एक साल फ्री डेटा दिया, हमने बाकी कंपनियों को खुद ही मरने दिया।
आज हमारे पास विकल्प लगभग खत्म हैं , बस Jio और Airtel.
कल अगर यही कंपनियाँ IndiGo जैसी मनमानी करें, तो कौन रोकेगा?
कौन गारंटी देगा कि ये पूरे देश को बंधक नहीं बनाएँगी?
डेटा पैक अब बेसिक जरूरत बन चुके हैं —
लेकिन सरकार का नियंत्रण लगभग नाममात्र है।
और याद रखिए —>>
Monopoly किसी भी देश और सिस्टम को तबाह कर देती है।
यूरोप में इसके साफ उदाहरण मिलते हैं>
• यूके में रेल मोनोपॉली के कारण किराए और सर्विस दोनों बिगड़ीं
• फ्रांस में ऊर्जा कंपनियों की मोनोपॉली ने कीमतें आसमान पर पहुँचा दीं
• जर्मनी में टेलीकॉम ड्यूपॉली ने उपभोक्ताओं को महंगे डेटा पैक में फँसाया
जब बाज़ार में सिर्फ गिने-चुने दिग्गज बचते हैं,
तो जनता का हित, कीमतें, गुणवत्ता ,
सब उनकी मर्जी से चलता है, न कि देश के नियमों से।
यही असली खतरा है।
केन्द्र सरकार को सदन में घेरने के लिए दर्जनों मुद्दे पडे हैं…
रुपये की हालत…
मेक इन इंडिया…
Ethanol Blinding…
अवैध खनन..
प्रदूषण…
गंगा यमुना सफ़ाई…
अड़ानी को सस्ते अलॉटमेंट…
लचर शिक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे अनेकों मुद्दे है…
लेकिन विपक्ष इनमें से किसी पर सदन में चर्चा नहीं कर रहा है…
और इन सबसे विपरीत…
वोट चोरी
EVM
SIR
सदन में कुत्ते लाना जैसे अपने मनघडत बनाए गए मुद्दों पर संसद के बाहर हंगामा कर रहा है…
और फिर विपक्ष को लगता है कि जनता हमारे मुद्दों को सच मानेगी और हमारा साथ देगी…
विपक्ष पिछले 11 सालों से इसी ट्रैक पर चल रहा है और मात खा रहा है…
और अपनी ग़लतियों से सीखने को तैयार तक नहीं है…