तुम निकले थे लेने स्वराज,
सूरज की सुर्ख़ गवाही में,
पर आज स्वयं टिमाटिमा रहे,
जुगनू की नौकरशाही में,
सब साथ लड़े,सब उत्सुक थे,
तुमको आसन तक लाने में,
कुछ सफल हुए निर्वीय तुम्हें
यह राजनीति समझाने में.
इन आत्मप्रवंचित बौनों का,
दरबार बना कर क्या पाया ?
जो शिलालेख बनता उसको,
अख़बार बना कर क्या पाया...?👎