क्या अपर्णा… तुमसे रोया भी ना गया !
अपर्णा यादव अपना चेहरा अपने दिवंगत पति से 90 डिग्री पूर्व की ओर रखकर...18 के डेसिबल पर चीखी होतीं...2 मिनट 53 सेकेंड तक आंखो से 5 मिलीलीटर आंसू निकाले होते...तो शायद वो आदर्श पत्नी होती।
या क्या पता इससे भी कुछ और नपा तुला तय है जो उन्हें करना चाहिए और वो नहीं कर पाई इसलिए वो आदर्श पत्नी नहीं रह गईं।
मुझे डर है उन पर सवाल उठाने वाले कहीं अपने घरों में परिजनों की मृत्यु की मॉक ड्रिल्स ना करवाते हों...ताकि सब उनके तय हिसाब से हो। पर ईश्वर के तय हिसाब का आज तक कौन हिसाब लगा पाया है।
और आपके घर की मृत्यु पर आपके परिजन आपके हिसाब से रोएंगे ना। अपर्णा यादव आपके फूफा की मृत्यु के हिसाब से कैसे आपकी भूमिका निभा सकती हैं? उनसे ये अपेक्षा क्यों?
कई लोग सवाल उठा रहे हैं जब पति बीमार थे तो वो असम क्यों गई…यहां क्यों गई… वहां क्यों गई? बड़ी साधारण सी बात है कि वो पत्नी और मां होने के साथ ही महिला आयोग की अध्यक्ष भी हैं, बीजेपी की नेता भी हैं...वो असम इसीलिए गईं क्योंकि उन्हें ये दायित्व भी निभाना था।
गिद्ध की तरह स्क्रूटनी पर बैठे समाज की जींस कभी मंदिरा बेदी की जींस से मैच नहीं खाती इसलिए वो कहता है कि उन्हें अपने पति के अंतिम संस्कार पर जींस नहीं पहननी चाहिए थी।
अपर्णा यादव महिला आयोग की अध्यक्ष हैं। जब उनके शोक पर सवाल उठ रहे हैं तो वो समझ सकती हैं उन्हें कैसे समाज से महिलाओं की रक्षा के लिए...उनके कल्याण के लिए... अपनी आवाज उठानी है।
दरअसल पति के जाने पर छाती पीटती औरतें इस समाज के लिए एक सुकून होती हैं...आश्वासन होती हैं। घूंघट के पीछे गश खाती रिरियाती औरतें समाज को उसके प्रति बेचारगी से भर देती हैं।
लेकिन बड़ा डराती है समाज को फिर से उठ खड़ी होती...उसके खांचे को मानने से इनकार करने वाली, उसकी बेड़ियों में ना बंधने वाली औरतें।
याद है आपको...
पहलगाम हमले में मारे गए शुभम द्विवेदी की 29 साल की पत्नी ऐशान्या को कहना पड़ा...बस मैं ये चाहती हूं कि अब मैं कभी हंसू तो लोग ये ना कहें कि बताओ इसके पति की तो हत्या हो गई थी और ये हंस रही है।
बड़ी साधारण बात है। दुख दुख होता है। कोई छाती पीट के रो लेता है कोई पथराई आंखो के पीछे सब सोख लेता है। निजी दुख पर किसी के लिए परफार्म नहीं करना होता और कैमरे के लिए तो हरगिज नहीं।
उसे रोने दीजिए , समझने दीजिए , संभलने दीजिए, संभालने दीजिए, दोबारा चलने दीजिए.. पुरुष के साथ भी तो आप ऐसा ही करते हैं ना..
पत्नी की मृत्यु पर अगर पति विधुर होता है तो पत्नी भी पति की मृत्यु पर विधवा ही होती है अपाहिज नहीं।
संवेदना की स्थिति में पुरूष को भी कंधा चाहिए होता है स्त्री को भी कंधा ही चाहिए होता है गोद नहीं।
जब आप एक स्त्री को ऐसे हालात से आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें तो नीयत इतनी साफ रखे कि वो आगे बढ़े तो आगे आकर खुद ही ना खड़े हो जाएं।
बाकी हाय हाय बेचारी की उपमा वाली स्त्री आत्मनिर्भर होने के बाद कहलाती तो बड़ी तेज ही है।
इसलिए स्त्री का तेज सहने की क्षमता रखने वाला समाज बनिए। राजा राम मोहन राय और ईश्वर चंद विद्या सागर की आत्मा को भी शांति मिलेगी।
@aparnabisht7
A Civilization cannot be silenced forever.
Today, as the Hindu pride of Bengal reawakens - it recounts its struggles and glories in our tribute video.
Watch and share 🇮🇳❤️
Based on recent reports (e.g., from ASK, MSF, and human rights trackers up to 2025):
In India, religious lynchings (often cow-related, targeting Muslims) resulted in ~8 deaths in 2025 and ~20-30 from 2020-2024. Data varies by source.
In Bangladesh, total mob lynchings caused 166-197 deaths in 2025, with a subset religious (e.g., against Hindus for blasphemy; at least 1-5 confirmed cases). Overall mob violence surged post-2024.
Numbers are estimates; comprehensive tracking is limited.