🎥 PROOF FOR THE PEOPLE OF PAKISTAN!
Thankfully match was broadcasted live, or our neighbours would have claimed victory here!
🇮🇳 INDIA 19-0 PAKISTAN 🇵🇰
Tom Hanks crossed enemy lines, lost half his squad, and got tagged as #CharliesAngels .. Somewhere at @SonyLIV , an intern on something strong, looked at Omaha Beach and thought "yeah, angels."
#SavingPrivateRyan#GoogleTV
SHEETAL DEVI IS THE CHAMPION OF WORLD PARA ARCHERY SERIES 2026! 🥇
- Defeated Kazakhstan's Aizada Seidan in the thrilling final by 10-9 in a shoot-off.
WELL DONE CHAMP! 🔥🔥🔥🔥🔥
पिछले कुछ दिनों से एक चीज़ देखकर मन बहुत खुश है। बुंदेली बोली अचानक उस दायरे से बाहर निकलकर सुनाई दे रही है, जहाँ हम उसे वर्षों से सुनते आए थे।
उत्तर भारत की क्षेत्रीय बोलियों की बात होती रही तो भोजपुरी ने बहुत बड़ी जगह बनाई, अवध और पूर्वांचल की बोलियाँ फिल्मों और गीतों के माध्यम से लगातार सुनाई देती रहीं। लेकिन बुंदेली की अपनी मिठास, अपना ठेठपन और अपनी अद्भुत अभिव्यक्ति होने के बावजूद वह लंबे समय तक मुख्यधारा से कुछ दूर ही रही।
बुंदेली कभी बिल्कुल अनसुनी नहीं थी। देशराज पटेरिया जैसे अद्भुत लोकगायकों ने इसे वर्षों तक जीवित रखा। हमारे इलाके में उनके गीत घरों, मेलों, शादियों और कैसेटों में खूब बजते थे, लेकिन वह लोकप्रियता मुख्यतः बुंदेलखंड की सीमाओं के भीतर रही। फिर फिल्मों ने कभी-कभी इस बोली की ताकत देश को दिखाई।
Bandit Queen के समय बुंदेलखंड की भाषा और उसका कच्चापन लोगों के कानों तक पहुँचा। बाद में Paan Singh Tomar ने भी बुंदेलखंड के बोलने के अंदाज़ को एक अलग पहचान दी। लेक���न दोनों जगह पहचान मुख्यतः संवादों से बनी, गीतों के माध्यम से बुंदेली का राष्ट्रीय स्तर पर सामने आना बहुत कम हुआ।
फिर सोशल मीडिया आया। Instagram और YouTube ने वह काम करना शुरू किया जो शायद मुख्यधारा का मनोरंजन उद्योग नहीं कर पाया। बुंदेलखंड के छोटे शहरों और कस्बों से लोग अपनी ही बोली में बोलने लगे, हास्य करने लगे, कहानियाँ सुनाने लगे और लाखों लोगों तक पहुँचने लगे। धीरे-धीरे अपनी बोली बोलना पिछड़ेपन की निशानी नहीं, अपनी पहचान का गर्व बनने लगा।
और अब “पार्वती” जैसे गीत को जिस तरह पूरे देश में सुना जा रहा है, वह मेरे लिए केवल किसी एक गीत का वायरल होना नहीं है। यह उस बोली का सामने आना है जिसमें पीढ़ियों ने प्रेम किया, नाराज़ हुए, हँसे, पूजा की, किस्से सुनाए और अपन�� जीवन जिया।
गीत की सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि उसने बुंदेली को बदलकर या उसे किसी शहरी साँचे में ढालकर प्रस्तुत नहीं किया। उसने उसी मिट्टी, उसी उच्चारण और उसी सहजता के साथ उसे सामने रखा और लोगों ने उसे वैसे ही स्वीकार किया।
और मुझसे ज्यादा खुशी शायद किसे होगी। आखिर मैं भी उसी बुंदेलखंड की मिट्टी से निकला हूँ��� कभी जिस बोली को अपने इलाके से बाहर सुनना दुर्लभ था, आज उसी बुंदेली को लोग गुनगुना रहे हैं।
समय बदलता है और कभी-कभी अपनी मिट्टी की आवाज़ को वापस आने में बस एक अच्छे गीत की जरूरत होती है।
कल डायरेक्टर @filmervishal विशाल चतुर्वेदी की फिल्म श्री #हनुमान_अंश देखी। विशाल जी को निजी तौर पर जानता हूँ, इसलिए एक क्रिटिक की तरह देखी।
जानते हैं क्यों??
जब आप किसी को जानते हैं, तो उसकी कैपेबिलिटी, उसके क्राफ्ट, उसके आर्ट के बारे में आपकी समझ इतनी विकसित नहीं होती। क्योंकि जो लोग विशाल जी को जानते हैं, वो जानते हैं कि विशाल जी एक नितांत सरल, सहज, साधु किस्म के व्यक्ति हैं।
जिस ज़माने ��ें @Clubhouse और @XSpaces बहुत टॉक्सिक हो गए थे, तब फ़िल्म श्री हनुमान अंश के डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी दुनिया से अलग रोज़ सुबह 7 बजे बहुत सारे लोगों को इकट्ठा करके गिटार बजाकर श्री हनुमान चालीसा की अलख जगाते थे।
एक हनुमान चालीसा को विभिन्न धुनों में, विभिन्न तरीकों से, विभिन्न लोगों से सुनकर हम लोग अभिभूत हो जाते थे।
लेकिन इस सहजता में विशाल जी के क्राफ्ट के बारे में, उनके आर्ट के बारे में नहीं पता था… उनकी भक्ति पता थी उनका सामर्थ्य नहीं…
लेकिन आज पता है… श्री हनुमान अंश एक बहुत ही परिपक्व फिल्म है। कोई एज, कोई कोना ढीला नहीं है।
फिल्म का म्यूज़िक अद्भुत है और उसकी टाइमिंग इतनी अद्भुत कि जैसे ही आप फिल्म में किसी बहुत महत्वपूर्ण घटना होते देखते हैं, उसके पीछे से जो म्यूज़िक आता है, वो रोम-रोम आह्लादित कर देता है।
इसके अलावा फिल्म का डायरेक्शन, पात्रों का चयन, बाबा नीम करौली की ��ृपा से उनकी कहानी का नैरेशन, कैमरे की क्वालिटी… ये लग ही नहीं रहा था कि मात्र दो करोड़ रुपये की लागत से बनी फिल्म है।
इतना परफेक्ट कैमरा, लोकेशन का चयन, रिसर्च, सब कुछ इस फिल्म को अप्रतिम बनाता है।
इसीलिए मैं किसी से ये नहीं कह रहा हूँ कि फ़िल्म इसलिए देखिए-उसलिये देखिए…
श्री हनुमान अंश इसलिए देखिए क्योंकि एक अच्छी फिल्म क्या होती है, उसको देखने का एक स्टैण्डर्ड डेवलप हो, सिनेमैटोग्राफी क्��ा होती है उसकी समझ डेवलप हो… अगर अच्छी फिल्में नहीं देखेंगे, तो गुणवत्ता के मायने बदल जाएंगे।
बाबा नीम करौली का पात्र निभा रहे बंधु, इतनी सौम्यता, इतनी सरलता, इतना माधुर्य, इतना प्रेम… बाबा के पात्र को आपने जिया है और ये भी बाबा की कृपा से ही संभव है।
लखनऊ वालों पर बाबा का विशेष प्रताप रहा। अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण वर्ष वो यहाँ रहे, श्री हनुमान सेतु मंदिर का निर्माण कराया। हम लोगों से बाबा की बॉन्डिंग अलग ही है… हमारी तरफ़ से साधुवाद…
फिल्म में कृष्णदास जी का भजन ॐ नमः शिवाय, एक विदेशी जो भारत आकर बसा और भारत को, हनुमान जी को, भगवान शिव को समर्पित हो गया।
फिल्म में फेमस साउंडट्रैक मेरे संकट के खेवैया हनुमान के गीतकार का चयन,
और इस फिल्म का सर्वश्रेष्ठ गाना… @filmervishal जी, आपका गाया “हृदय में जिनके सीता राम, सीताराम जय सीताराम” बिल्कुल आपके अनरिलीज़ हनु��ान चालीसा जैसा है, नितांत पवित्र, जिसको आपने बहुत साल पहले मुझे शेयर किया था।
हमारे घर की दिनचर्या उसी से आरम्भ होती है और हमारे घर के सभी फोन्स की कॉलर ट्यून हृदय में जिनके सीता राम हो गयी है।
क्या लिखूँ और क्या-क्या लिखूँ इस फिल्म के बारे में?
मैं कोई इकोसिस्टम से गुहार नहीं करने जा रहा कि जाइए, इस फिल्म को सपोर्ट कीजिए। मैं सीधे क�� रहा हूँ, अपने आप को एक ट्रीट दीजिए, ये फिल्म देखिए। आनंद से सराबोर हो जाएंगे, दिव्य शब्द के मायने समझ पायेंगे…
विशाल जी अपनी टीम से कहिएगा, हमारी शुभकामनाएँ आप सभी को, आप सभी को श्री राम का आशीष मिले, हनुमान जी आपके हृदय में वास करें, बाबा आपके चित्त-मन को और दिव्य बनाएं, और सुंदर बनाएं कि आप एक दूसरे और तीसरे पार्ट रूपी सुंदर रचना, ऐसी सुंदर फ़िल्म पुनः रच सकें।
माँ भवानी आपको सामर्थ्य दें, शक्��ि दें, विजय दें, प्रेम दें।
बहुत-बहुत धन्यवाद बंधु। बहुत-बहुत धन्यवाद बंधु… इतने सारे झंझावात, संताप, कष्ट, राजनीति के बीच में कुछ ऐसा देने के लिए, जो मन को शांत करता है, हृदय के सारे संताप हर लेता है, तृप्त कर देता है, संतुष्ट कर देता है।
जय-जय श्री सीता राम।
Zubair doesn't understand the difference between internet subculture and institutional political rhetoric.
Online posts like mine, and millions of others, are part of internet pop culture. They are triggered by the bait these leaders themselves throw, and function as lighthearted, non-serious internet banter around diplomatic interactions. Using that banter to justify explicit sexual innuendos, like "Meloni samajh kar to nahi pakad liya", aimed directly at mocking foreign relationships, making vulgar comments about a foreign PM, and disparaging our own PM's personal conduct on a formal platform, is absurd.
Also, equating the conduct of social media accounts to whitewash the indecency of elected leaders speaking at an official political gathering is just a lazy, low-IQ attempt to give politicians a free pass for conduct that wouldn't even pass standard workplace decorum. Leaders are expected to elevate political discourse, not reduce public conventions to the lowest common denominator of social media trolling.
No trailers were shown before the 12 PM screening of Spider-Man: Brand New Day at Screen X in INOX, Jasola, Delhi. No Ramayana, no Doomsday, nothing.
Am I missing something, or was this the case for everyone else? @_mrchaturvedi, @iamshreytyagi, @kdcloudy
PS: They didn’t hand out the posters or the collectible ticket either.
A defining day in uniform, shared with those who have been part of the journey. Gen Dhiraj Seth sought the blessings of his father, Lt Gen KM Seth (Retd), received a salute from his brother, a serving Rear Admiral, and was joined by wife Komal and daughters Aarushi and Asmita after assuming charge as COAS.
@adgpi@HQ_IDS_India
#IndianArmy #COAS #ChiefOfArmyStaff #NationalWarMemorial #GeneralDhirajSeth