कांग्रेस अब बीजेपी से दो कदम आगे की चाल चल रही है.. पूरा 2029 का गोल सेट है.
2019 में मुंबई के एक होटल के बाहर DK Shivkumar अपने Karnataka विधायकों को वापिस ले जाने के लिए खडे थे.
वहां खड़ा चाय वाला पूछता है कि सर आप तो बड़े आदमी लगते हो, क्या पोस्ट है आपकी?
तो शिवकुमार बोले - CM of कर्नाटक..
मज़ाक़ मज़ाक़ बोलीं गयी वो बात आज सच साबित होने जा रही है.
2029 में जीत का रास्ता KARNATAKA से भी होकर जायेगा, क्योंकि 29 सीट मायने रखती हैँ और DK माहिर हैँ इस काम में
याद रहे, ये वही, DK Shivkumar हैँ जिन्होंने बोला था कांग्रेस की कितनी सीट्स आएंगी..
आज तारीफ राहुल गाँधी की राजनीती की भी बनती है जिनके कहने पर SiddaRamaiah ने चुपचाप इस्तीफा सौंप दिया राजयपाल को.
अब बीजेपी के पास कर्नाटक में कोई मौका नहीं जीतने का. 👊
भारत का विपक्ष कितना नल्ला है उसका उदाहरण CBSE और NEET को ले कर इनकी प्रतिक्रिया है। 40 लाख परीक्षार्थी (कुछ लाख दोनों में) प्रभावित हुए और विपक्ष 2-2 दिन विलंब से जग कर, हमारे जैसों के लिखा और बोला उठा कर सोशल मीडिया पर लिख रहा है।
यदि विपक्ष गंभीर होता तो इथेनॉल की बकलोली से शिक्षा मंत्रालय की निकृष्टता तक, इस देश में कुछ अच्छा हो सकता था, पर इन्हें खानापूर्ति करनी है।
मैं जानता हूँ कि अब कुछ लोग कहेंगे कि मैं विपक्ष के लिए काम कर रहा हूँ, पर कदाचित एक सजग समर्थक और कर्तव्यनिष्ठ पत्रकार का वही धर्म है। मैं विपक्ष के साथ नहीं हूँ, अभी मैं ही विपक्ष हूँ क्योंकि विपक्ष मा%रचो% नल्ला है।
ये कार्य तो सपाइयों का हुआ करता था। यदि @CMOfficeUP के लोग चाहें तो मैं चेयरमैन और सांसद का नाम, भूमि का जियो लोकेशन भेज सकता हूँ।
जिस व्यक्ति की भूमि है, उसके पिता की मृत्यु छः माह पूर्व हुई, माताजी का ऑपरेशन होना है और सांसद को लगा कि यही सही अवसर है। @myogiadityanath@narendramodi जी, दुर्भाग्यपूर्ण है ये। देख लीजिए। बाकी, अब आशा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।
दिलीप मंडल, दो दिन भाई टट्टी रोक ले यार! हग लेना भाई, जो भी तेरा जातिवादी एजेंडा है। आँख खोल कर देख कि बंगाल में दलित सेलिब्रेट नहीं कर रहा, वहाँ हिंदू सेलिब्रेट कर रहा है। उसके गाने सुन, उसका क्रोध देख।
तेरा सवर्ण-मुसलमान गठबंधन, दलित-आदिवासी ने जिताया सब बेकार है। खोल से बाहर निकल, बंगाल की दुनिया देख। वहाँ कोई अंबेडकर-फुले नहीं है। केवल हिंदुत्व है। माँ काली की धरा पर यदि 'जय श्री राम' चल रहा है, तो सोच कि क्या बदलाव है।
अंबेडकर मत ठूस, लोग समझ जाएँगे कि तेरे जैसे सलाहकारों ने भाजपा को केवल चुनावी हिंदू पार्टी बना दिया है, जो बस रैली में हिंदुओं की एकता खोजती है। रुक जा दो-चार दिन। फिर अतिसार करते रहना, हम देंगे दवाई।
सुप्रीम कोर्ट के कंबल निर्देशानुसार हमारे दो वीडियो, जिसमें न्यायपालिका के भ्रष्टाचार वाले पाठ्यपुस्तक पर चर्चा की गई थी, उसे हटाने के लिए यूट्यूब ने संदेश भेजा है।
शीघ्र ही हर यूट्यूब पत्रकार, ट्विटर आदि पर पोस्ट करने वाले व्यक्तियों पर ऐसी ही कार्रवाई के निर्देश आएँगे।
तदोपरांत, महान राष्ट्र मान लेगा कि सुप्रीम कोर्ट एवम् अन्य कोर्ट भ्रष्ट नहीं हैं। हम तो नहीं हटा रहे, यूट्यूब को हटाना है तो हटा दे। हम इसी विषय पर फिर से वीडियो बनाएँगे।
स्मरण रहे: भाजपा की सरकार राजस्थान में है, केन्द्र में तो है ही। कन्हैयालाल की हत्या का वीडियो है। उनके पुत्र को बारह बार बुलाया जा चुका है, हर बार पूछा जाता है कि सड़क कितनी चौड़ी थी, शर्ट का रंग किया था, कितने लोग थे…
वो आज भी पैर में बिना चप्पल पहने पिता को न्याय दिलाने के लिए लड़ रहा है। 6:55 से उसकी कहानी इस वीडियो में सुनिए। https://t.co/DlkBRcVTIX
सलीम को चाकू किसने मारा? कमलेश तिवारी को किसने मारा? उमेश कोल्हे को किसने मारा?
मैं किसी के रंग पर तब तक टिप्पणी नहीं करता जब तक वो हरामखोरी पर न उतर आए। इस मलिन हृदय वाले करकुट्ठे को हराने के लिए सवर्ण समाज आगे आए। बुकमार्क कर लीजिए ऐसे चोरों को जो आपके वोट से जीतते हैं और फिर नीचता भरे कथन कहते हैं। https://t.co/OFPzRK0ve2
तुमने मुझे भाजपा का दास माना, यह तुम्हारी समस्या है
दो बकचोदियाँ भाजपा के कंटेंट ग्रुप में चल रही हैं:
१. PM मोदी ने जो ओबीसी में मुस्लिम आरक्षण की बात की वह तो 1784 या 1498 से ही है जब वास्को डी गामा भारत आया था।
२. मैं यूजीसी पर बोलते बोलते अब फॉरेन विजिट, सर्वोच्च नागरिक सम्मान और बिल गेट्स की वैक्सीन पर क्यों कटाक्ष कर रहा हूँ।
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पहले विषय में मेरा उत्तर यह है कि जब पीएम ओबीसी में मुस्लिम के होने पर छाती ठोकते हैं और उनकी पार्टी कर्नाटक और महाराष्ट्र में मुसलिम को मजहबी आधार पर आरक्षण देने पर बवाल करती है, तो यह दोगलापन है।
यदि आपको मुसलमानों को आरक्षण से बाहर रखना है तो ओबीसी से बाहर करो। नहीं करना है तो ये टेक्निकल बकलोली मत करो कि मजहबी में नहीं देंगे पर जातिहीन इस्लाम में जातियाँ बना कर उन्हें हिन्दू ओबीसी के कोटे का आरक्षण दे देंगे।
दूसरे विषय में यह कहना है कि मैं भाजपा का दास नहीं हूँ, स्वतंत्र पत्रकार हूँ। मेरा मन करेगा मैं यूजीसी पर पचास दिन तक लिखूँगा, मैं मोदी को मिलने वाले नागरिक सम्मान पर भी मजे लूँगा और मैं बिल गेट्स जैसे दरिंदों के सरकारी एक्सेस पर भी बोलूँगा।
तुम यह तय करोगे कि मैं यूजीसी पर बोलते-बोलते अन्य विषयों पर न बोलूँ? मान लेते हैं कि मैं मोदी से एकदम घृणा करने लगा हूँ, तो क्या यह तुम बताओगे कि मुझे घृणा करना चाहिए या नहीं? कैसे-कैसे तर्क ले आते हैं लोग!
भाई मेरे, मैं जब भाजपा के समर्थन में लिखता हूँ और वामपंथियों को पेलता हूँ, तो तुम मुझे अकारण ही ‘भाजपाई’ मान लेते हो। तुम्हें लगता है कि मैं पार्टी के समर्थन में हूँ, जबकि मैं केवल अपने विवेक के आधार पर नीतियों का समर्थन करता हूँ। किसी पीएम के विजन और क्रियान्वयन का समर्थन करता हूँ। वही पत्रकार का कार्य है।
तुम अपनी आशाएँ क्यों बढ़ा लेते हो कि अब मैं पार्टी का दास हो जाऊँ? ‘पर आपको कर्नाटक पुलिस से…’ हाँ बचाया, पर क्यों बचाया? क्योंकि मैं दस साल से पार्टी और नेता की सकारात्मक नीतियों के समर्थन में लिखता रहा, जिसके प्रतिफल में यूपी पुलिस से ले कर कई भाजपा नेताओं ने लिखा-बोला।
दस वर्ष का निवेश था मेरा, फिर भी हायकोर्ट में केस लड़ने में दो लाख रुपए मेरे गए। पंजाब में केस हुआ, दो-दो बार, कहाँ थी पार्टी? बंगाल में केस हुआ, कहाँ थी पार्टी? बिहार में केस हुआ, कहाँ थी पार्टी? तेलंगाना में केस हुआ, कहाँ थी पार्टी?
हर केस में औसतन दो-तीन लाख लगे हैं, कितने केस के बारे में तुम या तुम्हारी पार्टी जानती है? कितने के बारे में किसी ने लिखा या बोला? नहीं लिखा क्योंकि मैंने कभी सहयोग माँगा नहीं। मैं जानता हूँ कि जो मैं लिख और बोल रहा हूँ, वह मेरा अपना विवेक है, पार्टी ने मुझे लिखने नहीं बोला, तो मैं यह आशा क्यों रखूँ कि पार्टी मेरा सहयोग करे?
मुझे न तो किसी ने बनाया है, न फंड किया है, इसलिए मुझसे यह आशा क्यों रखना कि मैं पार्टी या संघ की आलोचना न करूँ, चालीसा पढूँ? हाँ, मेरे नाम पर कोई पार्टी से फंड ले रहा है, और इसके बारे में आप जानते हैं, तो आप यह आशा कर रहे हैं कि यह तो पाला हुआ कुत्ता है, भौंक क्यों रहा है मालिक पर, तो मैं बता दूँ कि उस दलाल को पकड़ो क्योंकि मैंने कोई पैसा नहीं लिया है।
मैं पार्टी के पैसे लेने का मतलब जानता हूँ: अपनी स्वतंत्रता पर कुल्हाड़ी मारना। पाँच लाख ले कर आँख मूँद लेना वैसे विषयों पर जिस पर बोलना आवश्यक है। मुझसे वह संभव नहीं है, इसलिए मैं लूसिफर के लिए डॉक्टर फॉस्टस नहीं बनना चाहता। मुझे नहीं चाहिए तुम्हारी यह डील।
जो पार्टी वामपंथियों की सास के मरने पर प्रधानमंत्री और गृहमंत्री कार्यालय से शोक संदेश भेजती हो, और मेरी माँ के देहांत पर अपने ट्रोलों से भद्दी गालियाँ दिलवाती है, या चुपचाप देखती है, वह मुझसे यह आशा रखती है कि मैं पीएम का उपहास न करूँ, सरकार और बिल गेट्स के इतिहास पर न लिखूँ?
मैंने जो लिखा वह दुर्भावना नहीं है, बिल गेट्स जैसों के इतिहास को ले कर है। वह व्यक्ति संदिग्ध है। भाजपा की आरक्षण की नीतियाँ संदिग्ध हैं, उनका कथित इस्लाम विरोध संदिग्ध है, उनकी कथनी-करनी का अंतर संदिग्ध है।
तुमने मुझे भाजपा का दास माना, यह तुम्हारी समस्या है। मेरा समर्थन नीतियों का है, विजन का है, एक्जीक्यूशन का है। और हाँ, मैंने यह नाम, यह स्थान और यह दर्शक-पाठक-श्रोता अपने परिश्रम से बनाए हैं।
जो मेरी आय है वह मेरे शब्दों के आधार पर, याचक वृत्ति से, क्यूआर कोड लगा कर भिक्षाटन कर के अर्जित किया है। वही मुझे पालता है। मेरे नाम से पेट पालते दलालों के घर और कार को देख कर मुझे ईर्ष्या नहीं होती क्योंकि जो मेरे प्रारब्ध में होगा वही होगा।
यदि तुम्हें ऐसा लगता है कि पार्टी ही पाल रही है तो (तुम्हारे अनुसार) जो दे रहे थे, मत दो।
अजीत भारती बनाम भाजपा/संघ
जिस दिन यह मुद्दा अजीत भाई ने उठाना शुरू किया, उस दिन सरकार और उनके प्रशंसकों को शायद यह अंदाज़ा नहीं था कि यह विषय सोशल मीडिया से उठकर राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन जाएगा।
कुछ दिनों बाद सरकार को इसकी गंभीरता का एहसास हुआ, तब तक अजीत जी आक्रामक रुख अपना चुके थे, क्योंकि शुरुआती दौर में सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी थी। मेरे विचार से इस विवाद ने अलग मोड़ तब लिया जब अजीत भाई ने इसमें संघ का संदर्भ जोड़ते हुए मोहन भागवत जी के भाषण का उल्लेख किया।
इसी दौरान अजीत जी की माता जी का दुखद निधन हुआ, और उस संवेदनशील समय में संघ तथा भाजपा के कुछ समर्थकों ने ऐसी सीमाएँ पार कर दीं, जिन्हें किसी भी परिस्थिति में नहीं लांघा जाना चाहिए था।
वहीं से यह सवर्ण बनाम ओबीसी का मुद्दा अजीत भारती बनाम संघ की दिशा में मुड़ता दिखाई दिया। अजीत भाई ने एक-एक कर उन बयानों और संदर्भों को गिनाया, जिनमें हिंदुत्व के नाम पर भाजपा और संघ द्वारा दिए गए वक्तव्यों की ओर उन्होंने ध्यान दिलाया।
मेरा प्रश्न उन लोगों से है जो आज अजीत भाई के साथ नहीं खड़े हैं। यदि यही सवर्ण-ओबीसी वाला विवाद कांग्रेस ने खड़ा किया होता और अजीत भाई उसी तीखे अंदाज़ में कांग्रेस की आलोचना कर रहे होते, तो क्या तब भी आप उनकी माँ की चिता की राख ठंडी होने का इंतज़ार नहीं करते?
ऐसे समय में आप अजीत भारती का खुलकर समर्थन करते। इसलिए आज जो लोग उनके विरोध में हैं, उनकी नाराज़गी सवर्ण-ओबीसी मुद्दे से अधिक वैचारिक नहीं, बल्कि व्यक्ति या पार्टी-आधारित प्रतीत होती है।
और जहाँ तक उन स्क्रीनशॉट्स की बात है जिन्हें अजीत जी के कट्टर विरोधी बार-बार उछालते रहते हैं कि वे कभी वामपंथी विचार रखते थे, तो स्वयं अजीत कई बार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके हैं कि उनके विचार पहले अलग थे।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि समय, अध्ययन और अनुभव के साथ मनुष्य के विचार और विश्वास बदलते हैं, और यह परिवर्तन किसी अपराध का प्रमाण नहीं बल्कि बौद्धिक विकास का संकेत है। जो व्यक्ति अपने पुराने मतों को स्वीकार कर सकता है और यह कह सकता है कि वह बदला है, वह कम से कम ईमानदार तो है।
विडंबना यह है कि यही लोग उन नेताओं के अतीत पर सहजता से पर्दा डाल देते हैं, जो भाजपा में शामिल होने से पहले मोदी जी के खिलाफ बेहद अपमानजनक भाषा का उपयोग करते थे, संघ को राष्ट्र-विरोधी कहते थे और सावरकर जी को “माफी वीर” कहकर उपहास उड़ाते थे। ऐसे नेताओं का आज उसी पार्टी में सम्मानपूर्वक स्वागत किया जाता है, और तब किसी को वैचारिक शुचिता की याद नहीं आती।
यदि अतीत का हिसाब ही कसौटी है, तो वह कसौटी सब पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। और यदि परिवर्तन को स्वीकार किया जा सकता है, तो वह भी सबके लिए समान रूप से मान्य होना चाहिए। चयनात्मक नैतिकता ही दोगलापन कहलाती है, और यही इस पूरे विमर्श की सबसे बड़ी समस्या है।
इसी कारण मैं अजीत भाई के समर्थन में हूँ। वे संघ, भाजपा या मोदी जी के विरोध में नहीं, बल्कि उनके कुछ वैचारिक रुख और दृष्टिकोण की दरिद्रता के विरोध में खड़े हैं।
और रही बात उन लोगों की, जो मेरे डीएम में आकर “ज्ञान” के नाम पर धमकी दे रहे हैं कि आप भी लपेटे में आ जाओगे, तो उन्हें मैं सार्वजनिक रूप से यही कहना चाहता हूँ कि मैं बहुत पहले ही लपेटे में आ चुका हूँ।
अगर सच बोलना, सवाल उठाना और सुविधा से परे जाकर खड़ा होना “लपेटे में आना” कहलाता है, तो वह जोखिम मैं स्वीकार कर चुका हूँ।
जहाँ तक उन नए उत्साही सदस्यों की समझ का प्रश्न है, जो मेरी एक व्यंग्यात्मक ट्वीट को संदर्भ से काटकर मुझे वामपंथी, मुल्ला, कांग्रेसी या जो भी उपाधि हाथ लगे उससे नवाज़ देते हैं, उनसे विनम्र निवेदन है कि पहले मुझे पढ़िए, समझिए और फिर प्रतिक्रिया दीजिए।
व्यंग्य को शाब्दिक घोषणा मान लेना और प्रोफ़ाइल देखे बिना लेबल चिपका देना बौद्धिक असुरक्षा का लक्षण है, विचारशीलता का नहीं। अगर असहमति है तो तर्क रखिए, प्रश्न उठाइए, संवाद कीजिए। लेबल लगाना सबसे आसान काम है, पर वही सबसे कमज़ोर प्रतिक्रिया भी है।
आपका नाम संदीप रघुवंशी है ,आपने अपनी प्रारंभिक परीक्षा गुना मध्य प्रदेश के एक बेहतरीन विद्यालय से प्राप्त की, फिर आप देश के सर्वोच्च संस्थान IIT और IIM के गेट से होते हुए आप UPSC 2023 बैच में EWS का सर्टिफिकेट लगा कर IAS अधिकारी बन गए , IAS बनने से पहले आप रघुकुल CS नाम का कोचिंग संस्थान चलाते थे जिसमें आप 5000 का एथिक्स कोर्स बेचते थे ,इसके अलावा आप अनुष्ठान कंसल्टेंसी प्राइवेट लिमिटेड भी चलाते थे जो अब इनएक्टिव है , इसके अलावा आपने अनएकेडमी में भी सेवाएं दे रहे थे , आपकी माताजी भी सरकारी शिक्षक हैं , कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आपके पिताजी भी दूध डेयरी चलाते हैं , आपकी पत्नी NUTANIX नामक कंपनी में इंजीनियरिंग मैनेजर हैं और लाखों का पैकेज है , ग्लासडोर के मुताबिक उस पोजीशन की सैलरी 55 लाख या उससे अधिक है , आपकी शादी 26 अप्रैल 2021 को हुई थी , EWS परिभाषा में माता पिता की इनकम , इंडिविजुअल की इनकम और उसके पति या पत्नी की इनकम भी काउंट होती है , अब कुछ जलानखोरों का कहना है कि इतनी ज्यादा इनकम होने के बाद भी आपका EWS कैसे बन गया और बन गया तो आप उसको इस्तेमाल करके IAS कैसे बन गए , हम आपके साथ सीना ताने खड़े हैं , सबके सामने आइए और ऐसे लोगों को हमारे साथ मिलकर जवाब दीजिए ।
जय हिंद जय भारत ।
अब भी शेयर नहीं करसकते तो छोड़दो सोशल मीडिया
भू माफिया मुल्ला मैं नहीं डरता तेरी धमकियों से
100 मुकदमे फाइल करूँगा वक़्फ़ बोर्ड पर
पूरा देश देखेंगे तू लुटेरा है काले क़ानून के बल पर
तूने सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा किया है
तुझ से डर जाऊ मैं भय खा जाऊ
The impeccable timing of this! A case registered on Oct 8, 2025, HC asking me to furnish video that I believe has invited an FIR (which Punjab Police at that time denied) and suddenly amid this UGC storm, it drops asking for channel details!
Thank you! I anticipated this and I will fight this the same way I fought earlier cases.