दूसरे की भावनाऐं भड़काने वाला और अपनी भावनाएं आहत करने वाला दोनों ही धूर्त ऐजेंडे से बंधे चेतनाशून्य बंधुआ है। और यही लोग संपूर्ण मानवीय त्रासदी के शिकार व कारक दोनों एक साथ है।
एक आदमी जिसके पास 33 रूपये है वह उन 50 लोगों की सुरक्षा घेरे मे कब तक सुरक्षित रह सकेगा जो 12 पैसे से भी कम मे गुजारा कर रहे हैं और वो भी धीरे धीरे उसी एक आदमी के हाथों छिनता जा रहा हो। क्या वाकई यह व्यवस्था चल सकने लायक है और कब तक!?!