"अपरोक्षानुभूति"
पीतत्वं हि यथा शुभ्रे दोषाद्भवति कस्यचित्।
तद्वदात्मनि देहत्वं पश्यत्यज्ञानयोगतः।।७७।।
(भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अपरोक्षानुभूति)
यह श्लोक अद्वैत वेदान्त के उस अत्यन्त सूक्ष्म और गम्भीर तत्त्व का उद्घाटन करता है, जिसमें भ्रान्ति का कारण वस्तु नहीं, अपितु दृष्टि का दोष होता है। जैसे कामला (पीलिया) या अन्य नेत्र-दोष से पीड़ित व्यक्ति को श्वेत वस्तु भी पीली दिखाई देती है, वैसे ही अविद्या-दोष से आच्छन्न बुद्धि आत्मा को देह के रूप में देखती है। यहाँ भगवद्पाद आदि शंकराचार्य की दृष्टि अत्यन्त सूक्ष्म है ! वे यह स्पष्ट करते हैं कि दोष वस्तु में नहीं, ज्ञाता की दृष्टि में है। श्वेत वस्तु में कभी पीतत्व प्रवेश नहीं करता; वह केवल द्रष्टा के नेत्र-दोष से उत्पन्न प्रतीति है। उसी प्रकार आत्मा में देहत्व का कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं; यह अज्ञानजन्य आभास मात्र है।
शाङ्कर-वेदान्त में संसार का मूल कारण अध्यास है अर्थात् अधिष्ठान पर परधर्म का आरोप। जब श्वेत वस्तु में पीतत्व का आरोप होता है, तब वस्तु अपने स्वरूप से विचलित नहीं होती; केवल ज्ञान का माध्यम विकृत होता है। इसी प्रकार आत्मा जो स्वभावतः शुद्ध, निरुपाधिक, अविकार और असंग है, उसमें देह के धर्मों का आरोप कर दिया जाता है। जन्म, मृत्यु, रोग, सुख, दुःख - ये सब देह और मन के धर्म हैं; परन्तु अज्ञानवश इन्हें आत्मा का स्वरूप मान लिया जाता है। अतः देहात्मबुद्धि आत्मा की वास्तविक दशा नहीं, अज्ञान की परिणति है।
उपनिषदों का आलोक : श्रुति बार-बार आत्मा की निष्कलुषता की घोषणा करती है - “असङ्गो ह्ययं पुरुषः” यह आत्मा असंग है; उपाधियों से सर्वथा पृथक्। “शुद्धोऽपापविद्धः” वह शुद्ध है, पाप-स्पर्श से रहित। “नेति नेति” यह नहीं, वह नहीं; आत्मा समस्त नाम-रूप से परे है। ”अयमात्मा ब्रह्म” यह आत्मा ही ब्रह्म है, एकमेवाद्वितीयम्। यदि आत्मा वास्तव में देह होती, तो वह परिवर्तनशील होती; परन्तु श्रुति उसे नित्य, अविकार और अकलुष घोषित करती है।
श्रीमद्भगवद्गीता आत्मा की अविनाशिता को स्पष्ट करती है - “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।” आत्मा न कटती है, न जलती है! “अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।” वह अविकार है, अकल्पनीय है। देह रोगी हो सकती है, मन शोकाकुल हो सकता है; पर आत्मा न रोगी है, न शोकस्वरूप। दोष नेत्र में है, वस्तु में नहीं;
अज्ञान बुद्धि में है, आत्मा में नहीं।
ब्रह्मसूत्रों का समग्र प्रतिपादन यही है कि ब्रह्म जो आत्मा का ही स्वरूप है - निर्दोष, निर्विकार और निरुपाधिक है। उपाधि के धर्मों का आत्मा पर आरोप ही जीवभाव का कारण है। जैसे नेत्र-दोष दूर होने पर श्वेत वस्तु का वास्तविक स्वरूप प्रकट हो जाता है, वैसे ही ज्ञान होने पर देहत्व का आरोप मिट जाता है और आत्मा का शुद्ध चैतन्य-स्वरूप प्रकाशित होता है। ज्ञान वस्तु में परिवर्तन नहीं करता; वह केवल भ्रान्ति का निवारण करता है।
जब साधक गम्भीर विवेक से विचार करता है कि देह जड़ है, मैं चेतन हूँ। मन चञ्चल है, मैं साक्षी हूँ। बुद्धि सीमित है, मैं असीम हूँ। तब धीरे-धीरे यह स्पष्ट होता है कि देहत्व आत्मा का धर्म नहीं। श्वेत वस्तु कभी पीली नहीं थी; आत्मा कभी देह नहीं थी। अज्ञान का आवरण हटते ही आत्मस्वरूप स्वयं प्रकाशित हो जाता है। यह श्लोक अत्यन्त मार्मिक ढंग से बताता है कि देहत्व आत्मा का स्वरूप नहीं, अपितु अज्ञान-दोषजन्य आभास है। आत्मा सदा शुद्ध, नित्य, अविकार, सच्चिदानन्दरूप है। दोष दृष्टि में है, वस्तु में नहीं। अज्ञान बुद्धि में है, आत्मा में नहीं। ज्ञान का उदय ही देहाभिमान की निवृत्ति है। यही अपरोक्षानुभूति है, यही मोक्ष है। जब साधक यह जान लेता है कि “मैं देह नहीं, शुद्ध चैतन्य हूँ” तब समस्त भ्रान्ति का अन्त हो जाता है और आत्मा का निर्मल प्रकाश स्वयं प्रकट होता है।
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उत्तराखण्ड में समान नागरिक संहिता (UCC) समता, न्याय और सामाजिक समरसता की दिशा में एक निर्णायक पहल !
किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति का आकलन उसके कानूनों के स्वरूप से नहीं, बल्कि उनके न्यायपूर्ण, समान और मानवीय प्रभाव से होता है। इसी दृष्टि से समान नागरिक संहिता का विचार केवल विधायी परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज-जीवन में समानता, पारदर्शिता और समरसता की जड़ें मजबूत करने वाला एक ऐतिहासिक प्रयास है। आदरणीय प्रधानमंत्री श्रीमान नरेंद्र मोदी जी की प्रेरणा से उत्तराखण्ड में आगे बढ़ी यह पहल एक ऐसे भविष्य की ओर संकेत करती है जहाँ नागरिक पहचान के केन्द्र में मानव गरिमा और समान अधिकार हों।
“समानता का सिद्धांत” एक-राष्ट्र ; एक न्याय-ढाँचा ! समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य यह है कि प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान न्याय-ढाँचा सुनिश्चित किया जाए, ताकि व्यक्तिगत कानूनों की जटिलताओं और भेदों के कारण कोई भी नागरिक अधिकार से वंचित न रहे। जब कानून समान होते हैं, तो समाज में विश्वास बढ़ता है और शासन व्यवस्था में पारदर्शिता आती है। यह व्यवस्था व्यक्ति को उसकी सामाजिक पहचान से ऊपर उठाकर नागरिक के रूप में समान अधिकार देती है-यही किसी भी लोकतंत्र की आत्मा है।
“महिला-सशक्तिकरण” अधिकार, सुरक्षा और सम्मान की संवैधानिक प्रतिबद्धता !
UCC का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य महिलाओं को उनके वैधानिक अधिकारों में पूर्ण समानता प्रदान करना है। विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार जैसे विषय केवल कानूनी प्रक्रियाएँ नहीं, बल्कि स्त्री के जीवन में सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के आधार हैं। जब इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार का भेदभाव समाप्त होता है, तब समाज में स्त्री की स्थिति केवल “संरक्षित” नहीं रहती, बल्कि वह समान अधिकारों वाली स्वायत्त नागरिक के रूप में प्रतिष्ठित होती है। इसलिए UCC को महिला-हित का एक मजबूत स्तम्भ माना जा सकता है ; जो न्याय को केवल घोषणा नहीं, बल्कि व्यावहारिक वास्तविकता बनाता है।
“सेवा-प्रणाली में सुधार” सरलता, गति और नागरिक सुविधा !
किसी भी कानून की सफलता केवल उसके प्रावधानों से नहीं, बल्कि उसकी पहुंच और क्रियान्वयन से तय होती है। पिछले एक वर्ष में UCC के अंतर्गत विवाह पंजीकरण तथा विभिन्न नागरिक सेवाओं की प्रक्रियाओं में उल्लेखनीय तेजी आई है। यह बदलाव उस प्रशासनिक सोच का परिचायक है जो जनता के समय, सुविधा और सम्मान को प्राथमिकता देती है। इसके साथ राज्य सरकार द्वारा 23 भाषाओं में सहायता तथा एआई-आधारित सपोर्ट जैसी सुविधाओं की व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि यह परिवर्तन केवल सीमित वर्ग तक नहीं, बल्कि हर नागरिक तक सरलता और विश्वास के साथ पहुँचे। तकनीक और बहुभाषिकता का यह समन्वय कानून को अधिक लोकहितकारी और जन-सुलभ बनाता है।
“सामाजिक समरसता” विविधता के साथ एकता का सूत्र !
भारत की पहचान उसकी विविधता है, परंतु विविधता का सौंदर्य तभी सुरक्षित रहता है जब कानून की दृष्टि में नागरिक समान हों। UCC सामाजिक समरसता को इस अर्थ में सुदृढ़ करता है कि वह नागरिकों के बीच असमानता के कारणों को कम करने का प्रयास करता है। समान नियमों से समाज में विवाद, भ्रम और भेद घटते हैं तथा एक ऐसी संस्कृति बनती है जहाँ न्याय का आधार व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि उसका अधिकार और गरिमा हो।
“समान नागरिक संहिता” हमें यह स्मरण कराता है कि कानून केवल शासन की व्यवस्था नहीं, बल्कि समाज की नैतिक दिशा भी है। UCC एक ऐसी पहल है जो न्याय, सम्मान और समता को जन-जन के जीवन में स्थायी आधार देने का संकल्प प्रस्तुत करती है। आइए, हम सब मिलकर इस ऐतिहासिक पहल को समझें, अपनाएँ और सहयोग दें- ताकि यह परिवर्तन केवल नियमों तक सीमित न रहे, बल्कि प्रदेश की सामाजिक चेतना में न्यायपूर्ण और समरस भविष्य का दीप बनकर प्रज्ज्वलित हो।
आदरणीय मुख्यमंत्री श्रीमान पुष्कर सिंह धामी जी तथा समस्त प्रदेशवासियों को समान नागरिक संहिता (UCC) दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
@narendramodi@AmitShah@pushkardhami
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मुझे प्रेम कहानियां नही पसंद, खासतौर पर वो कहानियां तो और नही पसंद जो दो लोगों के बीच अमरप्रेम होने के बावजूद भी नियति पूरी नही होने देती।
मुझे मेजरशशिधरन नायर के बारे में पता नही था ,पर जब एक आर्टिकल पढ़ा लेफ्टिनेंट कर्नल संदीप अहलावत का लिखा हुआ।
तब प्रेम कहानियों पर मेरा संदेह जाता रहा,पर इस कहानी ने मेरे दिल में ऐसी शून्यता पैदा कर दी कि मैं घंटो रोती रही... ना कभी उस शख्स से मिली ,ना ही जानती हूं तब भी...
जब कोई भारतीय सैनिक प्रेम करता है, तो वह आधा-अधूरा नहीं होता।
वह या तो पूरी ज़िंदगी प्रेम करता है, या फिर वो खुद नही रहता... अपनी मिट्टी से, अपनी मातृभूमि से गहराई तक, आख़िरी साँस तक उसका प्रेम जान देने तक कम नही होता।
जम्मू-कश्मीर के राजौरी ज़िले में 11 जनवरी 2019 को आईईडी हमले में दो जांबाज़ जवान शहीद हुए। उन्हीं में से एक थे मेजर शशिधरन नायर पुणे निवासी, 2/1 गोरखा राइफल्स के वीर अधिकारी।
लेकिन आज उनकी कहानी केवल शहादत की नहीं है, आज बात उस प्रेम की है जिसने इंसानियत को फिर से शर्मिंदा और गौरवान्वित दोनों कर दिया।
मेजर शशिधरन नायर ने देश के लिए प्राण न्योछावर किए। पीछे रह गईं उनकी पत्नी तृप्ति नायर , जो मल्टीपल आर्टेरियोस्क्लेरोसिस से पीड़ित थीं और कमर से नीचे लकवाग्रस्त थीं।
जब मेजर नायर और तृप्ति की सगाई हुई थी, तब तृप्ति पूरी तरह स्वस्थ थीं। शादी से कुछ समय पहले अचानक उनकी तबीयत बिगड़ी, और हालत इतनी बिगड़ गई कि वह कमर से नीचे लकवाग्रस्त हो गईं।यह कहानी वहीं ख़त्म हो सकती थी। लेकिन यहीं से असली कहानी शुरू होती है।कई लोगों ने मेजर नायर को समझाया। कईयों ने कहा तुम्हारी “ज़िंदगी खराब हो जाएगी।”
कईयों ने कहा “अभी भी पीछे हट जाओ, अभी समय है,वो समझ जाएगी।”
लेकिन मेजर नायर ने एक ही बात सुनी अपना वादे की,जिसकी नींव ही है-- नाम, नमक और निशान
उन्होंने तृप्ति से किया गया वादा निभाया।उन्होंने उससे शादी की।
और सिर्फ़ निभाया ही नहीं बल्कि उसे सम्मान, प्रेम और गरिमा के साथ जिया।वह हर जगह तृप्ति को अपने साथ लेकर जाते।सरकारी कार्यक्रम हों, पारिवारिक आयोजन हों, रेस्तराँ हों या दोस्तों की महफ़िल हो..वह उसे कभी बोझ नहीं, कभी कमज़ोरी नहीं, बल्कि अपने जीवन का गौरव मानते थे।
मैं जो शब्द लिख रही हूं उन शब्दों के सबसे सच्चे अर्थ में वो एक वीर अधिकारी, एक सच्चे जेंटलमैन थे।
आज पोस्ट लिखने का मतलब यह है कि हम उनकी उस आइडी बलास्ट में शहादत पर ज्यादा शोक मनाएँ या गर्व करें उनके चरित्र की ऊँचाई पर?
मेजर नायर ने केवल 130 करोड़ भारतीयों को नहीं, पूरी दुनिया को यह सिखाया है कि
एक पुरुष कैसे बनता है,
एक पति कैसे निभाया जाता है,
और एक स्त्री को दिए वचन का अर्थ क्या होता है!
मेजर नायर की एक स्त्री के प्रति प्रेम और लॉयलिटी ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया था।
पता नही क्यों ईश्वर ने आपको चुना जबकि आपके प्रेम के बिना ये जीवन काटना आपकी पत्नी के लिए कितना असंभव होगा,जो खुद व्हील चेयर पर है।
संगत चाहिए थी।
और मेरे दोस्तों,
कृपया किसी नये सुपरस्टार की तलाक या चर्चा तो होती ही रहती है...
पर ज्यादा जरुरी है दुनिया को मेजर शशिधरन नायर के बारे में बताना।क्योंकि उनका जीवन यह सिखाता है कि एक स्त्री का सम्मान कैसे किया जाता है और अपने शब्दों की कीमत क्या होती है।
मैं फिर दोहराती हूँ
ऐसे पुरुष अब नहीं बनते,अगर बनते हैं तो ईश्वर उन्हे लंबी आयु नही देता🙏
"अपरोक्षानुभूति"
आत्मा प्रकाशकः निर्मलो देहस्तामस उच्यते।
तयोरैक्यं प्रपश्यन्ति किमज्ञानमतः परम् ।।२०।।
(भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अपरोक्षानुभूति)
भगवद्पादाचार्य इस श्लोक में आत्मा-अनात्मा के भेद को प्रकाश-तमस् के रूपक से अत्यन्त निर्णायक ढंग से स्थापित करते हैं। आत्मा स्वभावतः प्रकाशक है - स्वयंप्रकाश चैतन्य, साक्षी, ज्ञानस्वरूप; और निर्मल है - असंग, निर्विकार, लेप-रहित। इसके विपरीत देह (स्थूल–सूक्ष्म उपाधियों सहित) तामस कहा गया है - जड़, अचेतन, परिवर्तनशील, अविद्या-आश्रित। जो वस्तु स्वयं प्रकाश नहीं दे सकती, वह ज्ञात कैसे होती है ? केवल आत्म-प्रकाश से। इसलिए देह का “मैं” में आरोप करना वैसा ही है, जैसे - तमस् को प्रकाश समझ लेना; भगवान् भगवत्पाद कहते हैं कि इससे बढ़कर अज्ञान क्या?
यहाँ “प्रकाशक” शब्द का मर्म यह है कि आत्मा द्रष्टा है, देह दृश्य। देह, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि - सब “देखे” जाते हैं: “मेरे शरीर में पीड़ा है”, “मेरा मन विचलित है”, “मेरी बुद्धि ने निश्चय किया” इन वाक्यों में “मेरे” का प्रयोग स्वयं सिद्ध करता है कि “मैं” देह/मन से भिन्न साक्षी हूँ। यदि देह ही आत्मा होता तो देह अपने को नहीं जान सकता था, क्योंकि जड़ वस्तु स्वयंसिद्ध प्रकाश से रहित होती है। अतः आत्मा का प्रकाशकत्व ही देह-अनात्मता का प्रमाण है।
उपनिषद् इस विवेक को मूलाधार देती हैं। कठोपनिषद् आत्मा को “न हन्यते हन्यमाने शरीरे” कहकर देह-विनाश के बीच आत्मा की अविनाशिता बताती है; जो नित्य प्रकाश है, वह नाशशील अन्धकार-तुल्य देह नहीं हो सकता। मुण्डक/बृहदारण्यक की ध्वनि भी यही है कि आत्मा साक्षी है और असंग है - उस पर देह के दोष नहीं चढ़ते। प्रकाशोपमा उपनिषद्-परम्परा में स्वाभाविक है: दीपक स्वयं प्रकाशित होकर अन्य सबको प्रकाशित करता है; उसी प्रकार आत्मा स्वयं सिद्ध होकर देह-मन को सिद्ध करता है।
गीता इसी तथ्य को “क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ” के रूप में पुष्ट करती है। देह क्षेत्र है, आत्मा क्षेत्रज्ञ ज्ञाता ही प्रकाशक है। और, आत्मा की अक्षयता का स्पष्ट वचनन जायते… न हन्यते हन्यमाने शरीरे” यह बताता है कि देह के गुण (तमस्, जड़ता, विकार) आत्मा का स्वरूप नहीं हो सकते। कर्म-कर्तृत्व भी उपाधि में है, “प्रकृतेः क्रियमाणानि” - आत्मा साक्षी रहकर प्रकाशित करता है, करता नहीं।
ब्रह्मसूत्रभाष्य के आरम्भ में भगवद्पाद शंकराचार्य जिस अध्यास को सम्पूर्ण बन्धन का मूल बताते हैं, वही यहाँ संक्षेप में प्रतिपादित है; अचेतन देह पर चेतनता का आरोप और चेतन आत्मा पर देहधर्मों का आरोप। यह “प्रकाश-तमस्” का विपर्यास ही संसार है। शास्त्र का प्रयोजन इसी विपर्यास का निरास करके आत्मा को उसके स्वप्रकाश स्वरूप में प्रतिष्ठित करना है।
अतः इस श्लोक का अद्वैत-निर्णय यह है कि आत्मा स्वयंप्रकाश, निर्मल, साक्षी है; देह तामस, जड़, दृश्य-रूप उपाधि है; दोनों का “मैं” रूप से ऐक्य देखना परम अज्ञान (अध्यास) है; मुक्ति का द्वार है - “मैं देह नहीं; मैं देह-मन का प्रकाशक साक्षी चैतन्य हूँ।”
यही अपरोक्षानुभूति की साधना-रेखा है: तमस्-रूप उपाधि से विरक्ति और प्रकाश-रूप आत्मा में दृढ़ निष्ठा- अखण्डात्मबोध।
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"अपरोक्षानुभूति"
नित्यमात्मस्वरूपं हि दृश्यं तद्विपरीतगम्।
एवं यो सत्यः सम्यग्विवेको वस्तुनः स वै ।।५।।
(भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य द्वारा रचित अपरोक्षानुभूति)
नित्यानित्य-वस्तु- विवेक : आत्मज्ञान का प्रथम द्वार !
आत्मा (द्रष्टा) स्वयं में नित्य है, दृश्य उससे विपरीत है (अर्थात् क्षणभंगुर है), ऐसी स्थिर धारणा को ही वास्तव में विवेक कहते हैं।
अद्वैत वेदान्त की सम्पूर्ण साधना परम्परा का आधार एक ही है - विवेक। और, विवेक का प्रथम, अनिवार्य तथा सर्वप्रधान स्वरूप है - नित्यानित्य-वस्तु-विवेक। अपरोक्षानुभूति का यह श्लोक उसी मूल तत्त्व को अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु निर्णायक रूप में उद्घाटित करता है। यह केवल दार्शनिक कथन नहीं, अपितु साधक के समस्त आध्यात्मिक जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला सूत्र है।
"नित्यम् आत्मस्वरूपम्" - आत्मा का यथार्थ स्वरूप ! शाङ्कर-वेदान्त में आत्मा को नित्यम् कहा गया है अर्थात् जो न कभी उत्पन्न होती है, न परिवर्तित होती है, न नष्ट होती है। आत्मा काल त्रयातीत है। वह न भूत है, न भविष्य, न वर्तमान, अपितु समय का साक्षी है। इसी कारण उपनिषद् आत्मा को अविकार्य, अज, अमर और अद्वितीय कहते हैं।
आत्मा का दूसरा मूल लक्षण है - साक्षित्व। वह स्वयं कभी दृश्य नहीं बनती, अपितु देह, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ और जगत सब उसी के प्रकाश में ज्ञात होते हैं। आत्मा स्वयंप्रकाश है; उसे जानने के लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं। वही चेतना मन को सोचने, बुद्धि को निर्णय करने और इन्द्रियों को अनुभव कराने में समर्थ बनाती है। अतः आत्मा-नित्य है, चैतन्य है, शुद्ध है, एक है, अविकारी है और सदा साक्षीस्वरूप है। इसी को शास्त्र ने संक्षेप में कहा - “नित्यम् आत्मस्वरूपम्।”
दृश्यम् तद्विपरीतगम् दृश्य–जगत का निषेध ! जहाँ आत्मा नित्य है, वहीं दृश्य जगत उसका पूर्ण विपरीत है। जो कुछ भी देखा जाता है - देह, मन, बुद्धि, भाव, विचार, स्मृति, सुख-दुःख, यहाँ तक कि समग्र ब्रह्माण्ड सब दृश्य हैं। और दृश्य होने का अर्थ ही है- अनित्य होना।
देह जन्म लेती है, बढ़ती है, क्षीण होती है और नष्ट हो जाती है। मन क्षण-क्षण में बदलता है। कभी राग, कभी द्वेष; कभी आशा, कभी निराशा। जगत स्वयं निरन्तर परिवर्तन के चक्र में है। जो बदलता है, वह नित्य नहीं हो सकता।
दृश्य का दूसरा लक्षण है- जड़ता। दृश्य स्वयं चेतन नहीं होता; उसे चेतना आत्मा से उधार लेनी पड़ती है। और तीसरा लक्षण है- उपाधि जन्यता। दृश्य केवल नाम और रूप का संयोग है; उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। इसलिए दृश्य अनित्य है, परिवर्तनशील है, जड़ है, उपाधि बद्ध है और अनुभव आश्रित है। अर्थात् आत्मा के सर्वथा विपरीत।
"एवं यो निश्चयः"- विवेक की दृढ़ता ! भगवद्पादाचार्य आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि विवेक केवल बौद्धिक विचार नहीं है। जब तक यह निश्चय नहीं बनता, तब तक साधना फलवती नहीं होती। निश्चय का अर्थ है- अविचल, असन्दिग्ध, बार-बार पुष्ट होने वाला आन्तरिक निर्णय। यह निश्चय श्रवण से आरम्भ होता है, मनन से पुष्ट होता है और निदिध्यासन से जीवन का स्वभाव बनता है। जब साधक के लिए यह तथ्य स्वयंसिद्ध हो जाए कि “मैं आत्मा हूँ और यह सब दृश्य मुझसे भिन्न है,” तभी विवेक सम्यक् कहलाता है।
"सम्यग् विवेकः"- यथार्थ नित्यानित्य–विवेक ! शाङ्कर परम्परा में कहा गया है कि "नित्यानित्यवस्तुविवेकः प्रथमः साधनस्य अङ्गः"। अर्थात् आत्मज्ञान की यात्रा का पहला चरण यही है। सम्यग् विवेक का सार यह है कि मैं नित्य चैतन्य आत्मा हूँ। देह–मन–बुद्धि अनित्य दृश्य हैं। जो अनित्य है, वह मैं नहीं हो सकता। जो दृश्य है, वह सत्य नहीं हो सकता। द्रष्टा ही सत्य है; दृश्य मिथ्या है। इस विवेक से आत्मा अनात्मा की निर्णायक पहचान होती है और देह-अध्यास का अन्त होता है। यही अविद्या का क्षय है।
आदि शंकराचार्य का निष्कर्ष अत्यन्त स्पष्ट है- द्रष्टा-दृश्य विवेक के बिना आत्मज्ञान असम्भव है। जब तक दृश्य को सत्य माना जाता है, तब तक आत्मा अप्रकट रहती है। विवेक दृश्य से अनासक्ति लाता है; अनासक्ति चित्त को निर्मल करती है; और निर्मल चित्त में ब्रह्म स्वतः प्रकट हो जाता है। इस प्रकार विवेक से वैराग्य, वैराग्य से शान्ति, शान्ति से समाधि और समाधि से अपरोक्षानुभूति यह सम्पूर्ण साधना श्रृंखला इसी एक तत्त्व से आरम्भ होती है।
यह श्लोक अद्वैत वेदान्त का हृदय है। आत्मा को नित्य जानना ही उसका अनुभव है, और दृश्य को अनित्य जानना ही बन्धन से मुक्ति है। द्रष्टा-दृश्य के भेद का स्थायी निश्चय ही सच्चा विवेक है। यही आत्म-साक्षात्कार का मूलाधार है और यही अपरोक्षानुभूति का सुनिश्चित द्वार है।
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🚨पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार ज़िले से खबर
शामुकतला में, कुछ अज्ञात बदमाशों ने रात में साधु महेंद्र गिरि महाराज की ह त्या कर दी और शव को उनके आश्रम के पास नदी में फेंक दिया।
पुलिस आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी के लिए जांच कर रही है।
⚠️ कलियुग चरम की ओर 🤔
#SelfControl
ऋषियों के हवन कुंड में असुरों द्वारा हड्डियां फेंकने,श्रीराम लक्ष्मण द्वारा रक्षा करने की कथाएं आप जानते हैं। 🚩 इस युग में क्या हो रहा है -
देखिये शांतिदूत की करतूत
कमेंट में विवरण
#भगवा_ए_हिंद#ModiKiKhadi
"केनोपनिषद्"
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ।।६।।
"केनोपनिषद - प्रथम खण्ड:"
केनोपनिषद् के इस महावाक्यपूर्ण मन्त्र में ब्रह्म के स्वरूप का परम सूक्ष्म रहस्य प्रकट होता है। यहाँ उपनिषद् कहता है - “जिसे मन नहीं सोच सकता, किन्तु जिसकी सामर्थ्य से मन सोचने में समर्थ होता है, वही ब्रह्म है; न कि वह दृश्य-चिन्तन योग्य वस्तु जिसे तुम उपासना का विषय बनाते हो।”
मन स्वयं एक उपकरण है; परिवर्तनशील, संकल्प-विकल्पमय, विषयानुसार गतिशील। परन्तु ब्रह्म अपरिवर्तनीय, निर्विकार, और मन का भी कारण है। अतः मन के द्वारा प्राप्त अथवा सोचा गया प्रत्येक विचार अनात्म है, नश्वर है। जो जानने का साधन है, वह जान्य वस्तु नहीं हो सकता।
भगवद्पाद आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि मन एक ज्ञान उपकरण है; ब्रह्म को ज्ञेय वस्तु की भाँति नहीं जान सकता। ब्रह्म चिदानन्दरूप आत्मा है; मन की सत्ता को आलोकित करने वाला। मन सीमित है; ब्रह्म अनन्त है; सीमित द्वारा अनन्त का ग्रहण असम्भव है ! अतः जब साधक यह जान लेता है कि मैं वही चैतन्यस्वरूप हूँ, जिससे मन की वृत्तियाँ प्रकाशित होती हैं, तभी सत्य-ज्ञान का उदय होता है।
आदि शंकराचार्य कहते हैं कि “ब्रह्म मनोवृत्तिगोचर नहीं; मन के आत्मस्वरूप में स्थित चैतन्य ही ब्रह्म है।” इसलिए उपनिषद् का आदेश है - “तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि” - वही ब्रह्म है, तुम स्वयं उसी के स्वरूप हो।
उपास्य और उपासक का भेद कहाँ तक? मन्त्र के अन्तिम चरण में गहन उपदेश है - “नेदं यदिदमुपासते” - जो तुम बाहर रूप, गुण, नाम में खोजते हो, वह अभी तुम्हारी कल्पना का देवता है, परम तत्त्व नहीं।
उपासना आवश्यक है - परन्तु वह हमें बाह्य से आत्मा की यात्रा के लिए तैयार करती है। ब्रह्म न दृश्य है, न विचार। वह तो साक्षी-चैतन्य है, जिसके प्रकाश से दृश्य और विचार दोनों सम्भव हैं। निष्कर्ष मौन में प्रकट होने वाला ब्रह्म ! मन की चेष्टा जब शान्त होती है, सभी विचार जल की तरंगों की भाँति बैठ जाते हैं ! तब अन्तःकरण के पार आत्म-प्रकाश स्वयमेव अभिभासित होता है। वही अनुभव, ज्ञान का चरम शिखर, उपनिषद् का लक्ष्य, अद्वैत का सौन्दर्य है।
"येन मनोऽपि मन्यते" - वही आत्मा, वही ब्रह्म। उसे जानो; स्वयं को जानो।
“That which the mind cannot think, but because of which the mind is able to think- Know That alone to be Brahman, not what people worship as an object.”
This mantra reveals a profound paradox at the heart of Vedānta: the very source of thought cannot itself be captured as a thought. The mind, constantly engaged in seeking, analyzing, imagining, and constructing reality, is merely an instrument- subtle yet limited.
Whatever the mind can conceive becomes an object of knowledge, and every object stands apart from the knower. Brahman, however, is not an object among objects; It is the very Self of the knower- pure awareness by which every thought, perception, and emotion is illumined.
Adi Śhaṅkarācārya emphasizes: The mind does not comprehend Brahman. Rather, Brahman is that Chaitanya, the consciousness, by which the mind gains the power to know. The Infinite cannot be contained by the finite. To mistake a mental concept, form, or deity as the ultimate Truth is to remain confined within the walls of imagination. Worship of symbols can purify the heart- but Brahman is never the worshipped object. It is the inner Witness, beyond form and attributes, silently shining as the reality of the worshipper.
Thus, the Upaniṣad commands:
Know That alone to be Brahman not this which you worship as an object. When the restless tides of thought grow still, when the mind ceases trying to grasp the Self as something other, the Truth reveals itself as one’s own innermost Being: The knower of the mind, the light behind every thought- That Thou Art.
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#सनातन_संस्कृति
धर्मनिष्ठ व्यक्तियों को साधन, सहयोग आदि की कमी को लेकर निराशा शोभा नहीं देती ।
भगवान को आपसे जितना कार्य लेना है उतना साधन आदि अवश्य उपलब्ध करवा देते हैं ।
सहयोगी कभी स्वतः मिल जाते हैं जैसे आदि शंकराचार्य को पद्मपादाचार्य मिले और कभी प्रयास से जैसे मण्डन जी मिले ।
यह अद्भुत उपलब्धि हर उस व्यक्ति के लिए गर्व का विषय है जो भारतीय संस्कृति और वैदिक परंपरा के प्रति समर्पित है। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिन शाखा के 2000 मंत्रों वाले डण्डक्रम पारायणम् को 50 दिनों तक लगातार, बिना किसी विराम के पूर्ण करना अत्यंत विलक्षण और प्रेरणादायी साधना है। अनेक वैदिक मंत्रों और पवित्र ऋचाओं का इतनी शुद्धता, एकाग्रता और अनुशासन के साथ उच्चारण—यह वास्तव में हमारी गुरु-परंपरा की अत्युत्तम गरिमा का सजीव प्रमाण है।
मैं, अधिवक्ता अनिल मिश्रा, इस दिव्य साधना के काशी में सम्पन्न होने पर हृदय से गर्व और आनंद का अनुभव करता हूँ। इस पावन अनुष्ठान में सहयोग देने वाले उनके परिवार, देशभर के संतों, महात्माओं, विद्वानों तथा विभिन्न संस्थाओं को मेरा सादर प्रणाम, जिन्होंने इस महान पारायण को सफल बनाने में अपनी अमूल्य भूमिका निभाई।
यदिदं किं च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम्।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति।।२।।
"कठोपनिषद्-द्वितीयाध्याये: तृतीयवल्ली"
यह मंत्र सम्पूर्ण जगत् की गति, व्यवस्था और अस्तित्व को एक अद्वितीय सत्ता “प्राण” के ऊपर स्थापित करता है। यहाँ प्राण से तात्पर्य केवल श्वसन या जीव-शक्ति नहीं है।
भगवद्पाद आदि शंकराचार्य स्पष्ट करते हैं कि यह “प्राण” स्वयं परब्रह्म का ही नाम है ! वह चेतन सत्ता जो सबमें अन्तर्हित होकर सबको चलाती है, सबको धारण करती है, और जिसमें से सारा जगत प्रकट हुआ है। जो कुछ भी इस जगत में है, सब उसी ब्रह्म-प्राण की गति से चल रहा है।
आदि शंकराचार्य के अनुसार जगत के रूप-वैचित्र्य, जन्म-मरण, परिवर्तन-प्रवाह सब स्वतन्त्र सत्ता नहीं, बल्कि चैतन्य-ब्रह्म से प्रेरित, उसी पर आश्रित हैं। भौतिक जगत स्वयं-चालित नहीं; चेतना-चालित है।
“प्राण एजति निःसृतम्” - प्राण’ की गति ही जगत की गति प्राण एजति अर्थात् “गतिशील करता है”, “संचालित करता है”।
भगवद्पाद आदि शंकराचार्य कहते हैं कि यहाँ प्राण निर्गुण ब्रह्म का ही व्यवहारिक नाम है, जो सृष्टि में जीवन, चेतना और गति के रूप में विक्षेपित होता प्रतीत होता है ! यह वही है, जिसे श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं - “जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।” मेरी जीव-शक्ति चैतन्य से ही जगत धारण है। अतः प्राण यहाँ परम चेतना का विश्व-नियामक रूप है।
“महद्भयं वज्रमुद्यतम्” - ब्रह्म की महाशक्ति का संकेत है। यहाँ “महद्भयम्” का अर्थ - कोई भय उत्पन्न करने वाला देवता नहीं,
बल्कि वह महाशक्ति, वह परम-नियामकता, जिसके बिना जगत एक क्षण भी नहीं टिक सकता। श्रीमद्भगवद्गीता भी कहती है ! “मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।” मेरे अधिपत्य में प्रकृति सबको चलाती है।
This profound mantra declares that the entire universe, with all its diversity and movement, emerges from and is sustained by Prāṇa. Here Prāṇa is not mere breath, but—as Śhaṅkarācārya explains; a name for Brahman itself in its cosmic, all-governing aspect. Everything that exists moves because the Supreme Consciousness pulsates within it.
“Whatever exists in this universe…”
Shankaracharya clarifies that all forms, actions, changes, birth and death all of this is not independently real, but entirely dependent on Brahman, the one Consciousness illuminating all experiences.
The dynamic, ordering power of Brahman is the cause of every motion in the universe.
Shankaracharya explains: Prāṇa is the life-principle, the illumining consciousness behind all beings and the governing intelligence behind cosmic order. Gita says “By My energy as the jīva-śakti, the entire world is upheld.” Thus Prāṇa is Brahman functioning as the inner mover of all.
“Mahad bhayam” does not mean Brahman threatens or frightens;
Śaṅkara says the word “bhaya” here signifies:
The awe-inspiring, sovereign power by which Brahman rules the universe.
“Vajram udyatam”— like a raised thunderbolt— symbolizes the unbreakable law, the infallible order, the cosmic discipline (ṛtam) through which everything functions.
The Gita confirms: “Under My supervision, Nature produces the moving and unmoving.” Thus Brahman is not a passive witness; It is the governing intelligence holding all existence together. Death belongs only to the body, not to the Self. When the Self is known as Brahman, the cycle of birth and death loses all meaning. Immortality is not physical longevity, but the realization of one’s eternal, undecaying nature. This is exactly what the Gītā 2.20 teaches: The Self is never born, nor ever dies, it is not slain when the body is slain.” To know the Self as Brahman is to step beyond all fear, change and mortality.
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