सड़क पर लगे नारे सिर्फ गुस्सा नहीं, एक चेतावनी हैं।
जब मज़ाक से निकलकर बात सड़क पर आ जाए, तो समझिए भरोसा दरक रहा है। परिवार, अर्थव्यवस्था और न्याय, सब पर असर पड़ेगा।
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बुजुर्गों को बोझ समझने के पीछे सिर्फ "आजकल की पीढ़ी स्वार्थी है" नहीं, एक पूरी सामाजिक-आर्थिक कहानी है।
फ्रॉम से लेकर गांधी तक की नजर से पढ़िए यह लेख
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इमारत गिरी, छात्र मरे — डूसू उपाध्यक्ष ने जूता उतार दिया, हमेशा के लिए।
सोण के फटे पैर से लेकर भरत की खड़ाऊँ तक — जूता कब त्याग बनता है, कब सत्ता की मर्यादा?
"अथ चरणपादुक��� कथा" — पढ़िए
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एक टूटा रिश्ता सिर्फ़ दो लोगों की कहानी नहीं होता।
घर बिखरते हैं, भरोसा टूटता है, और यही टूटन धीरे-धीरे एक पूरे समाज की उदासी बन जाती है।
क्या हम सामाजिक अवसाद की ओर बढ़ रहे हैं?
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क्या हमने सोचना बंद कर दिया है?
जब सवाल पूछना दुश्मनी और असहमति देशद्रोह समझी जाने लगे—तब संकट केवल राजनीति का नहीं, हमारे विवेक का होता है।
क्या हम स्वयं सोच रहे हैं, या कोई और हमारे लिए सोच रहा है?
👉 “विवेक का पतन: जब समाज सोचन��� बंद कर देता है”
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गाली अब सिर्फ गाली नहीं रही
कभी गाली सुनकर हमें बुरा लगता था, आज कई बार उसी गाली पर हँसी आती है।
क्या यह केवल भ���षा का ब��लाव है, या हमारी सामाजिक संवेदनशीलता और संवाद की संस्कृति भी बदल रही है?
आखिर हम किस तरह के सामाजिक व्यवहार को सामान्य बना रहे हैं
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अक्सर हम सभी एक बात सुनते हैं कि आज के समय में सत्ता, व्यवस्था और पुरातन मानदंडों पर सवाल उठाना कठिन हो गया है।
पर इतिहास तो यही बत���ता है कि पुरातन काल से ही सत्ता और व्यवस्था प्रश्न पूछने वालों को दोषी, विद्रोही या अपराधी मानती रही है।
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लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और बहुमत हासिल करने का नाम नहीं है असल परीक्षा तब होती है, जब बहुमत के हाथ में सत्ता आ जाए।
लोकतांत्रिक संस्थाएँ यदि कमजोर हो जाए तो तानाशाही का रास्ता कभी-कभी लोकतंत्र के भीतर से ही खुलता है।
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शब्द भी सफर करते हैं…
कुछ शब्द सिर्फ शब्द नहीं होते, वे अपने भीतर पूरा इतिहास लेकर चलते हैं।
आज ऐसे ही एक शब्द “समाजवाद” की यात्रा पर बात करते हैं।
इस लेख में ‘समाजवाद’ की इसी लंबी और दिलचस्प यात्रा को इतिहास के क्रम में समझने की कोशिश की है
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क्या हम अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर रहे हैं,
या स्वतंत्रता के नाम पर अपनी जिम्मेदारी भूलते जा रहे हैं?
👇 पूरा लेख पढ़िए और अपनी राय जरूर बताइए
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🇮🇳 परेड की चमक और विकास की तस्वीरों से आगे भी एक भारत ह��— न्याय की प्रतीक्षा रोजगार,किसान की चिंता,भ्रष्टाचार, सामाजिक विभाजन और राजनीतिक दुष्प्रचार से जूझता समाज
पूरा लेख:
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बारिश सब पर हो रही है।
फिर भी हम सिर्फ अपने पसंदीदा पौधे को पानी दे रहे हैं।
जरूरत जहाँ सबसे ज्यादा है, वहाँ अक्सर नजर नहीं जाती।
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