जब सिस्टम ने साथ छोड़ दिया और मशीनें खामोश हो गईं,
तब आगरा ��ी डॉ. सुलेखा चौधरी ने अपनी साँसों से एक नवजात को ज़िंदगी दी सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन फेल होने पर 7 मिनट तक मुंह से ऑक्सीजन देकर बच्चे की जान बचाना यह इलाज नहीं, इंसानियत का ��बसे ऊँचा इलाज है।
डॉ. सुलेखा चौधरी सिर्फ डॉक्टर नहीं,
कर्तव्य, साहस और मानवता की जीवित मिसाल हैं।
महानता और सरलता दोनों सहेलियां एक साथ...
देश के एक सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण साहित्यकार, विनोद कुमार शुक्ल बीती शाम गुजर गए, तो अस्पताल के उनके आखिरी कुछ हफ्तों की अलग-अलग तस्वीरों और खबरों से पता लगा कि वे का��ज-पेन लेकर किस तरह कुछ न कुछ लिखते रहते थे। उन्होंने प्रधानमंत्री और दूसरे लोगों द्वारा की गई सेहत की पूछताछ के दौरान यह भी कहा था कि लिखना उनके लिए सांस लेने की तरह है।
88 बरस की उम्र में एक व्यक्ति सबकुछ पा लेने के बाद भी लिखने की अपनी हसरत को इस हद तक जारी रखता है, यह देखकर थोड़ी सी हैरानी होती है। आज जब अच्छे-खासे जवान लोग सड़क किनारे किसी चाय-ठेले पर, या किसी पेड़ के चबूतरे पर बैठे हुए सुबह से र���त कर देते हैं, और कोई काम नहीं करते हैं, तब विनोद कुमार शुक्ल काम की एक ऐसी मिसाल पेश करते हैं जिसकी बराबरी कर पाना शायद उनके ही करीबी लोगों के लिए भी आसान नहीं होगा।
विनोद कुमारजी को मैंने एक बार उनके घर पर उनके पसंदीदा पेड़ के साए में इंटरव्यू किया था। टीवी चैनल के कैमरे पर रिकॉर्ड उस इंटरव्यू की बातें मुझे अभी पूरी तरह याद नहीं हैं क्योंकि समाचार चैनलों के काम की संस्कृति में याद रखने की जरूरत कम रहती है, पूछने, और उसी पल सुनने से काम चल जाता है। फिर भी मुझे उनकी सादगी, सरलता, विनम्रता, और उनका स्नेह अच्छी तरह याद है क्योंकि इन्हें कैमरे पर रिकॉर्ड नहीं करना पड़ा था, यह दिल में दर्ज हो गया था कि इतने सम्मानित, पुरस्कृत, और विख्यात लेखक का ���्यवहार किस तरह किसी भी अहंकार से मुक्त है। विनोद कुमारजी के मुकाबले जो लोग साहित्य में कहीं नहीं हैं, जो लोग राह चलती संस्थाओं से सम्मान पाकर बादलों पर पांव धरकर चलने लगते हैं, उन लोगों का बर्ताव देखें तो लगता है कि विनोदजी फलों से लदे हुए पेड़ की तरह विनम्रता से झुके रहते थे।
उनके साहित्य को पूरी तरह समझना मेरी तरह की सामान्य समझ-बूझ के लोगों के लिए आसान नहीं था, लेकिन बातचीत में वे कमसमझ लो��ों के लिए भी उतने ही विनम्र रहते थे जितने विनम्र वे शायद अपने साहित्य के सबसे अधिक जानकार लोगों के लिए रहते होंगे।
कैमरे पर दर्ज बातचीत के अलावा वे अपने घर के अहाते में लगे पेड़ को लेकर भी बात करने लगते थे, और फूलों की खुशबू को लेकर भी। जो साहित्य के बड़े-बड़े मंचों से भी बचते थे, वे मेरे सरीखी टीवी रिपोर्टर से भी बात करते हुए सरल बने रहते थे।
मेरा उनसे रूबरू वास्ता बहुत कम रहा, लेकिन उनके अच्छे-खासे जानकार लोगों से मैंन��� उनके बारे में जो सुना, वह उनके साहित्य की असाधारण उत्कृष्टता बताता है, उनके बहुत ही मौलिक किस्म के लेखन, और बहुत ही गहरी समझ भी बताता है। कैसे कोई महान होते हुए भी एक अविश्वसनीय सी सादगी से भरे रह सकते हैं, इसकी एक जीवंत मिसाल विनोद कुमारजी रहे।
उनके जाने के बाद भी उनकी बहुत सी किताबें, बहुत सा प्रकाशित और अप्रकाशित लेखन रह गया है, लेकिन मैंने लोगों से उनके जो संस्मरण सुने हैं, ऐसा लगता है कि वे भी उनके लेखन जितने ही होंगे, उससे हो सकता है कि कई गुना अधिक होंगे। आने वाले महीनों में हमें उनसे मिलने, और जानने वाले ��ोगों से उनके बारे में बहुत कुछ और पढ़ने-सुनने मिलेगा, जो कि एक बार फिर हमें यह समझने का मौका देगा कि महान और सरल, दोनों ही एक साथ कैसे हुआ जा सकता है।
हो सकता है कि उनके चाहने वाले लोगों में से कोई सोशल मीडिया पर, स्मृति-विनोद कुमार शुक्ल जैसा कोई पेज बनाए जिस पर उनके बारे में अभी लिखे जाने वाले सभी संस्मरणों को रखा जा सके।
आज मैं यह नहीं पूछूंगी कि क्या सोचते हैं आप।
- तृप्ति सोनी
अरावली पर्वतमाला सिर्फ़ पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है - यह जल, जंगल और जीवन की सुरक्षा कवच है। इसके अंधाधुंध विनाश का मतलब है आने वाली पीढ़ियों का भविष्य खतरे में डालना।
मैं अरावली के संरक्षण और वनों की कटाई के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलन के साथ पूरी एकजुटता में खड़ा हूँ।
चाहे अरावली की पहाड़ियाँ हों या हमारे सरगुजा का रामगढ़ पहाड़ और हसदेव के जंगल, प्रकृति का यह विनाश एक ही सोच का परिणाम है - मुनाफ़े के लिए पर्यावरण की बलि, अधिकारों का दमन।
विकास के नाम पर विनाश स्वीकार नहीं है।
अरावली को बचाना है।
रामगढ़ को बचाना है।
हसदेव को बचाना है।
भविष्य को बचाना है��
@KavyaKutir जो मुझे मुझसे वाकिफ करायें
मेरे रोने पर रोयें
हंसने पर हंसाये
मेरे प्रतिरूप को
अपने अंदर सजायें
मेरे गाने पर गायें
नाचने पर नचायें
दर्पण जो
स्वप्रेम को बढ़ाये।
ज़मीन खरीद–बिक्री की नई गाइडलाइन की वापसी स्वागतयोग्य निर्णय है।
हालाँकि, इस पूरे प्रकरण में सरकार की अपरिपक्वता और अनिर्णय स्पष्ट नज़र आता है। जनता से बिना संवाद किए आदेश थोप देना और विरोध बढ़ने पर उसे वापस लेना, प्रदेश हो या केंद्र, भाजपा की यही विचित्र कार्यप्रणाली रही है।
जो क��म पहले उठाने चाहिए, वो विरोध के बाद उठाए जाते हैं।
और शासन का इस तरह काम करना जनता में सिर्फ़ घबराहट और अविश्वास को बढ़ाता है। मगर, ज़मीन से पूरी तरह कटी हुई सरकार के इस रवैया का लक्ष्य बार-बार यही दिखता है - जनता की भावनाओं और अधिकारों से खिलवाड़।
झाड़-फूंक से बीमारी नहीं, वैज्ञानिक समझ उड़ती है...
देश के एक-एक करके अधिकतर बड़े जिलों में मेडिकल कॉलेज या तो खुल चुके हैं, या खुलने का सिलसिला चल रहा है। छत्तीसगढ़ में भी कई जिलों में मेडिकल कॉलेज खुल गए हैं, और शुरुआत में जिला अस्पताल को ही मेडिकल ��ॉलेज अस्पताल बनाया गया है। इसके पीछे मकसद यही है कि एक तो अधिक डॉक्टर तैयार हो सकें और दूसरा यह कि सभी इलाकों में मेडिकल कॉलेज अस्पताल में इलाज की सुविधा लोगों को मिल सके। इसके साथ-साथ हर जिले में जिला अस्पताल हैं और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हजारों करोड़ सालाना की जिला खनिज निधि की मदद से बस्तर के सबसे पिछड़े इलाके में भी बहुत सुविधा संपन्न अस्पताल बने हैं। इसके बावजूद जगह-जगह से खबरें आती हैं कि किस तरह कहीं कोई झाड़-फूंक के दौरान जान खो बैठते हैं, तो कोई और अंधविश्वास के किसी और किस्म के जाल में फंसकर जिंदगी गंवा बैठते हैं। कल ही रा���धानी से लगे हुए गरियाबंद जिले के इमलीपदर इलाके में बुखार से पीड़ित 3 बच्चों की एक-एक कर तीन दिनों में मौत हो गई। उनका किसी सरकारी या निजी अस्पताल में इलाज कराने के बजाय परिवार उनकी झाड़फूंक करवाने में लगे रहा, और ये बच्चे चल बसे। गरियाबंद का इलाका जंगलों में बसे गांवों का तो है, लेकिन वहां सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पहुंच से एकदम दूर हो, ऐसा भी नहीं है। छत्तीसगढ़ में ही पिछले महीनों में कहीं सांप के कांट लेने पर झाड़फूंक से ज��र उतरवाने के चक्कर में लोग जान खो बैठे हैं, तो कहीं किसी और किस्म के अंधविश्वासी इलाज ने जिंदगियां खत्म की हैं। इसी बीच लोगों को याद होगा कि जशपुर में किस तरह झाड़-फूंक से जहर उतारने का दावा करने वाले एक संपेरे को जब सांप ने काटा तो अपनी जान बचाने के लिए वह सीधा सरकारी अस्पताल दौड़ा। वहां उसकी जान जब बची तो उसने अस्पताल के बिस्तर से ही एक वीडियो संदेश रिकॉर्ड करके जारी किया कि लोग सांप के काट ले���े पर झाड़-फूंक के चक्कर में न रहें और अस्पताल में इलाज कराएं।
जब तक आधुनिक, या भारत की प्राचीन मान्यता प्राप्त चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं रहे तब तो लोगों का जादू-टोने, और बैगा-गुनिया के चक्कर में पड़ना समझ आता है। लेकिन जब सरकार हजारों करोड़ रुपए साल इलाज पर खर्च करती है, और हर व्यक्ति को इलाज के बीमे का सरकारी कार्ड भी मिला हुआ है, उसके बाद इलाज न कराकर अंधविश्वास में फंसना, यह लोगों की अपनी पसंद रहती है। यह पसंद बाकी जिलों में भी मेडिकल कॉलेज खुल जाने से भी बदलने वाली नहीं है। यह लोगों की सोच-समझ में बहुत ही गहरे धंसा और जम चुका ��ंधविश्वास है, जो उन्हें आधुनिक विज्ञान के वरदान पर भरोसा नहीं करने देता। यह अंधविश्वास जगह-जगह दिखता है जब अड़ोस-पड़ोस या रिश्तेदारी की किसी महिला पर टोनही होने का शक किया जाता है, और कई मामलों में उसे मार डाला जाता है। लोग किसी के जादू-टोने से अपने बीमार हो जाने की बात पर इतनी आसानी से भरोसा कर लेते हैं कि कत्ल करके बाकी जिंदगी जेल में गुजारने को भी तैयार हो जाते हैं।
आज जरूरत इस बात की है कि स्कूल में बच्चों को पढ़ाई जाने वाली महान विभूतियों में से किसी एक को कम करके, या किसी दूसरे पाठ को हटाकर, जादू-टोने और अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता का एक पाठ पढ़ाना चाहिए। ताकि बच्चे बचपन से ही एक वैज्ञानिक सोच को लेकर आगे बढ़ें।
समाज को यह भी सोचना चाहिए कि उसके भीतर चल रहे कौन-कौन से नारे और फतवे ऐसे हैं जो तरह-तरह का अंधविश्वास पैदा करते हैं और बढ़ाते हैं। इनमें धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए भी कई तरह के मुद्दे रहते हैं जो कि अंधविश्वास को बढ़ाए बिना भी आस्था का काम तो कर सकते थे, लेकिन आस्था को आक्रामक बनाने के लिए कई वर्ग अंधविश्वास का सहारा लेने लगते हैं। देश में जब वैज्ञानिक चेतना कमजोर होने लगती है, लोगों के दिमागों से कोशिश करके वैज्ञानिक चेतना को हटाया जाता है, तब उस खाली जगह पर अंधविश्वास आसानी से कब्जा कर लेता है। वैज्ञानिक चेतना का मतलब कहीं भी धर्म या आध्यात्म विरोधी होना नहीं होता। वैज्ञानिक चेतना का मतलब लोगों में तर्कसंगत तरीके से सोचने की एक आदत विकसित करना होता है जो कि विज्ञान की एक स्वाभाविक प्रक्रिया रहती है। कई लोग विज्ञान पढ़े हुए नहीं रहते, लेकिन अपनी प्राकृतिक और स्वाभाविक समझ से वे वैज्ञानिक तरीके से सोचने वाले रहते हैं। इंसान ने जब चक्का बनाया था, या आग का अविष्कार किया था, तो वह किसी आस्था से नहीं किया था। वैज्ञानिक समझ से किया था।
जगह-जगह छोटे बच्चों से लेकर बूढ़े लोगों तक जब अंधविश्वास की वजह से गरीब मरीजों की मौत होती है, तो यह न सिर्फ सरकारी इंतजाम की शिकस्त रहती है, बल्कि यह समाज में जनचेतना कमजोर होने का एक सुबूत भी रहता है।
क्या सोचते हैं आप?
- तृप्ति सोनी
नक्सल हिंसा के साथ-साथ बुनी गई प्रेमकथा....
अगर आप बस्तर जा चुके हैं, एक नहीं, कई बार जा चुके हैं, फिर भी आपका मन नहीं भरता, और अगर आप बस्तर नहीं गए हैं, वहां जाना चाहते हैं, वहां के बारे में जानना चाहते हैं, बस्तर को जीना चाहते हैं, तो दो घंटे निकाल लीजिए। आप सोच रहे होंगे दो घंटे में बस्तर को जानना कैसे मुमकिन है? और ऐसा क्या है उन दो घंटों में? तो इसके लिए आपको अपने नजदीकी सिनेमाघर जाकर ‘माटी’ फिल्म देखनी चाहिए।
लंबे अरसे तक बस्तर को नक्सल हिंसा की वजह से जाना गया। जो नक्सल हो गए, उन्हें खूंखार और हिंसक मान��� गया। छवि ऐसी रही, मानो बस्तर में कदम रखते ही नक्सली गोली से भून देंगे। लेकिन बस्तर के ज्यादातर लोग किन हालात में नक्सल संगठन का हिस्सा बनने को मजबूर हुए, या होते रहे, इसकी एक झलक इस फिल्म में दिखाई गई है। फिल्में काल्पनिक होती हैं, लेकिन उनमें से कुछ हकीकत के करीब भी होती हैं। ऐसी ही एक फिल्म 'माटी' के कुछ हिस्सों, या ज्यादातर हिस्सों को आप नक्सल हिंसाग्रस्त बस्तर की हकीकत से जोड़ सकते हैं। फिल��म की कहानी आपको बांधे रखती है क्योंकि यहां नक्सलवाद की पृष्ठभूमि के साथ एक प्रेम कहानी भी गूंथी हुई है। भीमा और उर्मिला की प्रेम कहानी। हालात, मजबूरी और नक्सल संगठन के असर में दोनों हथियार उठा लेते हैं। नक्सल संगठन में रहते-रहते दोनों में प्यार होता है, लेकिन किसी भी प्रेम कहानी की तरह इनकी मंजिल भी आसान नहीं रहती, ये देखना अपने आप-में रोमांचक है। भूमिका शाहा और महेन्द्र ठाकुर ने शानदार अभिन��� किया है, दोनों ही ब��्तर के रहने वाले हैं, शिक्षक हैं।
हिंसा समर्थक नक्सल विचारधारा को आईना दिखाती इस फिल्म में संवाद बड़े असरदार हैं। इस फिल्म में असली आत्मसमर्पित नक्सलियों और असली डीआरजी जवानों के बीच मुठभेड़ के सीन फिल्माए गए हैं। फिल्म निर्देशक अविनाशजी मेरे अच्छे दोस्त हैं, वे लंबे समय से बस्तर में पत्रकारिता कर रहे हैं, फिल्म निर्माण और प्रोडक्शन के जानकार हैं। करीब 3 साल पहले मेरा बस्तर जाना हुआ था त�� अविनाशजी इस फिल्म की एडिटिंग पर काम कर रहे थे। इसके दो साल पहले से फिल्म की शूटिंग चल रही थी। 5 साल की मेहनत के बाद ये फिल्म पर्दे पर आई है। बस्तर के ही संपत झा, जो इस फिल्म के निर्माता हैं, उनकी लिखी कहानी बस्तर के एक बहुत तकलीफदेह दौर का इतिहास भी है।
रायपुर के मल्टीप्लैक्स में छत्तीसगढ़ी फिल्म 'माटी' देखते हुए मैंने जो तस्वीर अपने कैमरे से ली, मैंने इस लेख के साथ उसे पोस्ट किया है। ये एक दृश्य ���ेरी आंखों में बस गया है। फिल्म में ऐसे कई दृश्य हैं जिनमें बस्तर की प्राकृतिक सुंदरता, घने जंगल, पर्यटन स्थल, झरने, पहाड़, नदियां आप देख पाएंगे। माटी टीम ने शानदार फिल्मांकन किया है।
- तृप्ति सोनी
माननीय मुख्यमंत्री @vishnudsai जी
छ.ग.में शिक्षक व व्याख्याता के वेतन में मात्र ₹2500-₹3000 का अंतर, जबकि सहायक शिक्षक (प्राथमिक) में ₹10,000+ का भारी अंतर
समान कार्य,असमान न्याय सहायक शिक्षकों को भी समान ��्रेड पे मिले
@vijaysharmacg
@ArunSao3
@OPChoudhary_Ind
@brijmohan_ag
“स्वच्छता – जिम्मेदारी नहीं, संस्कार है”
स्वच्छता सिर्फ सफाई नहीं, यह हमारी सोच और संस्कार का प्रतीक है।
आओ, #SwachhSankalpAbhiyan से जुड़ें और हर गली, मोहल्ले, स्कूल, और गाँव को बनाएं स्वच्छता की मिसाल।
जब हर व्यक्ति जिम्मेदारी लेगा, तभी भारत सच में बनेगा
#Trashtag