प्रभु से विनय हमारी ये है
लौटा दो वो बचपन का दौर
जहाँ ना थी कोई ईर्ष्या द्वेष
थी बस खुशहाली हर ओर
बस अब यही व्यथा है मेरी
भँवरजाल में लिपटा हूँ नहीं मिल रहा कोई छोर
अपना पराया और मन के भेद ने
छिटका साई रिश्तों की डोर
क्या हसरत थी क्या मजबूरी
समझनेवाला कोई नहीं
मन व्यथित है व्याकुल है
पथ प्रदर्शक कोई नहीं
भ्रमित जीव है ग़ैरों के बीच में
अब अपना कोई नहीं
सकल संसार वेदना से भरा है
मिलता मुक्ति द्वार कोई नहीं
अंतस में फटा है पीड़ा का ज्वालामुखी
पर कहे किसे सुन ने वाला कोई नहीं
अश्रु नयन तक भरे पड़े है
ढाँढस देने को कोई नहीं
ज़िंदगी तो बद वफ़ा है
मौत ही तो अंजाम है
ये मैं नहीं कहता
ये तो पीरों का पैग़ाम है
��ि व्यथा है यही बस
कि मौत पर इल्ज़ाम है
ज़ो माँगता है मन्नत में इसको
उस से ये करती दूर से प्रणाम है
गिन रहे है सब अपने दिन
लिए हाथ में जाम है
ज़िंदगी तो बद वफ़ा है
मौत ही तो अंजाम है
#पथिक
#मौत तो एक दिन आनी है
पर उससे पहले कई जिंदगियां बचानी है।
#आपके अपने परिवार #सहायता_परिवार के द्वारा लगाए जा रहे ब्लड डोनेशन कैम्प में कल सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक आप जरूर आइयेगा।
आपका एक यूनिट ब्लड किसी को जिंदगी दे सकता है।
कुछ अनकही बाते
काश हम सुन पाते
तो खो क��� खुद को
शायद तब तुमको पाते
रिश्तों की क़दर क्या है
ये अगर जान जाते
शायद तब तुमको पाते
बहुत दूरियाँ थी हम में
थोड़ा सा हम आगे आते
शायद तब तुमको पाते
सोच रहा हूँ मै ये क्या है
ज़िंदगी की उल्झने
ग़र ये मिल कर सुलझाते
शायद तब तुमको पाते
ऐ मौत थोड़ा सब्र कर अभी मेरी ग़ज़ल बाक़ी है
सूद निपट गए तो क्या अभी तो असल बाक़ी है
जो बोई थी इश्क़ ए रंज़िश की फसल बाक़ी है
बहुत लम्बी क़तार है वो ही अभी फ़ज़ल बाक़ी है
@पथिक़सिंह
क्यू आक्रोश नहीं आता क्या मानवता अब सो गई है
ये कैसी मजबूरी है या कायरता क्यूँ राजनिष्ठा सो गई है
हर छोटी से छोटी बात बन जाती है कभी बड़ी खबर
मौत उन भगवाधारियों की ये खबर कहा पर खो गई है
भारत की ये बे मौसम बरसात नहीं है धारा पर
ये दुर्दांत कृत्य देख आज माँ भारती भी रो गई है
चार महीने से पूरा होटेल कर्मचारी बेरोज़गार बैठा है, हाथ में हुनर है फिर भी भुखमरी की कगार पर आ गए क्या सरकार को नहीं दिख रही हमारी हालत।
या हमारे प्रति कोई उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है
😡😡
@chefpathik @PMOIndia@narendramodi
🙏🙏🙏
इन भीड़भाड़ के शहरों में आज पुराने गाँव ढूँढ रहा हूँ
वो करलव करते पंक्षी और पीपल की छाँव ढूँढ रहा हूँ
सुबह अखाड़ों में लगने वाले पहलवानो के दांव ढूँढ रहा हूँ
@Avnijesh
जो कभी ना देख सका था दिखा गया है आईना!
कौन है अपना कौन पराया सिखा गया है आईना!
जो भी अब तक मिले सब के सब है चाटुकार
पथिक़ सारे गुण अवगुण को बता गया है आईना!!@Avnijesh
डियर संबित, कांग्रेस की जवानी में तो आप गब्हे पे रहे होंगे (गब्हे का मतलब आप उड़ीसा में नहीं यूपी में पूछना)। लेकिन करोना पर सरकार की नाकामी ने मेरी इस बात को सही साबित किया कि भारत में 35 करोड़ इंसान और 100 करोड़ जानवर रहते हैं, जो सिर्फ वोट देने के काम आते हैं।
एक अज़ब सी जद्दोजहद उठ रही थी दिल में
एक आह आवाज़ बनकर कुछ कह रही थी दिल में
काश कह देता मैं अपने ज़हन की ख़्वाहिश
पर अब तो हसरत भी सिमट रही थी दिल में
पथिकसिंह
मेरे हर एक लब्ज़ पर उसकी वाह थी
पता नहीं वो मेरी तारीफ़ या परवाह थी
चल तो पड़े थे बेख़ौफ़ पर कँटीली राह थी
शूल चुभे थे पर होंठों पर ना कोई आह थी
हर दर्द सुहाना ��ग रहा था तब पथिक़ को
क्योंकि दूर दिख रही मंज़िल की ही चाह थी.
आज फिर इश्क़ के समन्दर में इक सैलाब उठा है
दफ़न पड़ा था जो सीने में वो पुराना ख़्वाब उठा है
ये दिन जो कभी पतझड़ के थे गुजर गए शायद
इन कँटीली टहनियो पर फिर से एक गुलाब उठा है। @anamikamber@DrKumarVishwas@KaviSammelan
क्यू आक्रोश नहीं आता क्या मानवता अब सो गई है
ये कैसी मजबूरी है या कायरता क्यूँ राजनिष्ठा सो गई है
हर छोटी से छोटी बात बन जाती है कभी बड़ी खबर
मौत उन भगवाधारियों की ये खबर कहा पर खो गई है
भारत की ये बे मौसम बरसात नहीं है धारा पर
ये दुर्दांत कृत्य देख आज माँ भारती भी रो गई है