@RajCMO@Ra_THORe Since 2020
Emitra service charges remain unchanged , Please see in last 5 years how inflation increase the cost of living , emitra ecosystem need at least 100% service charge hike to deliver best services to citizens .@eMitraRajasthan@zeerajasthan_
@RajCMO@Ra_THORe
साल 2020 से #eMitra सेवा शुल्क में कोई वृद्धि नहीं हुई है, जबकि पिछले 5 वर्षों में महंगाई ने हर लागत को दोगुना कर दिया है।
अगर नागरिकों को बेहतरीन सेवाएँ देनी हैं तो eMitra पारिस्थितिकी तंत्र को कम से कम 100% सेवा शुल्क वृद्धि की तत्काल ज़रूरत है।
@eMitraRajasthan@zeerajasthan_
@RajCMO@Ra_THORe
eMitra 20 सालों से राजस्थान के हर नागरिक तक सरकारी सेवाएँ पहुँचा रहा है।
पर 2020 से शुल्क वही है, जबकि महंगाई दोगुनी हो गई।
अब समय है eMitra संचालकों को सम्मानजनक पारिश्रमिक देने का —
100% शुल्क वृद्धि ही जनसेवा की निरंतरता की गारंटी है।
@eMitraRajasthan@zeerajasthan_
जलबहुल नदी घाटियों के अधिशेष जल को शुष्क क्षेत्रों में लाने के उद्देश्य से शारदा-यमुना-राजस्थान-गुजरात परियोजना के क्रियान्वयन हेतु मुख्यमंत्री जी को पत्र लिखकर अवगत कराया।
यह परियोजना राजस्थान जैसे जल संकट झेल रहे प्रदेश के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे कृषि, पेयजल और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में बड़ा लाभ होगा।
@RajCMO
उपराष्ट्रपति श्री जगदीप जी धनखड़, जो एक किसान परिवार से हैं और अपने संघर्ष व सशक्त नेतृत्व के लिए जाने जाते हैं, उनके खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव ने जाट समाज की भावनाओं को गहराई से आहत किया है। यह प्रस्ताव न केवल एक व्यक्ति के खिलाफ है, बल्कि किसान वर्ग और मेहनतकश समाज के उस सम्मान पर चोट करता है, जो उन्होंने वर्षों के संघर्ष और मेहनत से अर्जित किया है।
श्री धनखड़ का उपराष्ट्रपति बनना, जाट समाज के लिए न केवल गर्व का विषय है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि एक साधारण किसान परिवार से भी कोई व्यक्ति देश के सर्वोच्च पदों तक पहुंच सकता है। उनके खिलाफ यह प्रस्ताव, समाज को यह महसूस कराता है कि उच्च पदों पर किसान पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को देखना कुछ लोगों को स्वीकार नहीं है।
जाट समाज इस राजनीतिक कदम को समाज के सम्मान और आत्मगौरव के खिलाफ मानता है। यह प्रस्ताव न केवल एक व्यक्ति पर निशाना है, बल्कि पूरी किसान कौम के सपनों और संघर्षों को भी अनदेखा करता है। जाट समाज इस मुद्दे पर एकजुट होकर यह स्पष्ट संदेश देता है कि वह अपने गौरव की रक्षा के लिए हमेशा खड़ा रहेगा।
@VPIndia
आज आरक्षण अधिकार मंच की टीम ने मुख्य सचिव व DOP सेक्रेटरी से मुलाकात की, जिसमें ओबीसी, एससी, एसटी, एमबीसी जैसे आरक्षित वर्गों के लिए राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा जारी आरएएस-आरटीएस-आरपीएस भर्ती 2024 के विज्ञापन में आरक्षण नियमों की अनदेखी से अवगत करवाया।
वर्तमान विज्ञापन में आरक्षित वर्गों को संविधान और कानून द्वारा निर्धारित आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिल रहा है, जो कि गंभीर चिंता का विषय है।
हमने मुख्य सचिव व DOP सेक्रेटरी से मिलकर कहाँ की इन वर्गों के लिए तयशुदा आरक्षण को पूरी तरह लागू करते हुए पदों की पुनर्गणना की जाए और संशोधित विज्ञापन तुरंत जारी किया जाए।
मुख्य सचिव व DOP सेक्रेटरी दोनों ने हमें यह आस्वासन दिया है कि इस मामले को जल्द से जल्द दिखाकर सुधार किया जाएगा।
समान अवसर और आरक्षित वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए हमारा संघर्ष जारी रहेगा।
आप सभी का सहयोग और समर्थन इस मुहिम को और मजबूती देगा!
#आरक्षण_अधिकार #समान_अवसर #न्याय_मांगे #आरक्षित_वर्ग_के_हित_में
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#EqualityForAll
#JusticeForReservedCategories
#FightForFairRepresentation
#OBCSCSTRights
#EqualOpportunities
#InclusiveGovernance
#FairReservation
#EmpowerReservedClasses
#ReservedCategoriesMatter
#RAS
किसान केसरी बलदेव राम जी मिर्धा की पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन।
बलदेव राम जी मिर्धा द्वारा किये गये संघर्ष और कार्यों को यहाँ बताना चाहिए:-
जागीरदारी प्रथा राजस्थान में बहुत प्रभावशाली थी, और जागीरदार, जो भूमि और संसाधनों के मालिक थे, ने आम जनता, विशेष रूप से किसानों, पर अत्यधिक नियंत्रण कर रखा था।
जागीरदारी प्रथा के तहत, जागीरदारों के पास व्यापक भूमि और संपत्ति थी, और वे उन पर खेती करने वाले किसानों से भारी कर (बिगेड़ी) वसूलते थे। इस प्रथा के कारण किसानों का शोषण होता था और वे गरीबी और अन्याय की चपेट में रहते थे। जागीरदारों के अत्याचारों और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाले नेताओं में बलदेव राम मिर्धा प्रमुख थे।
बलदेव राम जी मिर्धा ने किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए जागीरदारी प्रथा के खिलाफ संघर्ष किया। उन्होंने किसानों को संगठित किया और उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उन्होंने किसानों को बताया कि वे जागीरदारों के शोषण के खिलाफ खड़े हो सकते हैं और न्याय की मांग कर सकते हैं।
बलदेव राम जी मिर्धा ने जागीरदारी प्रथा के खिलाफ आंदोलन चलाए और इस प्रथा को समाप्त करने के लिए सरकार पर दबाव डाला। उन्होंने जागीरदारों के अन्याय और अत्याचारों को उजागर किया और जनता को उनके खिलाफ संगठित किया।
बलदेव राम जी मिर्धा ने भूमि सुधार और कृषि नीति में बदलाव की मांग की, जिससे किसानों को लाभ हो। उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि भूमि का पुनर्वितरण किया जाए और किसानों को सीधे भूमि का मालिकाना हक दिया जाए, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें।
उन्होंने सामाजिक जागरूकता अभियान चलाकर ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने का काम किया। उन्होंने अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव और अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूकता फैलाने का प्रयास किया, जिससे समाज में समता और न्याय की स्थापना हो सके।
बलदेव राम मिर्धा के संघर्षों का परिणाम यह हुआ कि जागीरदारी प्रथा का प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा और किसानों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता मिली। उनके प्रयासों से राजस्थान में सामाजिक और आर्थिक सुधार हुए और किसानों की स्थिति में सुधार आया। जागीरदारी प्रथा के खिलाफ उनके संघर्ष ने उन्हें एक सच्चे समाज सुधारक और किसानों के नेता के रूप में स्थापित किया।
बलदेव राम जी मिर्धा का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला रहा है। उन्होंने शिक्षा को समाज सुधार और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण साधन माना और इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत प्रयास किए। उन्होंने शिक्षा की महत्ता को समझा और गाँव-गाँव में स्कूलों की स्थापना के लिए काम किया। उन्होंने ग्रामीण बच्चों, विशेष रूप से लड़कियों की शिक्षा पर जोर दिया।
उन्होंने कई शैक्षिक संस्थानों की स्थापना की, जो आज भी उनकी विरासत को संजोए हुए हैं। इन संस्थानों के माध्यम से उन्होंने समाज के वंचित और पिछड़े वर्गों को शिक्षा की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। उनके नाम पर कई शिक्षण संस्थान स्थापित किए गए हैं।
बलदेव राम मिर्धा का योगदान न केवल उनके समय में महत्वपूर्ण था, बल्कि आज भी उनके प्रयासों को सम्मान और प्रेरणा के साथ याद किया जाता है। उनका जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने रहेंगे।
आज सूचना सहायक भर्ती में आरक्षित वर्ग के साथ किये गए कुठाराघात के चलते सूचना प्रौद्योगिकी विभाग से अधिकारियों से अभ्यर्थियों को साथ ले जाकर मुलाकात की।
UPSC या अन्य राज्यों में कभी भर्तियों में ऐसी शिकायत देखने को नहीं मिलती जिसमें किसी भी आरक्षित वर्ग को कम सीट मिली हो परन्तु राजस्थान में रोस्टर के नाम पर विभागों के अधिकारियों ने ऐसी विसंगतियां उत्पन्न कर दी है जिसके कारण आरक्षित वर्ग का हक मारा जा रहा है।
जनरल कोटा किसी के लिए आरक्षित नहीं है उसमें हर कैटेगिरी के टॉपर जाते है जिन्हें बाद हमेशा जनरल श्रेणी में ही गिना जाना चाहिए परंतु राजस्थान में रोस्टर बनाते समय उन टॉपर्स के आगे उनकी मूल श्रेणी लिख दी जाती है जिसके कारण कई सालों बाद जब प्रोमोशन होता है या नई विज्ञप्तियों के लिए खाली पदों की गणना की जाती है तो विभागीय लापरवाही के चलते उन टॉपर्स को मूल श्रेणी में गिनकर रोस्टर में गड़बड़ी की जाती है और 24 साल के अपने संघर्ष में मैंने काफी विज्ञप्तियों में ऐसी लापरवाही पकड़ी भी है।
सूचना सहायक में अप्रैल माह में 500+ प्रोमोशन हुए थे और विभाग ने जो लिस्ट अपनी वेबसाइट पर डाली उसमे जनरल श्रेणी में चयनित ओबीसी वर्ग के युवाओं के आगे ओबीसी श्रेणी ही दर्शा रखी थी जिसके कारण इतनी परेशानी का सामना करना पड़ा।
विभाग अगर आरक्षित वर्ग के साथ गड़बड़ी नहीं करता है तो मैं पूछना चाहता हूं आखिर जब आरक्षित वर्ग के युवा जनरल कोटे में चयनित हो चुके है तो उनकी मूल श्रेणी दर्शाकर भ्रमित करने का काम क्यों किया जाता है?
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राजस्थान सरकार के पूर्व केबिनेट मंत्री महाराजा विश्वेन्द्र सिंह के पुत्र अनिरूद्ध सिंह द्वारा भरतपुर राज परिवार का निकास करौली के यदुवंशी राजपूतों से बताना घोर निन्दनीय एवं सरासर गलत है।
इतिहासकार ‘‘ज्ञात वंश’’ कुंवर रिसाल सिंह यादव, अंग्रेज लेखक इलियट भाग-3, कालिका रंजन कानूनगो के ‘‘हिस्ट्री ऑफ द जाट्स’’, ‘‘भरतपुर का इतिहास’’ के लेखक रामवीर सिंह वर्मा आदि गणमान्य ग्रन्थों के आधार पर श्रीकृष्ण से लेकर भरतपुर के अन्तिम नरेश तक भरतपुर राजपरिवार यदुवंशीय जाट क्षत्रिय है। यदुवंश की वंशावली से ज्ञात होता है कि तहनपाल के कई पुत्र थे, जिनमें ज्येष्ठ पुत्र धर्मपाल से करौली और उसके तीसरे पुत्र मदनपाल से भरतपुर जाट राजवंश के सिनसिनवार व सोगरिया परिवार निकले है। करौली का राजपरिवार जादोन राजपूत कहे जाते है और भरतपुर का राजपरिवार जाट। भरतपुर राजपरिवार का निकास करौली से नही है अपितू करौली राजपरिवार का निकास भरतपुर के यदुवंशीय जाटों से है।
भरतपुर के महाराजा किशन सिंह ने अखिल भारतवर्षीय जाट महासभा के सम्मेलन जो सन् 1925 ई0 में पुष्कर में हुआ था। शिलालेख में उनका नाम दर्ज है। इस सम्मेलन में महाराजा किशन सिंह ने अपने भाषण में कहा कि ‘‘मैं भी राजस्थान का एक निवासी हूँ। मेरा दृढ़ निश्चय है कि यदि हम योग्य हो तो कोई शक्ति संसार में ऐसी नही है जो हमारा अपमान कर सके। मुझे इस बात का भारी अभिमान है कि मेरा जन्म जाट जाति में हुआ है। हमारी जाति की शूरता के चरित्रों के इतिहास में पन्ने के पन्ने भरे पड़े है। मैं विश्वास करता हूँ कि शीघ्र ही हमारी जाट जाति की यश पताका संसार भर में फहराने लगेगी।’’
भरतपुर राजवंश के महाराजा सूरजमल से लेकर अन्तिम शासक महाराजा बृजेन्द्र सिंह ने अनेक अवसरों पर कहा कि वे जाट है व 4 जनवरी 2023 को राजस्थान के प्रमुख समाचार पत्रों में वक्तव्य जारी कर महाराजा विश्वेन्द्र सिंह ने पैधोर चामड़ मन्दिर पर आयोजित पंचायत में स्पष्ट कहा था कि उनके पूर्वज जाट थे, जाट है और जाट ही रहेंगे। इसी तरह 5 मार्च 2023 को जयपुर में आयोजित विशाल ‘‘जाट महाकुंभ’’ में भी महाराजा विश्वेन्द्र सिंह पधारे और दमभरा भाषण दिया था।
ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत व अपने पूर्वजों के विरूद्ध अनिरूद्ध सिंह का आचरण मानसिक दिवालिया पन का प्रतीक है। अनिरुद्ध सिंह का आचरण भरतपुर के महान जाट शासकों की प्रतिष्ठा और ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत तो है ही उन्होंने अपने पिता जाट समाज के गौरव महाराजा विश्वेन्द्र सिंह के विरूद्ध भी घोर निन्दनीय व्यवहार किया है।
अनिरूद्ध सिंह के बयान से भारतवर्ष का जाट समाज आहत है व उनके कृत्य की घोर भर्त्सना करता है। मर्यादाहीन आचरण करने वाले अनिरूद्ध सिंह का सामाजिक बहिष्कार करे।