बिखरा हुआ समाज कभी शासक नहीं बन सकता । यदि हम सत्ता हासिल कर व्यवस्था परिवर्तन करना चाहते हैं तो हमें जातियों को जमात के रूप में बदलना होगा।
#जाति_तोड़ो_समाज_जोड़ो
IITs, IIMs और Central Universities में आए दिन जातिवाद से जुड़ी ख़बरें आती रहती हैं। IIT Mandi में एक प्रोग्राम हुआ था, जिसमें पोस्टर पर लिखा था, “शूद्र का काम है सेवा करना।”
IIT दिल्ली में बिहार के ऋषिकेश ने आत्महत्या की। क्या हुआ उस पर? अब IIT बॉम्बे में एक दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली।
एक बार इन IITs में प्रोफ़ेसरों की डाइवर्सिटी चेक करिए, सारा खेल समझ आ जाएगा। वंचित तबक़ों के बच्चों के लिए कितना सपोर्ट सिस्टम है?
SC, ST और OBC तबकों से आने वाले छात्रों के साथ भेदभाव को इतना नॉर्मलाइज़ कर दिया गया है कि अब वह किसी को दिखाई ही नहीं देता!
पर छात्र अब बिना डरे सवाल कर रहे हैं। IIT दिल्ली में भी छात्रों को प्रशासन ने धमकाया, फिर भी छात्र झुके नहीं।
रोहित की शहादत के बाद देश में जो चिंगारी लगी थी, वह अब बुझेगी नहीं! सवाल भी होगा और जवाब भी देना होगा। कितने पायल, रोहित, मुथु?
हर संस्थागत हत्या का हिसाब माँगा जाएगा।
“मैं हेकम कंपनी के माध्यम से नर्स के पद पर काम करने दिल्ली गई। जाते ही एक हॉस्टल में कैद कर दिया गया।वहाँ लड़कियों को वीडियो कॉल कर लड़कों के सामने पेश किया जाता था”
ये भयावह सच है उस महिला का जिसे सम्राट चौधरी जी ने ख़ुद अपने हाथों से रोज़गार मेला में जॉइनिंग लेटर दिया था।
बिहार से दिल्ली जाते ही उसे बेचने की कोशिश की गई? बिहार की बेटियों के साथ बिहार सरकार क्या कर रही है?
कुछ सालों से पार्क की वीडियो आती थी जहां अंकल लोग बैठकर मोदी को भगवान विश्वगुरु बताते थे अब GEN Z के बाद अब पार्क में अंकल लोग भी चौकीदारी के राज में तमाम चोरी का जिक्र करने लगे हैं
बात त��� सही है उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है।
सोचिए बीजेपी के लोग किस प्रकार से जनता के द्वारा दिए गए टैक्स का द���रुपयोग कर रहे हैं,
आखिर जिस घर में कोई व्यक्ति नहीं रहता है वहां सुरक्षा की क्या जरूरत है?
पिछले लोकसभा चुनाव से पहले, साल 2023-24 के वित्त वर्ष में कई छोटे दलों को काफ़ी ���़्यादा चंदा प्राप्त हुआ.
बीबीसी की टीम ने लगभग दो महीने इस मामले में पड़ताल की, उन्होंने छह ऐसे दलों के बारे में पता किया, जिन्हें 'रजिस्टर्ड अनरिकग्नाइज़्�� पॉलिटिकल पार्टीज़' यानी RUPPs कहते हैं.
बीबीसी की टीम को पता चला कि इन पार्टियों को सैकड़ों करोड़ का चंदा मिला, जोकि कुछ मामलों में किसी राष्ट्रीय दल से भी ज़्यादा रहा.
लेकिन ये पार्टियां चुनावी राजनीति में अधिकतर गायब ही रहीं.
एक्सपर्ट कहते हैं कि हो सकता है ये पार्टियां असल में स्वतंत्र राजनीतिक संगठन ना हों, इसके बजाय ये पार्टियां टैक्स चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग, हवाला लेनदेन और दूसरी वित्तीय ��नियमितताओं के लिए एक तरह से मोर्चे के तौर पर काम कर सकती हैं.
देखिए बीबीसी की यह ख़ास पड़ताल.
रिपोर्टः शुभांगी मिश्रा
शूट एडिटः दीपक जसरोटिया
ग्राफ़िक्सः वासिफ़ ख़ान और चेतन सिंह
अतिरिक्त रिपोर्टिंगः तेजस वैद्य
होल्डिंग एडिटरः अभिक देब
हल्द्वानी की घटना सीधे तौर पर छुआछूत (Untouchability) का मामला है।
हल्द्वानी ���ें शुद्धिकरण करके दलितों को संदेश दिया गया कि हम श्रेष्ठ हैं और वे नीची जाति के हैं, इसलिए Purification किया गया।
बाबासाहेब डॉ अंबेडकर जी ने वर्षों पहले महाड़ आंदोलन किया था, क्योंकि तब दलितों को जातिगत भेदभाव के कारण पानी पीने और उसके इस्तेमाल से वंचित रखा जाता था।
इसी को देखते हुए, डॉ अंबेडकर जी ने संविधान में आर्टिकल 17 शामिल किया, ताकि untouchability को ख़त्म किया जा सके।
BJP सरकार की आंखों के सामने हल्द्वानी में शुद्धिकरण की घटना हुई और उसमें कोई action नहीं लिया गया तो सोचिए देश के बाकी हिस्से में क्या होता होगा।
इतना सच नहीं बताओ अब तो इनके बीच अमित मालवीय भी नहीं रहा जो गोबर ���तिहास अंध भक्तों को बता पाये
इसका मतलब कुंभ का मेला मुसलमानों की देन है?
इतिहास के पन्नों में दर्ज भी है और सत्य भी है लेकिन कुछ लोगों को बहुत बुरा लगेगा!
कुछ दिन पहले एक बात कानों में पड़ी कि उत्तर प्रदेश की आधी आबादी को सालाना ₹50,000 दिए जाएंगे, ���िसमें चुनाव से पहले ₹20,000 और बाकी बाद में दिए जाएंगे। सुनकर अच्छा लगा, क्योंकि इस प्रदेश की आधी आबादी हम भी हैं।
लेकिन तुरंत बिहार की चुनावी घोषणाएं याद आ गईं—वहां भी बड़े-बड़े वादे किए गए। और फिर वो वादा भी याद आया, जब कहा गया था कि सरकार बनने पर हर खाते में ₹15 लाख आएंगे।
इसलिए सवाल ये है कि कहीं 2027 के चुनाव से पहले ₹20,000 और ₹50,000 का सपना दिखाकर वोट तो नहीं मांगा जा रहा? चुनाव के बाद कहीं यही न कहा जाए कि “वो तो चुनावी जुमला था।”
इसलिए बहनों-भाइयों, घोषणा सु���कर खुश होने से पहले वादे का हिसाब मांगिए, गारंटी मांगिए और पिछले वादों का जवाब मांगिए।
वोट आपका है, फैसला आपका है—लेकिन फैसला वादों पर नहीं, उनके पिछले रिकॉर्ड पर होना चाहिए।
उद्योगपतियों की चाँदी है। अगर बीजेपी के पक्षधर हुए तब तो सोना है।
अब देखिए कि बाईस हज़ार करोड़ रुपए सुभाष चंद्रा को द���ने हैं। कह दिया नहीं दे पाएंगे, तो नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल ने कहा कोई बात नहीं साढ़े छह करोड़ की किस्त बाँध देते हैं।
अब सुभाष चंद्रा आराम से चुकाते रहेंगे और क्या पता किसी दिन ट्रिब्यूनल ये कह दे कि ठीक है इतना नहीं दे सकते तो चलो एक तिहाई रकम देकर छुट्टी पाओ। अनिल अंबानी के मामले में ये हो चुका है।
अब इसके बरक्स किसी किसान का कर्ज़ रखकर देखिए। अगर उस पर पचास हज़ार का कर्ज़ है तो क्या बैंक ��हेगा कि कोई बात नहीं दस रुपए महीने देते रहो। नहीं कहेगा। वह उसका खेत, मकान जो भी मिलेगा ज़ब्त करके वसूली करेगा।
यही फ़र्क�� है इस व्यवस्था का। सारी सुविधाएं, सहूलियतें और राहतें धन पशुओं के लिए हैं, ग़रीब-गुरबा के लिए नहीं।
इतना डर, इतना ख़ौफ़?
छह साल के बच्चे को पुलिस ले जा रही है क्योंकि उसने प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगने वाला पोस्टर पकड़ा हुआ था।
इस तरह का भय अक्सर सरका���ों की विदाई का संकेत होता है या फिर इमर्जेंसी राज का।
सरकार के पास देश की हर समस्या का एक ही मरहम है. वो है वंदे मातरम.
देश में चीनी है कम, बोलो #वंदेमातरम
फूटा मंहगाई का बम, बोलो वंदे मातरम
एथेनॉल से इंजन गया थम, बोलो वंदे मातरम
मिड-डे मील में पानी ज्यादा सब्जी कम, बोलो वंदे मातरम
बच्चे तबेले में पढ़ें और शिक्षा मंत्री बेशर्म, बोलो वंदे मातरम
छात्रों पर चली पैलेट गन पर सरकार फैलाये झूठ और भ्रम, बोलो वंदेमातरम
भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा नौकरियां बहुत कम, बोलो वंदे मातरम
करीब एक हफ्ते से Insta पर ज्यादा सक्रिय हूँ और 👇 ये वायरल हो गया है.
पूरा वीडियो भी ज���रूर देखें। कुछ ऐसी ही लाइन हैं वीडियो के आखिर में भी.
https://t.co/VyS0Ml2XUR
जो अब तक नहीं देखा, अब देख लीजिए...
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मूक बधिर छात्र जब न्याय के लिए सड़क पर उतरे तो उनका भी भाज���ा सरकार की पुलिस ने बड़ी बेशर्मी से क्रूर दमन किया।
न्यूनतम नैतिकता का पालन करे यूपी पुलिस और सरकार, मांगो को सहानुभूतिपूर्वक सुना जाये।
स्मृति ईरानी ने कहा था कि
कमल का बटन दबाओ,
चीनी 13 रूपये किलो मिलेगी,
जबकि आज कमल का बटन दबाने वालों को चीनी
60 से 75 रूपये प्रति किलो मिल रही है,
नेताओं को अपने कथनी करनी पर कोई शर्म नहीं आती है,