आखिर पुलिस की वर्दी कानून की रक्षा के लिए है या जनता को डराने के लिए?
अगर कोई पुलिसकर्मी सड़क पर खुलेआम बदसलूकी करे, धमकी दे और अपनी वर्दी का रौब दिखाए,
तो जनता सवाल जरूर पूछेगी — क्या पुलिसवाला कानून का रक्षक है या फिर गुंडागर्दी करने वाला?
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जब बिहार के मुख्यमंत्री साहब को शपथ तक सही ढंग से पढ़ने में कठिनाई हो रही है,
तो जनता सवाल पूछेगी ही कि आखिर बिहार का विकास किस दिशा में जाएगा?
जनता का सवाल सीधा है — जो नेता अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तैयारी और गंभीरता से नहीं निभा पा रहे, वे बिहार को आगे कैसे ले जाएंगे?
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क्या दुर्भाग्य है बिहार का!
जिस राज्य का मुख्यमंत्री मंच से पढ़ते समय भी सही ढंग से नहीं पढ़ पा रहा हो, उस राज्य की शिक्षा व्यवस्था का भविष्य क्या होगा?
बिहार के युवाओं का भविष्य मजाक नहीं है। अब समय आ गया है कि राजनीति में योग्यता, शिक्षा और जवाबदेही को प्राथमिकता दी जाए।
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E85 एथेनॉल को विकास का नाम दिया जा रहा है, लेकिन जनता के मन में कई सवाल हैं।
अगर पेट्रोल में 85% एथेनॉल मिलाया जाएगा, तो क्या देश के करोड़ों वाहन इसके लिए तैयार हैं? जो लोग अपनी मेहनत की कमाई से गाड़ी खरीदते हैं, अगर उनकी गाड़ियों पर असर पड़ा तो जिम्मेदारी कौन लेगा?
दूसरा बड़ा सवाल पानी का है। एथेनॉल उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में गन्ना और अन्य फसलों की जरूरत होती है। जब देश के कई इलाके आज भी पानी की कमी से जूझ रहे हैं, तो क्या भविष्य में पानी और खेती पर इसका असर नहीं पड़ेगा?
सरकार को सिर्फ नई नीति लाने से पहले यह भी बताना चाहिए कि:
किसानों को क्या फायदा होगा?
आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
पुराने वाहनों का क्या होगा?
पानी और खाद्य सुरक्षा पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
देश प्रयोगशाला नहीं है।
जनता की जेब, किसानों की खेती और आने वाली पीढ़ियों के संसाधनों पर असर डालने वाले फैसलों पर खुली बहस और पारदर्शिता जरूरी है।
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ये हैं हमारे आदरणीय मुख्यमंत्री अशोक चौधरी की पुलिस।
आखिर किसने दिया है इन्हें आम नागरिकों को बेवजह परेशान करने का हक़?
पुलिस का काम जनता की रक्षा करना है, न कि उन्हें प्रताड़ित करना।
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रोड टैक्स तो आम आदमी भरता है, फिर भी सड़कों पर गड्ढे क्यों हैं? आपको दुबई सरकार वहाँ की सड़क व्यवस्था सुधारने के लिए बुलाना चाहती है, लेकिन क्या आपने अपने ही देश की सड़कों की हालत देखी है, साहब?
#corruption#corruptsarkar#roadcorruption
किसानों की बात सुनने के बजाय अगर उन्हें सभा से बाहर निकालने की भाषा इस्तेमाल की जाए, तो यह सिर्फ एक किसान का नहीं, बल्कि पूरे अन्नदाता वर्ग का अपमान है।
जिन किसानों की मेहनत से देश की थाली भरती है, उन्हीं की आवाज़ दबाने की कोशिश क्यों? लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है। जनता और किसानों की समस्याओं का जवाब तर्क से दिया जाना चाहिए, ताकत और धमकी से नहीं।
आज किसान MSP, लागत, सिंचाई, बिजली और फसल के उचित दाम की बात कर रहे हैं। क्या उनकी बात सुनना सरकार की जिम्मेदारी नहीं है?
याद रखिए, लोकतंत्र में जनता मालिक होती है और जनप्रतिनिधि सेवक। जनता की आवाज़ को दबाने से सवाल खत्म नहीं होंगे, बल्कि और मजबूत होंगे।
किसानों का सम्मान करो, उनकी आवाज़ सुनो।
लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए, अपमान नहीं।
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क्या यही विकास है?
साहब, नल-जल योजना की ज़रूरत वहाँ है जहाँ पानी का अभाव है, जहाँ महिलाएँ आज भी पीने का पानी लाने के लिए दूर-दूर तक पैदल चलने को मजबूर हैं।
आपने इस योजना पर करोड़ों रुपये खर्च तो कर दिए, लेकिन क्या आज यह वास्तव में लोगों के काम आ रही है?
अगर लोगों को अब भी पानी के लिए भटकना पड़ रहा है, तो फिर इस खर्च और विकास का लाभ किसे मिला?
विकास का मतलब सिर्फ़ योजनाओं की घोषणा और करोड़ों रुपये खर्च करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसका लाभ ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचे।
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Dekhiye kya haal hai hamare desh ke system ka …
Government avtak chup kyu hai ispe???
Media aise news ko jada se jada dikhati kyu nahi hai …kya media ka kaam sirf gov ki chaplusi karna hai???
#worstsystem#ShameOnSystem#corruptSystem
E85 की बात हो रही है, लेकिन क्या किसी ने यह सोचा कि 85% एथेनॉल बनाने के लिए कितना पानी लगेगा?
एक तरफ देश के कई हिस्से पानी की कमी से जूझ रहे हैं, किसान सूखे से परेशान हैं, भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, और दूसरी तरफ गन्ना जैसी पानी-खपत वाली फसलों से बड़े पैमाने पर एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने की योजना बनाई जा रही है।
क्या सरकार ने पानी पर पड़ने वाले लंबे समय के प्रभाव का पूरा आकलन किया है?
जनता जानना चाहती है—
अगर पेट्रोल की जगह एथेनॉल बढ़ेगा, तो पानी कहाँ से आएगा?
अगर खेती का पानी ईंधन बनाने में जाएगा, तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा का क्या होगा?
विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास नहीं जो आने वाली पीढ़ियों को पानी के संकट में धकेल दे।
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बिहार के शिक्षा मंत्री का बयान सुनकर एक सवाल उठता है — अगर शिक्षक बनने के लिए IAS से भी ज्यादा इंटेलिजेंट होना चाहिए, तो फिर मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक बनने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए?
जब देश और राज्य का भविष्य शिक्षकों के हाथ में है, तो उन्हें सम्मानजनक वेतन, बेहतर सुविधाएं और स्थायी रोजगार क्यों नहीं मिलता?
और अगर शिक्षा व्यवस्था इतनी महत्वपूर्ण है, तो क्या जनता को यह अधिकार नहीं कि उसके जनप्रतिनिधि भी पढ़े-लिखे, योग्य और जवाबदेह हों?
बिहार आज भी शिक्षा, रोजगार और पेपर लीक जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में बड़े-बड़े बयान देने से नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने से बदलाव आएगा।
जनता अब सवाल पूछ रही है —
शिक्षकों से ऊंची अपेक्षाएं रखने वाले नेता खुद जवाबदेही के लिए कब तैयार होंगे?
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