मंज़िल को पा लेने की ख़्वाहिश एक बुनियादी इन्सानी ख़्वाहिश है। लेकिन हैरानी की बात तो ये है कि मिल जाने वाली मंज़िल भी आख़िरी मंज़िल नहीं होती। एक मंज़िल के बाद नई मंज़िल तक पहुँचने की आरज़ू और एक नए सफ़र का आग़ाज़ हो जाता है।
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"सब लिखने लगे हैं"
इस वाक्य को सदी की सबसे सुंदर पंक्ति होना था
तथाकथित कलम के रक्षकों ने
इसे यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि
कुछ भी लिखने लगे हैं
उनका दर्द बस इतना है कि सब चुभने लगे हैं,
क्योंकि सब लिखने लगे हैं
सब दिखने लगे हैं।
- आदित्य रहबर
(फ़ोटो: मंटो)