Masterclass on storytelling with Dastan e Karn Az Mahabharata by the maestro Mahmood Farooqui in Delhi. 1st August, 6:30pm, LTG theatre, Mandi House
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Happy to announce the release of my new Hindi book on #Basant and it's cultural heritage: आज रच्यो है बसंत निजाम घर (Aaj Rachyo Hai Basant Nijam Ghar). This richly illustrated and full-colour book on Basant maybe first of its kind in Hindi. https://t.co/oqePXIoVn4
आज गुरुदत्त की जयंती के अवसर पर, हम उस महान फिल्मकार को याद कर रहे हैं जिन्होंने सिनेमा को एक नया फलसफा दिया. क्या गुरुदत्त जैसे कालजयी कलाकार, जिन्होंने अपनी फिल्मों के माध्यम से जीवन के गहरे एकांत, रचनात्मक जुनून और सामाजिक पाखंड को पर्दे पर उतारा, अपनी ही बनाई उन कहानियों के भंवर में खुद को पूरी तरह क्यों नहीं बचा सके? क्या एक ऐसा निर्देशक जो अपनी फिल्मों में पूर्णता के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था, अपनी निजी जिंदगी के दुखों और बेचैनी से पार पाने में विफल रहा? क्या गुरुदत्त की फिल्मों में दिखने वाली तल्खी, सरकशी और सच्ची मोहब्बत की तलाश केवल सिनेमाई पात्रों की कहानी थी, या वह स्वयं गुरुदत्त के अंतर्मन का ही अक्स था?
इन्हीं सवालों और गुरुदत्त की रहस्यमयी एवं सृजनात्मक यात्रा को समेटे हुए है महमूद फ़ारूक़ी द्वारा लिखित पुस्तक 'दास्तान-ए-गुरुदत्त'. यह पुस्तक केवल गुरुदत्त की जीवनी नहीं है, बल्कि उनकी फिल्मों, उनके संगीत, उनके साथियों और उस कालखंड की एक जीवंत दास्तान है. इसमें 'प्यासा', 'काग़ज़ के फूल' और 'साहब बीवी और गुलाम' जैसी कालजयी फिल्मों के बनने के पीछे की जद्दोजहद, गुरुदत्त का वहीदा रहमान और गीता दत्त के साथ रिश्ता और मुंबई फिल्म उद्योग की उस दौर की राजनीति को बेहद बारीकी और संवेदनशीलता से दर्ज किया गया है.
राजकमल प्रकाशन प्रकाशित पुस्तक ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ पर वरिष्ठ पत्रकार @jai_shiven की राय.
पूरी वीडियो : https://t.co/jOefcBehI4
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आज गुरुदत्त की जयंती है। गुरुदत्त के जीवन पर, सिनेमा पर एक से एक किताबें लिखी गईं। सबसे नई किताब इस साल आई है। महमूद फ़ारूक़ी की ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’। सवाल यह उठता है कि इस किताब में क्या है जो पिछली सभी किताबों से अलग है? वह यह कि गुरुदत्त के ऊपर पहली बार किसी इतिहासकार ने किताब लिखी है। महमूद फ़ारूक़ी का नाम दास्तानगोई के पर्याय के रूप में लिया जाता है लेकिन लोग भूल जाते हैं कि वे मूलतः एक प्रशिक्षित इ��िहासकार हैं। इस किताब में उनका इतिहासकार मुखर है। हर प्रसंग किसी न किसी संदर्भ के साथ आया है जो इस किताब को बेहद ��्रामाणिक बना देता है। हिंदी, उर्दू, संस्कृत से यूरोपीय भाषाओं के इतने संदर्भ इस किताब में आए हैं जो इस किताब को सिनेमा पर हिंदी में लिखी गई अब तक सभी किताबों में सबसे अलग करता है। गुरुदत्त के साथ साथ सिनेमा के एक पूरे दौर पर लिखी गई एक बारीक किताब है यह। उस दौर पर जिसमें गुरुदत्त सबसे अलग तरह की फ़िल्में बनाते रहे। प्यासा और कागज के फूल जैसी फ़िल्में, जैसी फ़िल्में उस समय कोई सोच भी नहीं सकता थ��। गुरुदत्त की बेचैन रूह जैसे इस किताब के पन्नों पर ज़िंदा हो गई है। किताब में आता है कि जब गुरुदत्त अपने बिस्तर पर मृत पाये गए तो उनकी दायीं तरफ़ हिंदी की एक किताब पड़ी हुई थी। आख़िर हिंदी की वह कौन सी किताब थी जिसको मरते वक़्त गुरुदत्त पढ़ रहे थे।
अंग्रेज़ी में जिसको मस्ट रीड कहते हैं वैसी किताब है राजकमल से प्रकाशित दास्तान-ए-गुरुदत।
@DastangoiTheArt
@RajkamalBooks
@DastangoiTheArt बहुत शुक्रिया। मुझे पता है ये बात क्योंकि हिमांशु कॉलेज में मेरे साथ थे और हम सब थियेटर ग्रुप इब्तिदा से भी जुड़े थे। बहुत अच्छा परफॉर्म किया हिमांशु ने। वो महमूद भाई को याद करता रहता है।
@prabhatranjann बहुत मुबारक कम
लोग जानते हैं की हिमांशु त्यागी ने २००५ में दास्तांगोई का पहला शो महमूद फ़ारूक़ी के साथ किया था और पूरे एक साल तक करते रहे थे … उसी से आधुनिक दास्तानगोई की बुनियाद क़ायम हुई थी
कल मुंबई की शाम बहुत यादगार रही। मेरे उपन्यास हिंदी मीडियम टाइट पर वर्सोवा में रंगशिला में हिमांशु त्यागी ने जबरदस्त प्रस्तुति की। आभार शालिनी वत्स का, निर्देशक बिजेश जयराजन का। सबसे बढ़कर हिमांशु त्यागी जिनके प्रदर्शन को देखते हुए लग ही नहीं रहा था कि यह मेरी किताब की प्रस्तुति है। उन्होंने जैसे उस किताब को आत्मसात कर लिया है। भारी बारिश के बावजूद बहुत सारे दोस्त आए। सीनियर नरेश शर्मा, मित्र पंकज दुबे, उमाशंकर सिंह, मोहित चौधरी, सूरज किशोर। और उन सबका आभार जो दोनों शो में आए और प्रस्तुति का आनन्द उठाया।
अब बाय बाय मुंबई!