पिता हैं
तो छतरी है। जूते हैं
पिता हैं
तो दरख़्त है। हिमालय है
पिता हैं
तो नींद है। सपने हैं
पिता हैं
तो ��ुविधा है नास्तिक होने की,
पिता के होते
ईश्वर की प्रार्थना ज़रूरी नहीं।
माँ है
तो लोरी है। शगुन है
माँ है
तो गीत है। उत्सव है
माँ है
तो मंदिर है। मोक्ष है
माँ है
तो मुमकिन है शहंशाह होना,
माँ के आँचल से बड़ा
दुनिया में कोई साम्राज्य नहीं।
- डॉ सरोज कुमार वर्मा