अभी थोड़ी देर पहले भाजपा के गुंडे स्कूल में घुस आए और हमारे टीम के लोगों के साथ मारपीट की। बच्चों के सामने।
और यह सब जब हुआ, तब थानागाजी के SHO ने अपनी पूरी टीम पीछे कर ली।
भाजपा के गुंडो से हम डरने वाले नहीं है। स्कूल तो हम ठीक कराकर ही मानेंगे।
Dear Ms @HelleLyngSvends,
The Embassy is organizing a press briefing on the Prime Minister’s Visit this evening at 9:30pm at hotel Raddisson BluPlaza hotel. You are most welcome to come and ask your questions there.
“ये कभी मत पूछना कि देश ने तुम्हारे लिए क्या किया है, पूछना तो खुद से पूछना कि तुमने देश के लिए क्या किया है।”
यह लाइन फिल्मों में भारी लगती है। लेकिन उत्तराखंड के एक लाल के लिए यह आज कड़वी सच्चाई बनकर सामने आई है।
जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ में मुठभेड़ के बाद उपचार के दौरान कपकोट, बागेश्वर के बीथी पन्याती गांव निवासी पैरा ट्रूपर हवलदार गजेंद्र सिंह गढ़िया ने अंतिम सांस ली। देश के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दे दिया। लेकिन जब उनका पार्थिव शरीर घर लौट रहा था, तो एक सवाल पहाड़ की तरह खड़ा मिला। उनके गांव तक सड़क नहीं है।
परिजन चाहते थे कि बेटे का पार्थिव शरीर गांव पहुंचे, उस मिट्टी तक जहां उसने जन्म के बाद पहला कदम रखा था। लेकिन गांव मुख्य मार्ग से करीब पांच किलोमीटर दूर है और सड़क नहीं होने के कारण सिस्टम के आगे मजबूर होकर उन्हें कार्यक्रम कपकोट में तय करना पड़ा। कई रिश्तेदार और गांववासी अंतिम दर्शन नहीं कर सके। बुजुर्ग माता पिता को बेटे के अंतिम दर्शन के लिए करीब चार किलोमीटर पैदल चलकर सड़क तक आना पड़ा, फिर 13 किलोमीटर वाहन से डिग्री कॉलेज मैदान पहुंचे। मां बाप का बिलखना, उस पूरे सिस्टम पर एक चुप्पी की तरह गिरता है।
कपकोट में अंतिम दर्शन को जनसैलाब उमड़ा। “भारत माता की जय” के नारों से घाटी गूंज उठी। और सरयू खीरगंगा संगम पर सैन्य सम्मान के साथ अंत्येष्टि हुई। सम्मान भी मिला, श्रद्धांजलि भी मिली। लेकिन गांव की सड़क का सपना, जो वर्षों से लोगों की आंखों में था, वह भी शायद उनके साथ ही चला गया।
अब अगर सच में श्रद्धांजलि देनी है, तो फूलों और नारों से आगे बढ़ना होगा।
शहीद गजेन्द्र सिंह गढ़िया के गांव को सड़क से जोड़ना, तुरंत सड़क निर्माण का काम शुरू करवाना, और उस सड़क का नाम उन्हीं के नाम पर रखना ही देश के सच्चे सपूत को सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है।
यह पोस्ट याद दिलाने के लिए है कि पहाड़ अपने सपूत देता रहा है। पर पहाड़ के गांव आज भी वही सवाल पूछ रहे हैं। सड़क कब आएगी? अस्पताल कब पास होगा?
@pushkardhami
“इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक ने कहा गढ़वाल–कुमाऊँ क्षेत्र मे Scheduled Districts Act, 1874 लागू था”
जिसे भारतीय संविधान में अब पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) कहा जाता है।
शर्मनाक, उत्तराखंड में नहीं है आपदा प्रबंधन नीति!
धराली में 147 लोगों के लापता होने संबंधी कर्नल अजय कोठियाल के बयान ने उत्तराखंड की राजनीति में ज़बरदस्त भूचाल ला दिया है। यह मामला अब केवल दो राजनीतिक दलों के बीच तकरार तक सीमित नहीं रहा बल्कि राज्य के लोगों और सरकार के भीतर भी गंभीर मतभेद और अव्यवस्था उजागर कर रहा है।
लेकिन जब हम धराली जैसी दुखद और चिंताजनक घटनाओं पर चर्चा कर ही रहे हैं, तो यह एक बार फिर याद दिलाना ज़रूरी है कि उत्तराखंड आज भी आपदा प्रबंधन नीति के बिना चल रहा है।
यह वही राज्य है जो हर साल भूस्खलन, बाढ़, जंगल की आग, सड़क दुर्घटनाओं और अत्यधिक जलवायु घटनाओं से जूझता है। यह वही प्रदेश है जिसने केदारनाथ 2013 से लेकर चमोली 2021 और अनगिनत मानवीय त्रासदियाँ देखी हैं। फिर भी हमारे पास आज तक एक स्पष्ट Disaster Management Policy क्यों नहीं है?
क्या यह शर्म की बात नहीं है कि एक पहाड़ी राज्य, जो सबसे अधिक आपदाओं का बोझ उठाता है, वह अभी भी “घटना-के-बाद प्रतिक्रिया” पर निर्भर है? क्या मुख्यमंत्री और उनकी सरकार को इस पर तुरंत ध्यान नहीं देना चाहिए?
आज राजनीतिक बयानबाज़ी से ज़्यादा ज़रूरत व्यवस्था की जवाबदेही की है। धराली की त्रासदी हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि आपदा प्रबंधन पर गंभीर पहल के बिना, उत्तराखंड लगातार जोखिम में ही रहेगा।
इसमें कोई संदेह नहीं कि उत्तराखंड में लगभग सभी सिस्टम धराशाई हो चुके है और आपदा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बेहद कम काम हुआ है। खैर अब तो जिम्मेदारी लेनी चाहिए और सरकार को एक मज़बूत आपदा प्रबंधन नीति तैयार करनी चाहिए। हम उत्तराखंड के लोग इससे कम के हकदार नहीं है।
#उत्तराखंड
#Uttarakhand
PS : Sharing RTI reply dated 24 Sept, 2025 from USDMA on above subject!
Shri @pushkardhami (For Information and Action)
@PMOIndia (For Information)
@ndmaindia (For Information)
न्यूज़ चैनल कंपनियों से निवेदन है —
आपके प्रवक्ता न्यूज़रूम सीट पर बैठते ही बीजेपी के प्रवक्ता बनकर बातें करना शुरू कर देते हैं और जब तक छोड़ नहीं देते तब तक लगातार बीजेपी और मोदी सरकार के हर पाप का बचाव करते रहते है.
कई बार जनता के बेइज्जत करने करने पर भी ये बाज नहीं आते.
कृपया संज्ञान लें, ये ठीक नहीं है.
चौखुटिया सीएचसी तैनाती का मामला अब उलझनों से भरा हो गया है।
16 अक्टूबर 2025 को जारी शासनादेश के अनुसार चौखुटिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में दो विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती की गई थी —
1.डॉ. मंजू रावत, स्त्री रोग विशेषज्ञ, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र रायपुर (देहरादून) से स्थानांतरित
2.डॉ. रेनू अग्निहोत्री, बाल रोग विशेषज्ञ, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कालाढूंगी (नैनीताल) से स्थानांतरित
दोनों को तत्काल प्रभाव से चौखुटिया में कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए गए थे।
लेकिन जब ये दोनों चिकित्सक समय पर नहीं पहुंचे, तो 23 अक्टूबर 2025 को अल्मोड़ा से दो नए डॉक्टरों की तैनाती का आदेश जारी हुआ
1.डॉ. मनीष पंत, बाल रोग विशेषज्ञ, जिला चिकित्सालय अल्मोड़ा
2.डॉ. कृति भण्डारी, स्त्री रोग विशेषज्ञ, जिला चिकित्सालय अल्मोड़ा
फिर जब कल देहरादून के लिए पदयात्रा निकली, तो आनन फानन में चौखुटिया में कार्यभार डॉ. पल्लवी शाह और डॉ. हेमलता ने ग्रहण किया।
और अब 25 अक्टूबर 2025 को नया आदेश जारी हुआ है, जिसमें 23 अक्टूबर वाला आदेश निरस्त कर दिया गया है।
तीन आदेश, छह नाम और लगातार बदलती सूचनाओं ने चौखुटिया के स्वास्थ्य केंद्र को प्रशासनिक भ्रम का केंद्र बना दिया है।
इस बीच जो लोग इस विषय पर सवाल उठा रहे हैं और जवाब मांग रहे हैं, उन्हें भाजपा नेताओं द्वारा ‘वामपंथी’ कहकर निशाना बनाया जा रहा है।
कौन से आदेश को मानें, और कौन-से चिकित्सक वास्तव में तैनात हैं?
@pushkardhami@drdhansinghuk
#Uttarakhand #OperationSwasthya
चौखटिया में रामगंगा नदी के किनारे जल सत्याग्रह के बाद उमड़े जनसैलाब की बुलंद आवाज सुन लीजिए ‘सरकार’
इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारों से गूंज उठा अल्मोड़ा जिले का ये शहर। मुद्दा मात्र स्वास्थ्य समेत तमाम बुनियादी सुविधाओ के अभाव का है।
@pushkardhami@drdhansinghuk@BJP4India
अल्मोड़ा के एक छोटे से नगर चौखुटिया से पब्लिक ने “हेल्थ ज़िहाद” छेड़ दिया है, जो सरकार के तमाम “जिहादों” पर भारी पड़ने वाला है। अगर बाक़ी क्षेत्र के लोगो ने चौखुटिया वालों की तरह हिम्मत दिखाई तो स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांति आकर रहेगी।
@pushkardhami@JPNadda@drdhansinghuk
उत्तराखंड मंत्री सुबोध उनियाल का दावा वे "बिहारियों की औलाद" है ! 😡
ऋषिकेश मेयर चुनाव में शंभु पासवान जी की रैली में मंत्री सुबोध उनियाल जी ने दावा किया कि वे "बिहारियों की औलाद" हैं।
आइए, उनके दावे की पड़ताल करें। उनियाल जी ने कहा कि 600 साल पहले उनके पूर्वज बिहार से उत्तराखंड आए। लेकिन सवाल उठता है: अगर उनके पूर्वज बिहार से आए, तो उन्होंने अपनी बिहारी जाती/उपनाम क्यों छुपाया ?
"उनियाल" उपनाम क्यों अपनाया ? जबकि उनियाल उपनाम पहाड़ में उनके पैतृक गांव ऊनी के नाम पर है। उपनाम व्यक्ति की जाति या मूल स्थान को दर्शाता है। दूसरा, अगर 600 साल पहले 2 लोग बिहार से उत्तराखंड आए भी तो उन्होंने स्थानीय लोगों से वैवाहिक संबंध बनाए । उनकी संतानें भी पहाड़ी मूल के लोगों से ब्याही । 30 पीढ़ियों बाद भी क्या उनका DNA विशुद्ध बिहारी रह सकता है? उदाहरण के लिए, एक अंग्रेज और भारतीय महिला की संतान को "एंग्लो-इंडियन" कहा जाता है, ना कि अंग्रेज।क्योंकि एक पीढ़ी में ही DNA मिश्रित हो जाता है। तो, क्या 600 साल बाद भी सुबोध उनियाल का DNA बिहारी ही है, बिना पहाड़ी प्रभाव के?उनियाल का यह बयान न केवल आश्चर्यजनक है, बल्कि वैज्ञानिक और सामाजिक तर्कों से भी टकराता है। उन्हें 600 साल बाद अपने को बिहार से जोड़ने की जरूरत क्यों पढ़ रही है? क्या वे पहाड़ को हीन समझते हैं?
🖋️इस मुद्दे पर आपकी क्या राय है?
राज्य गठन के 25 साल बाद भी अगर 85 वर्ष के श्री बच्चे सिंह और आम नागरिकों को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पिछले पांच दिन से अल्मोड़ा के चौखुटिया में हड़ताल पर बैठने पड़े, तो धिक्कार है ऐसे सिस्टम पर। पब्लिक का कहना है कि बच्चों को बुखार का इलाज नहीं मिलता, गर्भवती महिलाओं का स्वास्थ्य प्रशिक्षण नहीं होता और छोटी मोटी बीमारियों के लिए रेफर किया जाता है। ट्रोल आर्मी को कहना चाहूंगा कि अपने आकाओं को असलियत बताओ जो आज के टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी है, मुझे ज्ञान मत पेलो की फलां फलां विकास पुरुष ये कर रहा है, ये हो रहा है।
#उत्तराखंड
#Uttarakhand
@pushkardhami
एक हारे हुए विधायक को CM बना दिया जाता है।
और वो CM, अपनी छवि चमकाने के लिए पानी की तरह रुपये बहाता है।
उत्तराखंड एक छोटा सा राज्य है, लेकिन उसके CM ने अपनी महापुरुष की छवि बनाने के लिए 1000 करोड़ रुपये विज्ञापन पर फूंक डाले।
विज्ञापन का बड़ा हिस्सा गोदी मीडिया की जेब में डाला गया। ताकि वो दिन रात CM Pushkar Singh Dhami जी का महिमामंडन कर सके।
जबकि इसी राज्य की जनता बदहाल स्कूल, और खराब स्वास्थ्य व्यवस्था से जूझ रही है। लेकिन CM उत्तराखंड को कागजों में चमकाने में लगे हुए हैं।
पहाड़ी समुदाय को आरक्षण से वंचित रखने का षड्यंत्र।
देश में प्रत्येक 10 वर्षों में जनगणना आयोजित की जाती है, जिसके आधार पर सभी समुदायों की सामाजिक, आर्थिक प्रगति और सत्ता में उनके प्रतिनिधित्व का मूल्यांकन किया जाता है। सवाल यह है कि जब देश के सभी हिमालयी राज्यों के मूल निवासियों को राज्य के शासन में प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए आरक्षण प्राप्त है, तो गढ़वाली-कुमाऊँनी समुदाय के साथ ऐसा क्यों नहीं हुआ ? केंद्र सरकार द्वारा इन समुदायों को जनजातीय दर्जा देने की पहल भी हुई थी। हालांकि, कुछ पहाड़ी नेताओं ने अपनी राष्ट्रीय राजनीति के स्वार्थ में इस पहल को विफल कर दिया। इसके विपरीत, जौनसारी और भोटिया समुदायों के नेताओं ने कुशल नेतृत्व के बल पर अपने समुदायों को जनजाति दर्जा दिलवा दिया । 90 के दशक में गढ़वाली-कुमाऊँनी खस समुदाय को केंद्र सरकार द्वारा "केंद्रीय ओबीसी" आरक्षण देने की पहल भी शुरू हुई, लेकिन उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इस बात की पुष्टि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जी अपने कई साक्षात्कार में कर चुके हैं।
सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर गढ़वाली-कुमाऊँनी समुदाय को मिलने वाला आरक्षण भी उत्तरप्रदेश की सरकार ने 1995 में समाप्त कर दिया गया।
अति पिछड़ा आयोग (OBC आयोग) ने सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर कई समुदायों को आरक्षण प्रदान किया, लेकिन गढ़वाली-कुमाऊँनी समुदाय इससे वंचित क्यों रहे ? इसका मुख्य कारण यह है कि सरकार ने इन समुदायों को उनकी विशिष्ट "खस जनजाति" की संस्कृति के रूप में मान्यता नहीं दी। इसके बजाय, इन्हें बाहर से आए ब्राह्मण और राजपूत समुदायों के रूप में वर्गीकृत किया गया। परिणामस्वरूप, जातिगत जनगणना में गढ़वाली-कुमाऊँनी समुदाय को उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्रों के ब्राह्मण और राजपूत समुदायों के साथ जोड़ दिया जाता है। चूँकि मैदानी क्षेत्रों के ब्राह्मण राजपूत जाती की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, इसलिए गढ़वाली-कुमाऊँनी समुदाय को भी उसी श्रेणी में मानकर आरक्षण से वंचित रखा जाता है। जब उत्तराखंड में Tribe Status का मुद्दा उठ रहा है तो उसे दाबने के लिए मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल, मंत्री सुबोध उनियाल आदि कई नेता यह झूठा दावा कर रहे हैं कि कोई भी पहाड़ का मूलनिवासी नहीं है सभी पहाड़ी बिहारी, बंगाली, राजस्थानी लोगों की औलादें है।
समाधान- आरक्षण प्राप्त करने का एकमात्र उपाय यह है कि गढ़वाली-कुमाऊँनी समुदाय अपनी विशिष्ट "खस जनजाति" पहचान को स्वीकार कर सरकार के समक्ष अपनी माँग रखें। उत्तराखंड में जौनसारी और हिमाचल प्रदेश के हाटी आदि कई समुदायों ने अपनी "खस" पहचान के आधार पर जनजातीय दर्जा प्राप्त किया है। गढ़वाली-कुमाऊँनी समुदाय को भी अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान को मजबूती से प्रस्तुत कर सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना होगा।
पेपर लीक प्रकरण पर हल्द्वानी में चल रहे आमरण अनशन का आज चौथा दिन है।
कल जगह-जगह हल्द्वानी में घूमकर लोगों को इसके बारे में जागरूक किया गया और फूल बाँटे गए।
#UKSSSCPaperLeak