Thank you for highlighting PhoolDei sir. 🌸The song in your post was created by us, Pandavaas.
We organise the Kaphal Festival celebrating the Chaitra New Year -a zero single-use plastic community festival.
Would be honoured if you consider sponsoring this grassroots celebration.
सुल्तानपुर में प्राथमिक विद्यालय के टीचर अरुण प्रजापति सर बच्चों को फ्री में कोचिंग पढ़ाते हैं। इस कोचिंग में नवोदय, एकीकृत परीक्षाओं के इतर सरकारी स्कॉलरशिप के लिए भी तैयारी करवाते हैं। दूर-दूर से छोटे-छोटे बच्चे पढ़ने आते हैं। मैंने पिछले दिनों इनके कोचिंग से एक डिटेल्ड ग्राउंड रिपोर्ट की थी।
आज अरुण जी बता रहे थे कि 10 बच्चों का सिलेक्शन श्रेष्ठा परीक्षा में हो गया है। इसका मतलब 9 से 12 तक की पढ़ाई वह देश के किसी भी अच्छे सीबीएसई स्कूल से कर पाएंगे। ये वो बच्चे हैं जो प्राइमरी स्कूल में पढ़ते थे, क्योंकि परिवारिक बैकग्राउंड बेहद कमजोर है।
अरुण जी एक बात कहते हैं, जीवन से बहुत संतुष्ट हूं, अब जब कोई बच्चा कहीं सिलेक्शन पाता है और वह खुशी से बताता है तो लगता है कि जीवन धन्य हो गया।
'गुगली' (प्रेम कहानी ) 🌸❤️🌼
मैं संगम पर गंगा किनारे आहाना के इंतजार में रेत पर बैठा था। दिन ढलने वाला था, सूरज अपने क्षितिज पर पहुँच चुका था; सूरज की लाल किरणें गंगा को लालिमामय बना रही थी। प्रवासी पक्षी गंगा में कभी डूबकी लगा रहें थे तो कभी ऊपरी सतह को छू कर उड़ जाते थे, मानो वो गंगा से लुका छुपी का 'खेल' खेल रहे हों ! गंगा के इस वातावरण में पक्षियों का चहचहाना मानो एक अलग ही मधुर संगीत उत्पन्न कर रहा हो। कुछ लोग गंगा - यमुना में नाव पर बैठकर बोटिंग का आनंद ले रहे थे और कुछ लोग आस पास बैठे हुए थे। थोड़ी दूर पर अकबर के किले के पास लेटे हुए हनुमान जी का मंदिर था, जिस पर राम भक्ति के गाने चल रहे थे; जो यहां तक सुनाई दे रहा था। इतना सुन्दर दृश्य था कि मैं उसमें खो गया था , अचानक पीछे से किसी ने आकर अपने हाथों से मेरी आंखों को ढक लिया। मैनें कुछ सेकंड का समय लिया और बोला - आहाना पास में बैठो।
वह बैठते हुए बोली...
आहाना - तुम मुझे पहचान कैसे जाते हो ?
मैं - तुम्हारे बालों की खुशबू ही काफी है तुम्हें पहचानने के लिए !
उस दिन उसने सफेद रंग का सलवार - सूट पहना था और लाल रंग का ओढ़नी लिए हुए थी ; जिसमें वह बहुत खूबसूरत लग रही थी। वो बगल में बैठ गयी और बैठते ही बोलना शुरू कर दिया। वो न जाने क्या - क्या कह रही थी और मैं शांति से उसकी बातें सुन रहा था। अचानक मेरी नज़र उसके इयररिंग पर पड़ी , जो सूरज की किरण पड़ने से चमक रही थी और वह उसे और भी खूबसूरत बना रही थी। उसे देख कर याद आया कि यह इयररिंग तो मैंने ही उसे दिया था। मैं उसे निहार ही रहा था कि वह एकाएक चुप हो गयी और वह मेरी तरफ देखने लगी ; और बोली -
आहाना - क्या हुआ ? कहाँ खोये हुए हो ?
मैं - कहीं तो नहीं!
आहाना - सच बोलो!
मैं - सच में कहीं नहीं ...
वह बात बदलते हुए बोली ..
आहाना - अच्छा चलो ,नाव पर बैठ कर घूमते है
मैं - अच्छा चलो !
मैं और आहाना एक नाव वाले काका के पास गये
मैं - काका नाव ले चलोगे ?
काका - हाँ बेटवा
मैं - कितना लोगे ?
काका - आधे घंटे का 150 रूपया
मैं - क्या काका ? कुछ कम नही होगा !
काका - ठीक है , 140 दे देना
हम दोनों नाव में बैठ गये , काका नाव को गंगा यमुना के संगम की ओर ले चले।
आहाना ने प्रवासी पक्षियों को खिलाने के लिए नमकीन लिया था। वह नमकीन को हाथ में लेकर हाथ थोड़ा ऊपर करती तो ढेर सारे प्रवासी पक्षी उसके हाथों पर इकट्ठा हो जाते। वह उसे देख कर बहुत खुश हो रही थी। उसने धीरे से बोला - सुनो , मेरी फोटो निकालो इन पक्षियों के साथ। मैं भी उसके अलग अलग पोज के साथ तस्वीरें निकालने लगा।
कुछ देर में हम संगम पर पहुँच गये।
आहाना ने काका से पूछा ..
आहाना - काका, ये दोनों नदियों के पानी आपस में मिलते क्यों नहीं ?
काका- बेटी, इ सब भगवान का माया है!
आहाना ने थोड़ा सा पानी मेरे ऊपर फेंक दिया 9/n
और जोर से हँसने लगी। मैनें भी पानी फेंका तो वो मुंह बनाकर बोली
देखो ,मुझे गीला मत करो , मुझे घर भी जाना है !
अंधेरा हो रहा था तो हम लोग जल्द ही किनारे पर आ गये। उस समय गंगा आरती भी शुरू हो गयी थी ,तो आहाना ने कहा - चलो आरती करके तब चलतें हैं।
हम आरती स्थल पर पहुँचे, उसने आँखे बंद कर ली और आरती खत्म होने के बाद ही खोला ; मानो वो गंगा माँ से कोई बहुत बडी मन्नत मांग रही हो। उसके बाद उसका चेहरा कुछ उदास - सा दिख रहा था
आरती खत्म हुई , हम लोग वापस आने लगे तो मैंने ही कहा, चलो लगे हाथ हनुमान जी के भी दर्शन कर लेते हैं।
हम दोनों ने हनुमान जी के दर्शन किये। उसने प्रसाद में से एक लड्डू निकाला ; आधा मुझे दिया और आधा खुद खाया।
आहाना - अंधेरा बहुत हो रहा है, चलो चलते हैं।
हम परेड ग्राउंड ही पहुचे थे कि उसने कहा -
आहाना - सुनो!
मैं - हाँ
आहाना - रूको तो सही, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है !
मैं रूक गया
आहाना - मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं तुमसे कैसे कहूँ ?
मैं - क्या हुआ ?
आहाना - मुझे पढने दिल्ली जाना है ..
मैं - तो जाओ , मैं कहाँ तुम्हें रोक रहा हूँ ...
आहाना - मैं तुमसे अब कभी नहीं मिलूंगी और न ही तुमसे बात करूँगी !
मैं - पर क्यों ?
आहाना - बस ऐसे ही...
मैं - पर मैंने किया क्या ? मुझसे क्यों नहीं बात करना चाहती हो ?
आहाना - तुमने कुछ नही किया है, मैं अब बात नहीं करना चाहती बस !
बाय ......
- दीपक चौधरी
#lokpanktiyan #story #lovestory #hindistory #sahitya #lekhakchaupal #लोकपंक्तियाँ #urdustory
सु्ल्तानपुर जिले के अरुण कुमार प्रजापति जूनियर हाई स्कूल में टीचर हैं। 2022 में जिले से 29 बच्चों का सिलेक्शन राष्ट्रीय आय एवं योग्यता आधारित छात्रवृत्ति परीक्षा में सिलेक्शन हुआ। इसमें 8 अरुण सर के स्कूल के थे। इस परीक्षा को पास करने वाले सरकारी स्कूल के बच्चों को 9वीं से लेकर 12वीं तक सलाना 12 हजार रुपए की स्कॉलरशिप मिलती है। बच्चे खुश हुए। इस खुशी को देखकर अरुण सर को लगा कि क्यों न और बच्चों को ऐसी छात्रवृत्ति दिलवाकर खुश किया जाए।
अरुण सर ने कोचिंग खोल ली। एकदम फ्री। खुद के पैसे से किताब-कॉपी अरेंज किया। देखते ही देखते बच्चों की भरमार हो गई। ये वो बच्चे थे जो जीवन में कुछ करना चाहते थे लेकिन कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते कुछ कर नहीं पा रहे थे। 8-10 किलोमीटर दूर से आने लगे। अरुण सर ने पढ़ाना शुरू किया। एक के बाद एक सिलेक्शन, अलग-अलग स्कॉलरशिप प्रोग्राम में सैकड़ों बच्चों का सिलेक्शन हो गया।
अरुण सर से हमने पूछा कहां से मैनेज करते हैं सर? अरुण सर बोले, एक लाख सैलरी है। घर में तीन बच्चे हैं। बड़ा वाला ताइवान में है, छोटा वाला लखनऊ में यूपीएससी की तैयारी कर रहा। बिटिया भी 12वीं करके भाई के पास पढ़ने जाना चाहती है। इन्हीं में खर्चा है, बाकी तो सब बचता है, उसी से सब हो जाता है। आज यह करके खुश हूं। शायद मुझसे ज्यादा कोई खुश नहीं होगा।
अरुण सर की यह बातें सुनकर हम तो धन्य हो गए। बच्चो से बात की। किसी के पिता नहीं तो किसी के यहां पैसा नहीं। सब सरकारी स्कूल के बच्चे। कभी कहीं कोचिंग नहीं कर पाए। यहां एक अवसर मिला और आज चमक रहे।
दैनिक भास्कर पर आप पूरी स्टोरी देख व पढ़ सकते हैंः https://t.co/KGCVOCAZq5