भारत के स्टूडेंट्स प्रोटेस्ट पर अंतराष्ट्रीय अखबारों की सुर्ख़ियाँ
दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए छात्र आंदोलन की गूंज विदेशी मीडिया तक पहुंची है। न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्डियन, बीबीसी समेत कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने इसे प्रमुखता से कवर किया है।
सोमवार को CJP ने जंतर-मंतर से संसद तक मार्च निकाला। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई, आंसू गैस के गोले छोड़े गए और पथराव भी हुआ। दोनों पक्षों के कई लोग घायल हुए।
1. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट
अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि खून बहा, लाठियां चलीं, आंसू गैस के गोले दागे गए, लेकिन प्रदर्शनकारी पीछे नहीं हटे। संसद मार्च के अगले ही दिन हजारों छात्र फिर जंतर-मंतर पहुंच गए और सरकार से जवाब मांगने लगे।
अखबार के मुताबिक, छात्र शिक्षा व्यवस्था और भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार अब भी उनकी मांगों पर चुप है।
रिपोर्ट में आंदोलनकारी संगठनों के हवाले से 150 प्रदर्शनकारियों के घायल होने का दावा किया गया है। वहीं, दिल्ली पुलिस का कहना है कि 118 पुलिसकर्मी घायल हुए और करीब 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया।
2. ‘ द गार्डियन ‘ ब्रिटिश अखबार की रिपोर्ट
ब्रिटेन के अखबार गार्डियन ने लिखा कि पुलिस की कार्रवाई भी छात्र आंदोलन को रोक नहीं सकी। सोमवार की झड़प के अगले दिन हजारों प्रदर्शनकारी फिर जंतर-मंतर पहुंच गए और साफ कर दिया कि वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
अखबार ने लिखा कि आंदोलन अब सिर्फ शिक्षा सुधार की मांग तक सीमित नहीं रहा। बड़ी संख्या में युवा सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए भी सड़कों पर उतर रहे हैं। वहीं, पुलिस का कहना है कि उसने हालात को काबू में रखने के लिए कार्रवाई की।
3. फाइनेंशियल टाइम्स: ब्रिटिश अखबार
ब्रिटेन के अखबार फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी लीड रिपोर्ट में लिखा कि छात्र आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई के विरोध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास तक मार्च कर रहे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। दोनों को बाद में रिहा कर दिया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक, कांग्रेस नेताओं ने सोमवार को छात्र आंदोलन पर हुई लाठीचार्ज और आंसू गैस की कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन किया। राहुल गांधी ने X पर लिखा, "मोदी जी, जितना दबाव बनाना है बना लीजिए, लेकिन छात्रों के न्याय की लड़ाई अब रुकने वाली नहीं है।
फाइनेंशियल टाइम्स ने लिखा कि सरकार की ओर से बातचीत के लिए पहुंचे एक मंत्री ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग खारिज कर दी। उनका कहना था कि राहुल गांधी का यह रुख लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुरूप नहीं है।
4. अल जजीरा की रिपोर्ट
कतर के न्यूज चैनल अल जजीरा ने लिखा कि छात्र आंदोलन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं, विपक्ष के नेता राहुल गांधी खुलकर प्रदर्शनकारियों के समर्थन में उतर आए।
अल जजीरा ने एक्सपर्ट्स के हवाले से लिखा कि यह आंदोलन अब सिर्फ शिक्षा सुधार का मुद्दा नहीं रह गया है। इसने सरकार की जवाबदेही और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका पर नई बहस छेड़ दी है।
5. BBC की रिपोर्ट
ब्रिटेन के टीवी BBC ने लिखा कि पुलिस कार्रवाई में महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया। कई प्रदर्शनकारियों ने BBC को बताया कि लाठीचार्ज के दौरान महिलाओं के साथ भी सख्ती की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस कार्रवाई के अगले दिन भी हजारों प्रदर्शनकारी फिर जंतर-मंतर पहुंचे और आंदोलन जारी रखा। पुलिस ने प्रदर्शन स्थल पर बना मंच और अस्थायी टेंट भी हटा दिए।"
BBC ने राहुल गांधी के बयान का भी जिक्र किया। रिपोर्ट में कहा गया कि उन्होंने छात्रों की मांगों का समर्थन किया, सरकार से जवाब मांगा और कांग्रेस सांसदों के साथ प्रधानमंत्री आवास तक मार्च निकाला।"
6. ‘ डॉन ‘ : पाकिस्तानी अखबार की रिपोर्ट
पाकिस्तान के अखबार डॉन ने लिखा कि छात्र आंदोलन ने विपक्ष को मोदी सरकार पर हमला बोलने का नया मौका दे दिया है। पुलिस कार्रवाई के बाद लगभग सभी प्रमुख विपक्षी दल प्रदर्शनकारियों के समर्थन में उतर आए।
डॉन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि बड़ी संख्या में युवाओं के सड़कों पर उतरने और पुलिस कार्रवाई की तस्वीरें सामने आने के बाद आंदोलन को राजनीतिक समर्थन मिलने लगा। विश्लेषकों के हवाले से अखबार ने लिखा कि इससे विपक्ष को युवा वोटरों तक पहुंच बनाने का मौका मिल सकता है। हालांकि, इससे छात्रों के मूल मुद्दे राजनीतिक बहस में पीछे छूटने का खतरा भी है।
डॉन ने राहुल गांधी के बयान का भी जिक्र किया। रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने छात्रों की मांगों का समर्थन करते हुए शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की....!!
जब भी देश आर्थिक दबाव, महंगाई, बेरोज़गारी और संकटों से जूझता है, तब सबसे पहले जनता को त्याग का पाठ पढ़ाया जाता है... कम पेट्रोल इस्तेमाल करो… कम यात्रा करो… सोना मत खरीदो… खर्च कम करो… लेकिन कभी ये नहीं बताया जाता कि जनता आखिर कब तक अपनी जरूरतें काट-काटकर राष्ट्रभक्ति साबित करती रहे...??
देश का मध्यम वर्ग पहले ही टैक्स, महंगाई, बेरोज़गारी और महंगे इलाज शिक्षा के बोझ तले दबा हुआ है।
गरीब आदमी गैस सिलेंडर के दाम देखकर चूल्हे पर लौट रहा है, किसान डीज़ल और खाद के दाम से परेशान है, युवा नौकरी के लिए दर-दर भटक रहा है…
और ऊपर से राष्ट्रहित के नाम पर और त्याग करो का संदेश दिया जाता है।
अगर सच में देशहित सबसे ऊपर है,तो फिर सवाल सत्ता से भी पूछे जाएंगे
क्या सरकारी फिजूलखर्ची कम हुई...??
क्या चुनावी प्रचार पर करोड़ों का खर्च रुका...??
क्या बड़े उद्योगपतियों को मिलने वाली राहत और कर्ज माफी बंद हुई...??
क्या सांसदों-विधायकों की सुविधाओं में कटौती हुई...??
क्या जनता पर टैक्स का बोझ कम हुआ...??
राष्ट्रवाद सिर्फ जनता के लिए नियम नहीं होना चाहिए।
देश सिर्फ आम आदमी के त्याग से नहीं चलता,बल्कि सत्ता की जवाबदेही, ईमानदार नीतियों और बराबर की जिम्मेदारी से चलता है।
हर बार जनता से कहना कि
कम खाओ, कम घूमो, कम खर्च करो, कम जियो…
ये समाधान नहीं है।
समाधान है ऐसी व्यवस्था बनाना जहां नागरिक सम्मान और राहत के साथ जी सके।
देशभक्ति का मतलब आंख बंद करके हर अपील पर ताली बजाना नहीं,बल्कि सवाल पूछना भी है ,क्योंकि लोकतंत्र में जनता भक्त नहीं, मालिक होती है...!!
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सवर्ण समुदाय के बच्चों की सोच:-
IAS कैसे बनें..
PCS कैसे बनें..
TET कैसे पास हों..
CAT, MAT कैसे पास हों..
बैकिंग, रेलवे, मेडिकल, टेक्निकल में कैसे जाएं..
सवर्णों को आरक्षण मिलें..
OBC/SC/ST समुदाय के बच्चों की सोच:-
दुर्गा पंडाल कैसे बनें..
सरस्वती पूजा के लिए डीजे कैसे हो..
पंडित कहाँ से बुलाएं..
रावण कहाँ जलाएं..
अखंड संस्कृतण राम नाम जाप कैसे हो..
रामनवमी के अवसर पर जलूस कैसे निकलें..
पर्व-त्योहार कैसे धूमधाम से हो..
एक साजिश के तहत आप मानसिक और धार्मिक गुलाम बने थेे, लेकिन जब अब आप आर्थिक तंगी से थोड़ा बहुत उबरे हैं तो आप पूजा-पंडाल में लग गए..
अपने समुदाय के बच्चों को कहिये इन सब चीज़ों से दूर रहने के लिए..
आप भगवान में आस्था रखते है या नहीं रखते हैं ये अलग मैटर है, (आप भगवान को मानते हैं या नहीं मानते हैं इससे भगवान को फर्क नहीं पड़ता है) लेकिन आप धर्मान्ध हैं ये आपके लिए घातक है.. पूजा पाठ अपने घर तक ही सीमित रखें..
इन पैसों को अपने शिक्षा, स्वास्थ्य, पौष्टिक भोजन पर खर्च करें..
इन पैसों से अपने समुदाय में लाइब्रेरी का निर्माण कराए, उसमे पुस्तके रखवाए और शिक्षित बने..
शिक्षा ही आपको सवाल पूछने को प्रेरित करता है,
खूब पढिये खूब बढिए..
समाज और देश की प्रगति का हिस्सा तभी बना जा सकता है जब आप शिक्षित बनेंगे, और शिक्षित बनकर सही सवाल पूछकर ही आप राष्ट्र के सफल नागरिक बन पाएंगे..
तभी आप अपने कर्तव्यों और अधिकारों का मूल्य समझेंगे..
संविधान की किताब तो जरूर पढिये,
इस देश मे नागरिक होने के लिए बहुत जरूरी है ये किताब..
वरना भक्त बनने के लिए किसी ज्ञान की नहीं बस लाल,भगवे, हरे, नीले झण्डों और झुण्ड की आवश्यकता होती है जो आपकी जिंदगी झंड बना सकती है..
बागेश्वर बाबा उर्फ़ धीरेंद्र शास्त्री ने महाराष्ट्र की अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की चुनौती को स्वीकार कर लिया है। उन्होंने कहा है कि “कोई भी ‘खुजली’ हो, दरबार लगना है, आ जाइए। हमारे पास जो विद्या होगी और जो शक्ति होगी, हम उसका प्रस्तुतिकरण करेंगे। हम जादूगर नहीं हैं। हमें जो ईश्वर प्रेरणा देगा, हम उसी के अनुसार लोगों का मार्गदर्शन करेंगे।”
अंध श्रद्धा उन्मूलन समिति के संस्थापक एवं राष्ट्रीय समन्वयक प्रो. श्याम मानव ने उन्हें खुली चुनौती दी है कि अगर वे अपने चमत्कार सिद्ध कर देंगे तो उन्हें अस्सी लाख रुपए इनाम दिए जाएंगे। इस परीक्षा के लिए उन्होंने कुछ शर्तें तय की हैं।
उनके मुताबिक बाबा को अपने “दिव्य शक्ति” या “मन पढ़ने/चमत्कार” के दावे साबित करने हैं। इसके लिए उन्हें 10 ऐसे अजनबियों (जिनसे बाबा कभी मिले नहीं) के नाम, पिता का नाम, उम्र और मोबाइल नंबर सटीक बताने होंगे। साथ ही एक बंद कमरे में रखी 10 वस्तुओं की पहचान करनी होगी।
शर्त ये है कि उनके उत्तर कम से कम 90% सटीक होने चाहिए और ये परीक्षा नागपुर में, पत्रकारों- मीडिया की मौजूदगी में होगी। अगर वे परीक्षा में सफल हो गए तो 80 लाख रुपये इनाम दिए जाएंगे। (2023 में यह 30 लाख था)। अगर वे असफल हुए तो इसे “जन भावनाओं का शोषण” माना जाएगा।
बागेश्वर बाबा ने चुनौती तो स्वीकार कर ली है मगर वे पत्रकारों के सामने परीक्षा देने को तैयार नहीं हैं। वे अपने दिव्य दरबार में परीक्षा देना चाहते हैं जहाँ कोई ये नहीं जाँच सकता कि वे कोई धोखाधड़ी तो नहीं कर रहे।
ओडिशा के एक गरीब आदिवासी जीतू मुंडा को अपनी बहन कालरा मुंडा के बैंक खाते से सिर्फ 19,300 रुपये निकालने थे। बैंक ने कहा - खाताधारक को लाओ या डेथ सर्टिफिकेट और कानूनी वारिस का प्रमाण दो।
गरीबी, लाचारी और व्यवस्था की बेरुख़ी ने जीतू को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर किया कि उसने बहन की कब्र खोदी, कंकाल को बोरी में भरा और 5 किलोमीटर कंधे पर लादकर बैंक पहुंच गया।
यह तस्वीर “विश्वगुरु” और “बड़ी अर्थव्यवस्था” के दावों के पीछे छिपे असली भारत की है - जहाँ गरीब आज भी सम्मान नहीं, सिर्फ अपमान पाता है।
BJP और RSS ने पाखंडियों की ऐसी फौज खड़ी कर दी है, जो जनता को असली मुद्दों से भटकाकर धर्म, जनसंख्या और नफ़रत की राजनीति परोस रही है।
एक तरफ 80 करोड़ से ज़्यादा लोग मुफ्त राशन पर जीने को मजबूर हैं, दूसरी तरफ शिक्षा इतनी महंगी कर दी गई है कि आम आदमी अपने एक बच्चे का भविष्य भी न सँवार सके। और ये उपदेश दे रहे हैं कि चार बच्चे पैदा करो, यहाँ तक कि एक बच्चा RSS को समर्पित कर दो।
अशिक्षित, बेरोज़गार और भटकी हुई भीड़ ही इनके लिए सबसे बड़ा हथियार है - जो सवाल न पूछे, सिर्फ झंडा उठाए और जयकारे लगाए। देश को जागरूक नागरिक चाहिए, अंधभक्त नहीं।
आज भारत एक ऐसा बाजार बन गया है, जहां हर चीज बिक रही है। देश बिक रहा है, सरकार बिक रही है, सांसद और विधायक बिक रहे हैं, नदियां और पहाड़ बिक रहे हैं, जंगल और खदान बिक रहे हैं, बालू बिक रहा है, कृषि भूमि बिक रही हैं, नौकरशाह बिक रहे हैं, पुलिस बिक रही है, इंसानियत और जमीर बिक रही है, पुरुष बिक रहा है, महिलाएं बिक रही हैं, बेटा बिक रहा है, बेटी बिक रही है, इज्जत बिक रही है, देश की संपत्ति, संपदा और प्राकृतिक संसाधन बिक रहे हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा बिक रहे हैं, कल-कारखाने, कंपनियां, निगम और सार्वजनिक लोक-उपक्रम बिक रहे हैं, बंदरगाह, रेलवे और रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, राष्ट्रीय राजमार्ग, हाईवे और एक्सप्रेस वे बिक रहे हैं और राष्ट्र की अस्मिता, अस्तित्व, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता तथा स्वाभिमान और पहचान बिक रहे हैं। और, इन सबके बदले मिला क्या? वही क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति, मुट्ठीभर लोगों के लिए बेहतर और आरामदायक जीवन, नेताओं, नौकरशाहों और पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों तथा उच्चमध्यम वर्ग की तिजोरी भर रही है, अपराध बढ़ रहे हैं, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, आवारा पूंजी और आवारा पूंजीवाद बढ़ रहा है और देश का अपराधीकरण, बाजारीकरण, अमानवीयकरण, और लंपटीकरण हो रहा है। यही आज के भारत के विकास का माडल है...!!
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सबसे पहले नाम समझिए...
लनारी शक्ति वंदन अधिनियम यानी महिला आरक्षण कानून।
लेकिन असली कहानी नाम से नहीं, उसके लागू होने की शर्तों से शुरू होती है।
जब 2023 में यह बिल संसद में पास हुआ, तो किसी ने विरोध नहीं किया। लोकसभा में भारी बहुमत (454-2) और राज्यसभा में सर्वसम्मति यानी पूरे राजनीतिक सिस्टम ने इसे स्वीकार किया। उस समय भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और बाकी दल सब एक लाइन में थे।
तो फिर सवाल उठता है: जो बिल पास हो चुका था, वो आज तक लागू क्यों नहीं हुआ?
यहीं से असली राजनीति शुरू होती है...
कानून में एक छोटी सी शर्त जोड़ दी गई पहले जनगणना होगी, फिर परिसीमन (Delimitation) होगा, और उसके बाद ही महिला आरक्षण लागू होगा।
मतलब: कोई तय समय नहीं, कोई डेडलाइन नहीं।
यानी कागज पर अधिकार, जमीन पर इंतज़ार।
अब 2026 में जो नया संशोधन लाया गया, उसने खेल को और साफ कर दिया।
इसमें सीधे तौर पर सीटें बढ़ाने (543 से कहीं ज्यादा) और उसी के साथ महिला आरक्षण लागू करने की बात की गई।
अब यहां सबसे बड़ा सवाल वही है जो ध्रुव राठी ने उठाया...
अगर आप सच में महिलाओं को 33% आरक्षण देना चाहते हैं, तो मौजूदा 543 सीटों पर ही क्यों नहीं देते?
इस सवाल का जवाब ही पूरी कहानी खोल देता है।
अगर 543 सीटों पर तुरंत 33% आरक्षण लागू होता, तो लगभग 180 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जातीं।
इसका मतलब मौजूदा सांसदों को अपनी सीट छोड़नी पड़ती।
और यहीं से कुर्सी बनाम सशक्तिकरण का टकराव शुरू होता है।
तो समाधान क्या निकाला गया?
सीधे लागू करने के बजाय कहा गया पहले सीटें बढ़ाओ।
नई सीटें जोड़ो, और उन्हीं में महिलाओं को जगह दो।
परिणाम? पुराने सांसद सुरक्षित, नई राजनीति तैयार।
यानी महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलेगा but without disturbing existing power structure.
अब दूसरा, और ज्यादा गंभीर पहलू: परिसीमन (Delimitation)
परिसीमन का मतलब है देश के चुनावी नक्शे को फिर से बनाना।
कौन सा इलाका किस सीट में आएगा, किस राज्य में कितनी सीटें होंगीbसब बदल सकता है।
यहीं पर gerrymandering का डर आता है यानि सीमाएं इस तरह तय करना कि किसी खास पार्टी को फायदा हो।
उदाहरणों की बात करें तो असम और जम्मू और कश्मीर में परिसीमन को लेकर पहले भी राजनीतिक फायदे के आरोप लग चुके हैं।
तो जब महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ दिया जाता है, तो सवाल सिर्फ महिलाओं के अधिकार का नहीं रहता
वो बन जाता है “चुनावी नक्शा बदलने की ताकत” का सवाल।
अब 17 अप्रैल 2026 की घटना देखिए
संशोधन बिल लोकसभा में पास नहीं हो पाया क्योंकि 2/3 बहुमत नहीं मिला (लगभग 298 पक्ष में, 230 विरोध में)।
इसके बाद नैरेटिव सेट होना शुरू हुआ विपक्ष ने महिला आरक्षण रोक दिया।
लेकिन हकीकत इससे ज्यादा जटिल है, विपक्ष का तर्क साफ था,पहले से पास कानून को लागू करो, नई शर्तों और सीट बढ़ाने के खेल में मत डालो।
तो पूरा मामला एक लाइन में क्या है? महिला आरक्षण 2023 में पास हुआ था लेकिन उसे लागू करने के लिए ऐसी शर्तें जोड़ दी गईं, जो उसे टालती रहती हैं।
2026 में जो बिल लाया गया, वो सीधे लागू करने के बजाय
सीट बढ़ाने + परिसीमन + राजनीतिक गणित का पैकेज था। और यही वजह है कि यह सिर्फ महिला सशक्तिकरण का मुद्दा नहीं रह गया यह बन गया है,
कुर्सी बचाने vs प्रतिनिधित्व देने की लड़ाई राजनीतिक इंजीनियरिंग vs सामाजिक न्याय की बहस आखिरी सवाल, जो अभी भी जवाब मांगता है,
अगर इरादा साफ है तो 543 सीटों पर ही 33% आरक्षण लागू करने में दिक्कत क्या है?
जब तक इस सवाल का सीधा जवाब नहीं आता,
तब तक हर नारा चाहे कितना भी भावनात्मक क्यों न हो
सवालों के कटघरे में ही खड़ा रहेगा...!!
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चित्रा जी~ प्रियंका भारती जैसी महिलाएं संसद पहुंचे इसके लिए इसपर दिल खोलकर समर्थन करना चाहिए!
"चित्रा जी, हम तो चाहते है 50% हो। भाजपा कंगना और हेमा मालिनी को भेजती है, हम फूलन देवी, भगवती देवी, बहन मायावती जी जैसी सशक्त महिलाओं को भेजना चाहते है।
और ये तभी संभव होगा जब महिला आरक्षण में हम बहुजन महिलाओं को अलग से उसमें कोटा मिले।
मैं भारत का प्रधानमंत्री हूं। भारत मेरी निजी मिल्कियत है। भारत की संपत्ति, संपदा और प्राकृतिक संसाधन तथा तिजोरी मेरी है, और यह मेरा नैसर्गिक अधिकार है कि मैं अपनी संपत्ति और तिजोरी के धन का जैसा चाहूं, वैसा प्रयोग करूं। मुझसे हिसाब मांगने वाला है कौन? मैं देश का मालिक हूं और मालिक अपने खर्च का हिसाब किसी को भी नहीं देता। मैं जो चाहूं, वह कर सकता हूं। कौन मेरा क्या उखाड़ लेगा? किसकी यह औकात है कि मुझसे सवाल करे और हिसाब मांगे। मैं पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों को जितना चाहूं बैंकों से कर्ज दिलवा सकता हूं, उनके कर्ज माफ कर सकता हूं और ऊपर से सब्सिडी भी दे सकता हूं। मैं चाहूं तो भारत की कृषि भूमि, जंगलों, नदियों, पहाड़ों और खदानों, सरकारी लोक-उपक्रमों, कल-कारखानों, कंपनियों और निगमों, एयरपोर्ट, बंदरगाहों, राष्ट्रीय राजमार्गों, हाईवे और एक्सप्रेस वे, रेलवे स्टेशनों, तथा रेलवे और सैनिक छावनियों की बहुमूल्य जमीनों को पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के हाथों बेच दूं। मैं चाहूं तो देश के किसानों और मजदूरों को गुलाम बनाऊं या नवजवानों को बेरोजगार रखूं, इस संबंध में कौन है जो मुझसे सवाल करे? मैं शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का निजीकरण कर दूं और देश के बहुसंख्यक मेहनतकश अवाम को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा से वंचित कर दूं, कौन है रोकने वाला? मैं देश में सांप्रदायिक वैमनस्यता और तनाव फैलाऊं या दंगे करवाऊं, मणिपुर में आग लगवाऊं, चुनाव आयोग और ईवीएम की मदद से चुनाव जीतूं, ईडि, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग के माध्यम से किसी को मैं ब्लैकमेल करूं, अपने मन मुताबिक पैसे के बल पर राज्यों में सरकार बनवाऊं या किसी को संसद की सदस्यता से वंचित कर जेल भेजवाऊं, यह मेरा नैसर्गिक अधिकार है, और इस संबंध में किसी की दखलंदाजी मुझे मंजूर नहीं है। मैंने पीएम केयर्स फंड और एलेक्टोरल बांड जारी किए, उसमें आए पैसे का मैं उपभोग करता हूं। मैं किसी को क्यों बताऊं कि वे पैसे कहां से कैसे आए और कैसे और कहां पर खर्च होते हैं। मेरे व्यक्तिगत मामले में कोई न तो रोड़ा अटकाए और न ही हस्तक्षेप करे।मैं किसे भारत का नागरिक मानूं या न मानूं, यह मेरा अधिकार है। किसी को मतदाता सूची से या नागरिकता से वंचित कर दूं, यह मेरा नैसर्गिक अधिकार है, और इसमें किसी को भी हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। मैं विश्वगुरू हूं। मैं सर्वशक्तिमान, परमब्रह्म परमेश्वर और भारत भाग्यविधाता हूं। मैं ही ईश्वर का अवतार और ननवायोलोजिकल प्राणी हूं। मेरे ही कारण यह भारत देश है, हिन्दू धर्म है और हिन्दू राष्ट्र है। क्या समझे...???
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मोदी रंग में रंगा भारत....
हिन्दी भाषी राज्य या गोबर पट्टी भारत के वे इलाके हैं, जो अपनी मूर्खता, अज्ञानता, जड़ता, पाखंड, कूपमंडुकता, बौद्धिक दिवालियापन, मानसिक संकीर्णता और दिमागी बधियाकरण के कारण भारत में सबसे पिछड़े, सबसे गरीब, सबसे अशिक्षित, सबसे मूर्ख, सबसे अनपढ़, सबसे पाखंडी और सबसे अंधविश्वासी हैं, और जो गुजरात के पांचवीं कक्षा फेल मूर्ख प्रधानमंत्री और तड़ीपार गृहमंत्री के इशारे पर भावविभोर होकर धर्म और राष्ट्र की धुन पर नाच रहे हैं।
ये गोबर पट्टी के ही लोग हैं, जिन्होंने संघ, भाजपा और मोदी सरकार को बनाने और बचाने का टेका ले रखा है। मोदी जी इनके लिए ईश्वर के अवतार, महामानव, विश्वगुरु और ननवायोलोजिकल प्राणी हैं, जिनकी मर्जी के बिना किसी पेड़ का एक पत्ता भी नहीं हिलता। मोदी है तो मुमकिन है और हर हर मोदी घर घर मोदी का नारा लगाते हुए इनकी जय-जयकार कर रहे हैं।
इन्हें पूरा यकीन है कि अगर आज मोदी जी भारत के प्रधानमंत्री नहीं होता, तो भारत का अस्तित्व ही समाप्त हो गया होता। यह मोदी जी ही हैं, जिन्होंने अयोध्या में रामलला की मूर्ति की स्थापना कर रामराज्य की आधारशिला रखी। उन्हें पूरा विश्वास है कि मोदी जी भारत के सुनहरे अतीत की पुनर्वापसी करने में सफल होंगे और उसके साथ ही मनुस्मृति पर आधारित रामराज्य का सपना भी पूरा होगा। मोदी जी के व्यक्तित्व में लोग महान चंद्रगुप्त का अक्स देख रहे हैं और अमित शाह को चाणक्य की प्रतिमूर्ति समझ रहे हैं। उन्हें पूरा विश्वास है कि चंद्रगुप्त और चाणक्य मिलकर भारत को पुनः वही वैश्विक पहचान देने में सफल होंगे, जो कभी चंद्रगुप्त के समय था।
उनके लिए मोदी जी अकेला ऐसा व्यक्ति हैं, जो कालचक्र को भी पीछे मोड़ सकते हैं। वे हिन्दुओं, हिन्दू धर्म और हिन्दू राष्ट्र के उन्नायक हैं और भारत को हिन्दुओं के लिए सुरक्षित कर जाएंगे। इसके लिए भले ही देश से मुसलमानों, सिखों, जैनियों, बौद्धों, ईसाईयों और अन्य दूसरे धर्मावलंबियों को खत्म ही करना क्यों न पड़े।
भले ही उन्हें भूखों रहना पड़े, अभाव सहना पड़े, मूर्ख, अज्ञानी और जड़ रहना पड़े, बेरोजगार रहना पड़े, दंगे करने पड़े या भीख मांगकर जीना पड़े, वे मोदी जी के पीछे-पीछे चलते रहेंगे, उनकी मूर्खतापूर्ण बातों को भी वैदिक वाक्य मानेंगे, उनकी अज्ञानता को वैज्ञानिक सत्य मानेंगे, उनकी क्रुरता को ईश्वरीय दंड मानकर खुशी-खुशी शिरोधार्य करेंगे, उनके राजसी ठाट-बाट, आन-बान-शान, शानो-शौकत, भोग-विलास और ऐश्वर्यपूर्ण जीवन को हिन्दू धर्म और हिन्दू राष्ट्र के लिए आवश्यक मानेंगे, पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों के विकास और उनके हाथों में देश की संपत्ति, संपदा और प्राकृतिक संसाधनों को गिरवी रखने को भारत का विकास मानेंगे, मूर्खता को विश्वगुरु और विश्वशक्ति बनने का आधार मानेंगे और भारत को अमेरिका की गुलामी को भी दैवीय संयोग मानकर खुशी-खुशी मानकर स्वीकार कर लेंगे।
संविधान, लोकतंत्र, संसद, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं, मतदान का अधिकार, धर्मनिरपेक्षता, नागरिक अधिकार, संघीय व्यवस्था और वैज्ञानिक अनुसंधान और आविष्कार भांड़ में जाये, पर मोदी जी को जीवनपर्यंत भारत का प्रधानमंत्री बने रहना है। मोदी जी भारत के प्रधानमंत्री हैं, क्या यही भारतवासियों के लिए कम है?
देख लेना, एक दिन पूरी दुनिया मोदी जी की मुट्ठी में बंद होगी। मोदी जी सिर्फ विष्णु के ही अवतार नहीं है, बल्कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों त्रिमूर्तियों के अवतार हैं। वे निर्माण और विध्वंस दोनों हैं। वे सृष्टि के रचयिता हैं, संचालक हैं और संहारक भी हैं। धन्य भाग्य हमारे जो हमें अपने इस जीवन में मोदी जी जैसा अवतारी पुरुष देखने को मिल रहा है। भारत और भारतीय धन्य हो गये...!!
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Equality, Justice, Dignity, Rights… ये सिर्फ शब्द नहीं हैं, ये उस क्रांति की नींव हैं जिसे डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपने खून-पसीने से गढ़ा था।
आज वही लोग “समानता” की बात करते हैं, जिनकी सोच अब भी भेदभाव की जंजीरों में जकड़ी हुई है। न्याय का ढोंग करने वाले, सत्ता के सामने घुटने टेककर संविधान की आत्मा को कुचल रहे हैं। गरिमा की बात करने वाले, इंसान को उसकी जाति और हैसियत से तौलते हैं। और अधिकार की बातें सिर्फ भाषणों में सीमित रह गई हैं।
बाबा साहेब ने जो संविधान हमें दिया, वो सिर्फ किताब नहीं वो हर शोषित की आवाज है, हर दबे-कुचले इंसान की ताकत है। लेकिन आज उसी संविधान के साथ खिलवाड़ हो रहा है, और जनता को सिर्फ नारों में उलझाया जा रहा है।
सवाल साफ है क्या हम बाबा साहेब के दिखाए रास्ते पर चलेंगे, या फिर झूठी राजनीति के जाल में फंसकर अपने ही अधिकारों का गला घोंटते रहेंगे?
अब वक्त है जागने का… क्योंकि अगर Equality, Justice, Dignity, Rights सिर्फ शब्द बनकर रह गए तो ये लोकतंत्र भी सिर्फ दिखावा बनकर रह जाएगा...!!
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भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की संघी योजना में सरकार के सभी अंगों में संघी विचारधारा वालों की पैठ या भगवाकरण के साथ ही अब भारतीय सेना का भी भगवाकरण किया जा रहा है, जिसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा वाले संगठनों और अडानी जैसे कारपोरेट घरानों को सैनिक स्कूलों के संचालन के अधिकार दे दिए गए हैं। राष्ट्रीय सेना का भगवाकरण एक ऐसा अभिशाप साबित होगा, जो पीढ़ियों तक देश के लिए नासूर बनकर टीसता रहेगा। आप आसानी से कल्पना कर इसके दुष्परिणाम का अंदाजा आसानी से लगा सकते हैं कि जब भारत में संघी सरकार होगी, संविधान, लोकतंत्र, संसद, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाएं संघियों के हाथों में होंगे, देश का शासन-प्रशासन का संचालन और नियंत्रण संघी करेंगे, करोड़ों अंधभक्तों की संघी फौज घर-घर घूमेगी और सेना भी संघी मानसिकता और विचारधारा की होगी। स्पष्ट है कि तब भारत एक हिंदू राष्ट्र होगा, जहां दूसरे धर्मावलंबियों को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाएगा, हिंदू धर्मावलंबियों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में विशेष महत्व और वरीयता दी जाएगी, मनुस्मृति लागू किया जाएगा, दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे के सिद्धांत से महरूम कर दिया जाएगा, सवर्णों को सरकार और शासन-प्रशासन में वरीयता और प्राथमिकता दी जाएगी और भारत में विभिन्नता में एकता की सांस्कृतिक विरासत खत्म कर दी जाएगी। सच तो यह है कि हिंदू राष्ट्र के नाम पर भारतीय अस्मिता, अस्तित्व, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और बहुलवादी सांस्कृतिक विरासत को मिटा दिया जाएगा। आधुनिकता, प्रगतिशीलता, गतिमानता, विवेकशीलता, तार्किकता, बौद्धिकता, वैज्ञानिकता, संवेदनशीलता, नवोन्मेष और सत्यान्वेषण तथा क्रांतिकारिता की जगह पुरातनता, पिछड़ापन, गतिहीनता, अतार्किकता, अविवेकशीलता, अवैज्ञानिकता, असंवेदनशीलता, मूर्खता, अज्ञानता, जड़ता, कूपमंडुकता, बौद्धिक दिवालियापन, मानसिक संकीर्णता और दिमागी बधियाकरण को भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान के रूप में प्रक्षेपित और प्रतिष्ठापित किया जाएगा...!!
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@BhavikaOpinion
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"भारत की शिक्षा अब ज्ञान का मंदिर नहीं, बल्कि लाभ का कारखाना बन गई है। जहाँ सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं और प्राइवेट स्कूल फल-फूल रहे हैं, ताकि बहुजन का बच्चा महँगी शिक्षा से वंचित रहकर विशेषाधिकारों को चुनौती न दे सके।"
"हिंदुत्व छद्म-राष्ट्रवाद है। असली राष्ट्रवाद संविधान, समानता और न्याय पर टिका होता है। हिंदुत्व राष्ट्र को हिंदू और अन्य में बाँटकर राष्ट्र को ही कमजोर करता है। ठीक वैसे ही जैसे हिटलर ने जर्मनी को आर्य और यहूदियों में बाँटा था।"