@,क्या दिल्ली क्या कोईऔर शहर हादसे हर जिलाशहर गांव में मुंह फैलाए खड़े हैं लेकिन मौजूदा नेता हो या पुलिस प्रशासन दिखाने सेभी नहीं देखते है कि नैतिक अनेतिक कहां चल रहा है इंसानों की जिंदगी पर व्यबहार की राजनीति का होना बेहद सर्मनाक है न केमरे की सही व्यस्था न कोई चौकी दारों जैसा-
@, दिल्ली हादसा आज का इंसान तो पूरी तरह स्वार्थ में उतर चुका है लेकिन सरकार का भी दायित्व बनता है कि शहर कालोनियों में चेकिंग सप्ताह महीने भर में होते रहना बहुत जरूरी है लेकिन न्यूज भी निकलती है और दिखाया भी जाती हैं पर कोई असर नहीं होता है फिर मुर्दों की क्या सुरक्षा करनी है।
@,अब लगने लगा है कि आखिर कानून किसके लिए होता है अब तक करीब के लिए अब तो देश और सुरक्षा कर्मी ही बे आबरू हो रहे हैं पर कोई मतलब ही नहीं जो चाहता है अपनी अपनी पावर से खेल जाता है आखिर जनहित और देश का भविष्य क्या होगा विषय चिंता का है लेकिन भाषा और सभ्यता ने मरिया दाएं तोड़ दी।
@,अगर हम हकीकत में घुसकरआत्मसात करें तो मुट्ठी भर व्यक्तित्व को छोड़कर आज राजनीति को कैरियर समझने लगा है इंसान जिसे देखो उसेअधिकारों के मुद्दों पर चंद कदम रखते ही राजनीति दिखाई देने लगती रूलो को तोड़ने में हदों की सीमाएं तोड़ी जा रही हैं फिर संसद हो या लैंग्वेज संन्यासी हो याआप -
@,भय अपराध करने में नहीं होता है भय तो कानून और दंड भोगने का होता है सबको माफ कर देना चाहिए क्योंकि ये देश के उभरते हुए स्टार हैं जो कुर्सी छीनने से लेकर नंगा नाचने में सभ्यता की सारी हदें तोड़ने में पीछे नहीं हटे इनके इरादे तो देखो कि देश की छत उखाड़ने में कोई कसर ही नहीं छोड़ी।
@,आरक्षण एक मुफ्त की सेवा है,
जो तीन वर्गों के लिए आवश्यक है,
गरीब की कोई जाति और धर्म नहीं होता,
विकलांग का कोई सहारा,,
और असहाय बुढ़ापे की कोई वैशाखी नहीं तब यह सेवा सिर्फ इन्हीं तीन की आवश्यकता में काम आनी चाहिए।
दीप्ति,✍️
@,देश,राजनीति,सभ्यता, संस्कृति,शिक्षा,आबरू,आज सिर्फ मिलियन के चक्कर में दांव पर लग रहे हैं सत्य से दूर आखिर हम जा कहां रहे है युवा बच्चे महिला पुरूष आज सब मिलियन के पीछे भाग रहे परिणाम आज भगवान से लेकर कोई ऐसा नहीं बचा है जिसकी इमेज सुरक्षित बची हो ये बहुत दुख का विषय है।
दीप्ति,
@,देश की राजनीति पर नजर डालें तो आज के हालात इस तरह का चक्र बना चुके हैं जैसे कभी अभिमन्यु, और आज वोटर इसके अंदर खड़ा हैं वोटर सोचने पर विवस हो रहा है आखिर जनहित के भविष्य की सुरक्षा है कहां लेकिन भ्रम इतना भी नहीं पालना चाहिए कि आज की पब्लिक पढ़ी-लिखी है।
दीप्ति,
@,जस्ट बीज हो या बात,
अंकुर उगने में बीज को मिट्टी में फूटने के लिए कुछ समय लगता हैऔर सवालों का ठोस जबाव देने के लिए सोच में गूंथना में समय लगता है,
तब जाकर बात का वजूद तय सही ढंग से होता है,
तोते को जबाव देने में समय नहीं लगता है क्योंकि उसे जितना पढ़ाया जाता है बो उतना बोलता-
@,हर चैनल पर वही लोग क्यों डिबेड के लिए बुलाए जाते हैं जो हर बार मुद्दों पर नहीं बहस करते करते अभद्रभाषा पर उतरआते अपने समय का सब्र तक नहीं दूसरे के सवालों के जबाब पूरे नहीं होने देते बेटियों पर राजनीति करने बालों को भेदभाव क्यों बेटियां कहां नहीं है पक्ष पात क्यो बेटियों के साथ,
@,बात जब लड़कियों की आ रही है तो पुलिसऔर मीडिया मेंभी लड़कियां हैं क्या उनकी इज्जतऔर इमेज नहीं है एक मीडिया की लड़की को कितनी बुरी तरह से टच करके कई लड़कों,चोथा स्तंभ खामोश क्यों पुलिस की बेटियां खामोश क्यों कि उन्होंने सुरक्षा करने की कसम खाई मीडिया न्यूज बेटियों पर राजनीति बंद-
@,संसद में जनहित के मुद्दों पर सवाल जबाव किये जाते हैं संसद हो-राज्यसभा इनका घेराव करके रोक देना जनहित का खून चूसने के समान हो जाता है क्यों ये जनहित के खून पसीने से चलती है विरोध किसी तरह का इस तरह का किसी एक के हित में नहीं पूरे जनहित पर गलत प्रभाव- पुलिस पर हमला सर्मनाक है।
@,मैं अपना शहर लिख रही हूं--
पढ़ने जरूर आइएगा--
बारिशों के पानी पर,,
वायदों का काम उगेगा,,
लहराती फसल देखने,,
हमारे शहर में जरूर आइएगा,,
आईनों पर बैठेंगे,,
शहर संवर कर,,
जश्न नेताओं की दावतें,,
खाने जरूर आइएगा,,
लेखिका,पत्रकार,दीप्ति चौहान।
@,पक्ष-विपक्ष ही नहीं होते तो एक ही मुद्दा दोनों सुलझाते
एक को सुलझाना है दूसरे को बनाने है पर पब्लिक को यह नहींभूलना चाहिए कि देशऔर परिवार सर्वोपरि जिम्मेदारी हर इंसान की भूमिका मेंआती है यहां हर व्यक्तिअपनेअपने स्वार्थ में-अपने बच्चों केभविष्य में चिराग न जला सको तो बुझाओ भी-
@,देशों की लड़ाई बहुत दुखद है इस इगो में बेगुनाह पब्लिक मरती हैऔर जिंदा रहते तबाही का खामियाजा भीभोगती जो ग्रोथ हम दसियों साल में उपलब्ध कर पाते हैं उसे हम पलो में फूंक देते हैं सभी देशों को मिलकर इस विषय पर बातों से हल निकालने चाहिए वस्तु की हानि की पूर्ति हो सकती है पर इंसानो-
@,श्री राम मंदिर में चोरी हुई ये मानव सोच से दूर की बात है किश्रद्धा सेभी स्वार्थ बडा़ हो गया लेकिनअभी तक स्पष्ट खुलासाभी नहीं हुआ है कि इस घृणितअपराध का मास्टर माइंड है कौन लेकिन यह अपराध उससेभी बड़ा बन जाता हैजो दिया हुआ दान मांग रहे हैं इससे लगता है कि आखिर हम जा कहां रहे हैं
@#,जिस घर समाज देश में महिलाओं की दुर्दशा होगी वहां कभी खुशहाली बहाल नहीं हो सकती हम देख ही नहीं भुक्त होगी भी हैं किआज खुद स्वार्थ के लिए महिलाओं की आबरू का तमाशा बनाए हुए हैंभाषा से लेकर उसकीआबरू पर सीधेअटेक हो रहे हैं यह सिर्फ एक महिला परअपराध नही पूरे ब्रह्मांड की देवियों का,
@#,बेटियों की सुरक्षा न राजनीति न धर्म न तेरे मेरे से की जाती है इनकी रक्षा ही पुरूषार्थ की असली पहचान है सत्य न सो रहा है न कमजोर हो रहा है बस इसकी अदालत अपने बक्त पर ही लगती हैऔर सुनवाई में किसी गवाह पद पैसा की आवश्यकता होती है ये खुद में ही काफी है याद रहे कर्मा लौटता जरुर है