यह अरण्य झुरमुट जो काटे
अपनी राह बना ले
कृत दास यह नही किसी का
जो चाहे अपना ले
जीवन उनका नही युधिष्ठिर जो इस से डरते हैं
यह उनका जो चरण रोप निर्भय होकर चलते हैं !!
पंकज उदास जी की बेहद खूबसूरत और भावुक ग़ज़ल है जो पुरानी यादों और बदलते समय को दर्शाती है,
उर्दू साहित्य में इस नजम में पूरी कहानी कही गई है नजम के शायर है जनाब जफ़र गोरखपुरी
नजम का टाइटल है 21वीं सदी
घर का बड़ा बेटा ✍️
मेरा एक मित्र जिसने अपनी आधी उम्र
अपने भाई बहनों को पढ़ाने...
उनकी शादी ब्याह करने...
और माता पिता के अनुसार चलने में बर्बाद कर दी....
हाँ ईन हालातों में बर्बाद ही कहूँगा. .
वो अब अपने घर का "विलेन" है.. क्योंकि अब सब भाई सेटल हो चुके हैं....
बहनें अच्छे घरों में ब्याही हैं....
और अब वो सब अपने भाई को कुछ नहीं समझते हैं.....
क्योंकि अब उनके माता पिता का नरेटिव उस बड़े भाई को लेकर बदल चुका है......
अब माता पिता के सभी बच्चे बड़े हो चुके हैं,...
सब सेटल हैं.....
तो अब उस बड़े भाई की कोई खास जरूरत बची नहीं है....
उन सबके जीवन में...
उसके छोटे भाई से कल बात हुयी....
और पूछा कि ऐसा क्या हुआ कि
अब तुम लोग अपने भाई से इतने चिढ़े रहते हो......
जबकि उसी ने तुम लोगों को पढ़ाया,
और इस काबिल बनाया जहां तुम लोग आज हो,
तो वो कहने लगा
"भईया को गुस्सा बहुत आता है"..
पूछा गया कि क्या पहले उनको गुस्सा नहीं था?
तो कहने लगा कि पहले भी बहुत था!! मगर हम लोग बर्दाश्त करते थे!
और कैसे हम लोगों ने उनके साथ जिया है ये हम लोग जानते हैं..
एक बार फीस देते थे तो चिल्लाते थे, सबको पढ़ाते लिखते थे मगर उस से ज़्यादा गुस्सा करते थे....
उन्होंने बहुत कुछ किया मगर उनके गुस्से ने सब कुछ बर्बाद कर दिया इसीलिए हम लोग अब उन्हें नहीं चाहते हैं!!
फिर छोटे भाई से पूछा गया कि "तुम बाकी भाई बहन बड़े कूल हो और तुम लोगों में कोई गुस्से वाला नहीं है,
तो ऐसा क्यों है?.. .
वो कहने लगा कि हम सब लोग बहुत कम गुस्सा करते हैं,
और सब अपने लाइफ़ में मस्त हैं"..
तो उस से पूछा गया कि
"क्या तुम में से किसी ने 22 साल की उम्र में छह, सात भाई बहनों और माता पिता का खर्च उठाया है?
और घर की सारी ज़रूरतें पूरी की हैं?" उसने कहा "नहीं, हम सब छोटे हैं,
हमें क्यों किसी को पालना,
ये तो बड़े भाई का फ़र्ज़ था जो उसने किया,
उसमें क्या एहसान किया उसने"....
फिर उस से पूछा गया कि
"अगर तुम 22 साल की उम्र में इतने सारे भाई बहनों और घर का खर्च उठाओगे तो क्या तब भी तुम इतने ही कूल और बिंदास बने रहोगे जितने तुम अब हो? क्या तुमने अपनी मां से कभी पूछा है कि तुम्हारा भाई बचपन भी इतना गुस्सा करता था जब उनके ऊपर तुम लोगों की जिम्मेदारी नहीं पड़ी थी?"
इसका उसके पास कोई जवाब नहीं था..
उस से फिर पूछा गया कि "अब तुम्हारे भाई के भी बच्चे हैं तो क्या अब तुम लोग मिलकर उसके बच्चों को पढ़ा रहे हो और उनका खर्च उठा रहे हो?
क्या तुम्हारे माता पिता ने तुम्हें इस फ़र्ज़ से अवगत नहीं करवाया है?
क्या उन्होंने तुमसे कभी ये नहीं कहा है कि "उसने तुम सबकी ज़िम्मेदारी उठाई है और अब तुम लोग उसके बच्चे की उठाओ तो हो सकता है उसका गुस्सा कम हो जाए?"
ये कोई अनोखी घटना नहीं है भारत में, यहां माध्यम वर्गीय परिवारों में हर दूसरे घर की लगभग यही कहानी होती है.. और ये इसलिए होता है क्योंकि भारतीय माता पिता को उनकी सोसायटी ने कुछ ऐसी "परिभाषाएं" गढ़ के पकड़ाई हैं जिस से वो आराम से किसी का भी ख़ून सारी उम्र चूस सकते हैं!!
बेटे का ये फ़र्ज़ होता है,
माता पिता का ये "हक़" यानि "अधिकार" होता है,
बहू का ये कर्तव्य होता है,
बड़े बेटे का परिवार के प्रति ये कर्तव्य होता है,
बड़ा बेटा पिता समान होता है,
भाभी मां समान होती है,
फलाने ये समान होते हैं,
फलानी ये समान होती हैं...
ये जो फ़र्ज़, कर्तव्य, अधिकार, हक़ की परिभाषाएं एक दूसरे को ये बताते हैं, सिर्फ ये मौखिक परिभाषाएं ही सारे परिवार को मानसिक रूप से पंगु करके उनका जीवन नर्क बनाने के लिए काफ़ी होती हैं....
बड़ी खतरनाक और बड़ी ही अप्राकृतिक परिभाषाएं हैं
ये जो भारतीय मध्यम वर्गीय परिवार का जीवन नर्क किए रहती सोचिए थोड़ा.. उस छोटे भाई को सारी उम्र ये एहसास ही नहीं हो पाएगा कि उसके बड़े भाई की उसके या किसी के प्रति कोई भी सिरे से जिम्मेदारी थी ही नहीं....
वो भी इन्हीं की तरह उस परिवार में मात्र पैदा हुआ था और उसे अपना जीवन जीना था....उसने अगर इनको अपने पैसे से एक ग्लास पानी भी पिलाया था तो वो सिवाय उसके "एहसान" के कुछ नहीं था.. मगर उसके मां की "धूर्त" शिक्षा ने उसे ऐसा समझा दिया है जैसे इन सारे भाई बहनों को पालना और उनकी जिम्मेदारी उठाना उसके बड़े भाई का फ़र्ज़ था....और अब सिर्फ इतनी सी दलील की बड़े भाई को गुस्सा बहुत आता है,
इस बात से वो "बुरा" है....
जबकि ये सारा परिवार एक लड़के के शोषण और उसका जीवन नर्क करने का अपराधी है....
वो बड़ा भाई अपनी कमाई से किसी को भी एक रुपया न दे,
किसी को अपने पास फटकने भी न दे, सब कुछ अपने लिए अकेला करे,
तब भी वो कहीं से कहीं तक किसी भी फ़र्ज़, जिम्मेदारी और अधिकार का दोषी नहीं है
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