जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता
ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता
मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता
बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती
ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता
ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नो ये भी जला डालो
कि सब बे-घर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता
~ जावेद अख़्तर
जो सब कुछ छोड़कर अकेली जीवन-यात्रा पर निकले होंगे,
अब तक कहाँ पहुँचे होंगे?
कभी किसी मोड़ पर ठहरे भी होंगे,
किसी खामोश शाम में थोड़ी देर बैठे होंगे।
पर ठहरना उनकी फितरत में नहीं रहा होगा,
चलते रहना ही शायद उनका स्वभाव बन गया होगा।
हर मौसम से गुज़रे हो��गे ,
कड़ी धूप में खुद को समझते हुए,
बारिश में यादों से भीगते हुए,
सर्दियों में अपने ही भीतर से गर्माहट खोजते हुए।
और शायद आज भी चल रहे हों,
मंज़िल की ज़िद में नहीं,
बस इस यक़ीन के साथ
कि जो पीछे छूट गया,
वो लौटने लायक़ था ही नहीं।
जाता हुआ दिसंबर
किसी पुराने कमरे की तर�� है—
जहाँ सब कुछ
अपनी जगह पर है,
पर अपनापन
कहीं और खो गया है।
यादें
खिड़की से आती ठंड जैसी हैं,
न रोकी जा सकती हैं,
न पूरी तरह झेली जाती हैं।
समय यहाँ
घड़ी में नहीं चलता,
वह
अकेलेपन की चाल से
हमारे भीतर उतरता है।
दिसंबर के साथ
कोई विदा नहीं होता,
बस
हम थोड़े और
अपने अतीत में
बसे चले जाते हैं।
- सूर्यभान 'सूरी' 🌷/ @ImSury9
(तस्वीर:अज्ञात)
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी ��ेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़, खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।
~ विनोद कुमार शुक्ल
प्रिय प्रशांत किशोर,
जब मैं यह ख़त लिखने बैठा हूँ, तब बाहर बिहार में जश्न का शोर है
लोग ढोल बजा रहे हैं, नारे लगा रहे हैं,
और भीतर मेरे मन में सिर्फ एक ही ख���्याल घूम रहा है
इस जीत की असल कहानी किसी ने नहीं लिखी…
पर मैं लिख रहा हूँ।
क्योंकि 2025 के इस चुनाव में
अगर किसी ने सबसे ज़्यादा पसीना बहाया है,
सबसे ज़्यादा किलोमीटर पैदल चला है,
सबसे ज़्यादा गालियाँ खाईं और फिर भी मुस्कुराया है,
तो वो तुम हो प्रशांत किशोर।
तुमने लोगों को पहली बार दिखाया
कि जात–धर्म से ऊपर भी राजनीति होती है।
तुमने मजमा नहीं लगाया,
तुमने दिमाग लगाया।
तुमने लोगों को सिखाय���
कि जाति से पेट नहीं भरता,
रोज़गार से भरता है।
तुमने बताया
कि पलायन सिर्फ आँकड़ा नहीं,
बिहार के हर घर की चीख है।
तुमने नेताओं को मजबूर किया कि
वे पहली बार रोज़गार का मतलब समझें,
पहली बार पलायन को अपराध की तरह देखें,
पहली बार सड़कों पर जा कर जनता को सुनें।
कई जगह तुमने दबाव बनाया
और यही दबाव राजनीति में “जियोनुका” की तरह लगा।
जैसे खेत में पानी न जाए तो किसान नहर खोल देता है,
वैसे ही तुमने सरकार की गर्दन पकड़कर कहा
“काम करो नहीं तो जनता देख रही है।”
लोग क्या समझें
यह दबाव था या प्रेरणा।
पर असल बात यह है कि
जिस काम को सरकार 20 साल में नहीं कर सकी,
उसे तुमने 1 साल की जनसुराज यात्रा में करवा दिया।
सच कहूँ
अगर 2025 के चुनाव में सरकार जीती,
तो उसमें आधी जीत उनकी है…
और आधी तुम्हारी।
क्योंकि तुम वो दबाव बल बने
जिसने नीतियों को धक्का दिया,
जिसने मंत्रियों को हिलाया,
जिसने अफसरों को जगाया,
जिसने जनता को उम्मीद दी।
तुमने बिहार के लोगों को पहली बार एहसास कराया कि
राजनीति सिर्फ गादी क��� लड़ाई नहीं है
रोज़गार की भी लड़ाई है।
तुमने बताया कि
बिहार को जाति से ज़्यादा नौकरी चाहिए,
नारे से ज़्यादा नीयत चाहिए।
आज लोग कहते फिर रहे हैं
“बिहार जीता।”
पर मैं कहता हूँ
बिहार को तुमने जगाया।
और जो इंसान किसी प्रदेश को जगा दे,
वो सिर्फ चुनावी रणनीतिकार नहीं होता,
वो इतिहास लिखने वाला शख़्स होता है।
आज की इस जीत में
तुम्हारी मेहनत,
तुम्हारा संघर्ष,
तुम्हारी आवाज़,
और तुम्हारा दबाव
सब कुछ शामिल है।
कई बार सोचता हूँ,
अगर तुम न होते,
तो शायद यह चुनाव भी
पुरानी लकीरों पर चल जाता।
पर नहीं
इस बार बिहारी जागा है।
और उसे जगाने वाला
एक ही आदमी है तुम।
तुम्हारा एक शुभचिंतक,
जो बिहार को बदलते हुए देखकर
तुम्हारी भूमिका समझ गया।
#BiharElection2025
डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम से बना मध्यप्रदेश का 25वाँ अभयारण्य
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कुशल मार्गदर्शन में राज्य शासन ने सागर जि���े के 258.64 वर्ग किलोमीटर आरक्षित वन क्षेत्र को मध्यप्रदेश का 25वाँ अभयारण्य घोषित करने की अधिसूचना जारी कर दी गयी।
@DrMohanYadav51
होली / हरिवंशराय बच्चन
यह मिट्टी की चतुराई है,
रूप अलग औ’ रंग अलग,
भाव, विचार, तरंग अलग हैं,
ढाल अलग है ढंग अलग,
आ��ादी है जिसको चाहो आज उसे वर लो।
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो!
निकट हुए तो बनो निकटतर
और निकटतम भी जाओ,
रूढ़ि-रीति के और नीति के
शासन से मत घबराओ,
आज नहीं बरजेगा कोई, मनचाही कर लो।
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो!
प्रेम चिरंतन मूल जगत का,
वैर-घृणा भूलें क्षण की,
भूल-चूक लेनी-देनी में
सदा सफलता जीवन की,
जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो।
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!
होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो,
होली है तो आज मित्र को पलकों में धर लो,
भूल शूल से भरे वर्ष के वैर-विरोधों को,
होली है तो आज शत्रु को बाहों में भर लो!
Painting :- Guler School of Art ( Himachal ) 18th century
हारे हुए लोग कहाँ जायेंगे ? ?
हारे हुए लोगों के लिए कौन दुनिया बसाएगा ?
उन पराजित योद्धाओं के लिए ,
तमाम शिकस्त खाए लोगों के लिए।
प्रेम में टूटे हुए लोग,
सारी जिंदगी को कहीं दांव लगाकर हारे हुए लोग
थके-हारे लोग, गुमनाम लोग
वो बूढ़े पिता जो अब अकेले रह गए हैं
वो कल्पनाओं में खोया रहने वाला बच्चा
जो परीक्षा में फेल हो गया है
वो लड़की जो तेज कदमों से घर की तरफ लौट रही है
वो बूढ़ा गुब्बारे वाला जो कांपते हाथों से पैसे गिनता है
एक असफल लेखक
मैच हार गया खिलाड़ी
इंटरव्यू से वापस लौटा युवा
और ऐसे तमाम लोग
जिन्हें पता था कि वे सफल हो सकते हैं
मगर उन्होंने असफलताओं से भरा रास्ता चुना,
वो लोग जिन्होंने
हमेशा गलत राह पर चलने का जोखिम उठाया
वो लोग जिन्होंने
गलत लोगों पर भरोसा किया
वो जिन्होंने
चोट खाई, धोखा खाया, ठोकर खाई
गिरे और धूल झाड़कर खड़े हुए
वे कहां जाएंगे ?
क्या कोई ऐसी दुनिया होगी
जहां दो हारे हुए इंसान
एक-दूसरे की हथेलियां थामे
कई पलों तक ���ामोश रह सकते हों
अपनी चुप्पी में तकलीफ बांटते हुए।
जिन्होंने इकारस की तरह
सूरज की तरफ उड़ान भरी
और उनके पंख पिघल गए
हारे हुए लोगों के लिए कोई जगह नहीं है
न किसी घर में, न समाज में, न किसी देश में।
क्या जो विजेता थे
वो इनसे बेहतर हैं? बेहतर थे?
नहीं, वही हारा जिसने जिंदगी की अनिश्चितता पर यकीन किया
वही जिसने अनजान रास्तों पर चलने का जोखिम उठाया
जिसने गलती करनी चाही , जो मक्कार चुप्पियों के पीछे छिपा नहीं।
जो बोल सकता था मगर बोला नहीं
उसने वो चुना जिसे चुनने का कोई तर्क नहीं था
सिवाय उसकी आत्मा के
जो हारा आखिर वो भी एक नायक था।
एक पराजित नायक के दर्द को
कौन समझना चाहेगा?
जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम।
पंक्तियां : दिनेश श्रीनेत
#ChampionsTrophy2025 #ChampionsTrophy #INDvNZ
Playing like true champions, the Men in Blue scripted history in gold and brought the trophy home. Congratulations to the team and the entire nation on this historic win.
#INDvsNZ#ChampionsTrophy2025