राजस्थान में जल्द इंटरव्यू समाप्त की घोषणा कीजिए @RajCMO@BhajanlalBjp
1.RAS की समस्त अधीनस्थ सेवाओं में इंटरव्यू समाप्त की घोषणा की जाए।
2. SI भर्ती 2025,SI भर्ती री एग्जाम 2021 में इंटरव्यू समाप्त की घोषणा जल्द की जाए ताकि मेहनती युवाओं के साथ इंटरव्यू में खिलवाड़ न हो सके।
राजस्थान के मुख्यमंत्री श्रीमान @BhajanlalBjp जी आपसे अनुरोध है की राजस्थान राज्य के राजकीय माध्यमिक एवं उच्च माध्यमिक विद्यालयों में पुस्तकालय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने तथा छात्रों को गुणवत्तापूर्ण पुस्तकालय सेवाएं उपलब्ध कराने हेतु लाइब्रेरियन स्टाफिंग पैटर्न लागू करना अत्यंत आवश्यक एवं समय की मांग है।वर्तमान स्थिति के अनुसार माध्यमिक शिक्षा विभाग द्वारा नवीन स्टाफिंग पैटर्न का प्रस्ताव तैयार कर वित्त विभाग को भेज दिया गया है।
वर्तमान स्वीकृत लाइब्रेरियन पद लगभग 4,123 हैं।
स्टाफिंग पैटर्न समीक्षा के अनुसार कुल आवश्यकता 11,531 पद आंकी गई है।
इस प्रकार लगभग 7,408 नए पदों का सृजन प्रस्तावित है।
ग्रेड-वार प्रस्तावित विवरण:
पुस्तकालयाध्यक्ष ग्रेड-प्रथम : वर्तमान = 41 → प्रस्तावित 588 (नए = 547)
पुस्तकालयाध्यक्ष ग्रेड-द्वितीय : वर्तमान = 1,092 → प्रस्तावित 2,118 (नए = 1,026)
पुस्तकालयाध्यक्ष ग्रेड-तृतीय : वर्तमान = 2,990 → प्रस्तावित 8,825 (नए = 5,835)
अनेक विद्यालयों में लाइब्रेरियन पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं या स्वीकृत ही नहीं हैं, जिससे पुस्तकालय बंद पड़े रहते हैं या अयोग्य व्यक्ति द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। शारीरिक शिक्षा अध्यापक (PTI) की तर्ज पर लाइब्रेरियन पदों पर भी स्टाफिंग पैटर्न लागू होने से स्कूलों में पुस्तकालय संस्कृति विकसित होगी तथा हजारों बेरोजगार लाइब्रेरी साइंस स्नातक/डिप्लोमा धारकों को रोजगार मिलेगा।
मुख्यमंत्री महोदय आपसे विनम्र अपील है कि माध्यमिक शिक्षा विभाग द्वारा भेजे गए स्टाफिंग पैटर्न प्रस्ताव को वर्तमान स्थिति के आधार पर शीघ्र स्वीकृति प्रदान करें।
लाइब्रेरियन ग्रेड-I, II एवं III के प्रस्तावित नए पदों 7,408 के सृजन हेतु वित्तीय स्वीकृति जारी करें।
स्वीकृति के पश्चात् राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड (RSMSSB) / राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के माध्यम से नई भर्ती का नोटिफिकेशन शीघ्र जारी करवाने के निर्देश दें।
लंबित फाइल पर प्राथमिकता से कार्रवाई कर निर्णय लें।आपके सकारात्मक एवं शीघ्र निर्णय से राजस्थान की शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी तथा युवाओं को रोजगार का सुनहरा अवसर मिलेगा।
#स्टाफिंग_पैटर्न_लागु_करो
@KumariDiya@madandilawar@RajCMO@RPSC1@ashokgehlot51@GovindDotasra@hanumanbeniwal@sunil_merta2311
मेरे बड़े भाई कमल स्टाफिंग पैटर्न की फ़ाइल आपके मुँह से 3 साल से सुनते हुये हो गये की निदेशक महोदय की टेबल पऱ है,वो फ़ाइल चूहें ने काट तो ना ली 😅
पूरे दिन निदेशक महोदय की गति, आभार करते हो, इस बार आभार करने जाओ तब फ़ाइल को थोडी साफ सफाई करके सही से पेश करके आना भाई जी , सिर्फ आभार से कैसे काम चलेगा।
वैसे अब सुनते सुनते थक गये आप संघ के वरिष्ठ हो इसलिए आपसे अनुरोध है आप एक रणनीति बनाकर बड़े आंदोलन की तैयारी करो, ऐसे बिना संघर्ष के लाइब्रेरीयन वालो को कुछ नहीं मिलेगा।
हमें सभी को एक होकर सिस्टम से लड़ना पड़ेगा, सरकार कब तक गुमराह करती रहगी।
इस बहरी सरकार को जगाने के लिए अब धमाका करना पड़ेगा तभी निदेशक महोदय की गति 100 की स्पीड से चलगी।
लाइब्रेरीयन वालो की जितनी मांग है उनके लिए बहुत जल्द रणनीति बनाकर कमान संभालो, हमें सभी एक साथ है ।।
#स्टाफिंग_पैटर्न
@kamal_kanawaria@pcchoudharyJSR1@RahulVyas472043@NitendraChoudh4@S45325Magic
@HANUMANKISAN Are bhai अनारक्षित 15% k liye नहीं पूरे 100% जनता के लिए है आप भी खड़े हो सकते हों इसपर
क्यों फालतू की पंचायती करते हो..... आ जाते हो रोने कब पेट भरेगा
जब पंच भी अपना हो, सरपंच भी अपना हो,
विधायक भी अपना हो, सांसद भी अपना हो,वकील भी अपना हो, न्यायाधीश भी अपना हो,और न्यायालय भी अपना हो।
एक तरफा डेमोक्रेसी अपना कब्जा स्थापित कर लिया हों वहां दलितों को न्याय कैसे मिलेगा? डांगावास हत्याकांड में दलित समाज के 6 व्यक्तियो की निर्मम हत्या कर दी थी। उन सभी आरोपी को आज न्यायाधीश आशीष बिजारणियां ने अपने स्वजातीय 40 व्यक्तियो को सुरक्षित कर दिया है। दलित समाज के साथ फिर से दुबारा पीठ पीछे वार कर दिया है।
#डांगावास #दलित_नरसंहार #राजस्थान
डांगावास : अगर केंद्र और राज्य के सरकारों के वर्तमान और पूर्व दलित मंत्री, आईएएस, आईपीएस, न्यायमूर्ति भी बुरी तरह डरे हुए हैं और बोल नहीं पा रहे हैं कि सोचिए कि इस समाज में दलितों की असली हालत क्या है?
डांगावास के छह दलितों के हत्यारों का छूट जाना और उस पर सब तरफ चुप्पी रहना इस बात का प्रतीक है कि ताकतवर से ताकतवर पदों पर बैठे लोगों को भी अगर यह अन्याय बर्दाश्त हो गया है तो जािहर सी बात है कि दलितों के हालात सुधरे नहीं, और भी ख़राब रहे हैं।
अल्पसंख्यक मुस्लिमों की स्थिति तो बहुसंख्यक वर्चस्ववादी राजनेताओं ने ख़राब कर ही रखी है, हिन्दू समझे जाने वाले दलितों को भी अगर न्याय नहीं मिल रहा है तो सोचिए कि हम कितने अंधकार भरे समाज में रह रहे हैं।
इसका साफ सा मतलब ये है कि भारत के संविधान ने दलितों को दिखावटी प्रतिनिधित्व तो दे दिया, लेकिन उन्हें समाज ने न निर्भयता नहीं, न न्याय दिया और न ही नैतिकबोध दिया। हाँ, नैतिकबोध विहीन। नैतिकबाेध के बिना जो समाज होता है, उसे यह पता ही नहीं चल पाता कि उसके साथ जो रहा है, वह न्याय है या अन्याय।
डांगावास का फैसला केवल एक आपराधिक मुकदमे का फैसला नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र के सामने रखा हुआ एक भयावह आईना है। 2015 की हिंसा में छह लोग मारे गए थे। उनमें पाँच दलित थे और तीन लोगों को ट्रैक्टर से कुचल दिया गया था।
ग्यारह वर्ष बाद, सीबीआई की जाँच, चार्जशीट और 82 अभियोजन गवाहों के बावजूद मेड़ता की विशेष एससी-एसटी अदालत ने सभी 40 आरोपियों को बरी कर दिया।
पीड़ित परिवार अब हाईकोर्ट जाने की बात कह रहा है। लेकिन यह बात राज्य सरकार को और उसके विधि मंत्री को कहनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने ऐसा कहा हो, दिखा नहीं।
सरकार को चाहिए कि वह इस प्रकरण में अभियोजन पक्ष के मामले में रही कमजोरियों का विश्लेषण करवाए और अन्य मामलों में ऐसा नहीं हो, इसकी व्यवस्था करे।
कानून की भाषा में इसका अर्थ यह है कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध नहीं कर सका। अगर वह ऐसा नहीं कर सका तो वह 11 साल से कर क्या रहा था? इन ग्याहर साल में तीन सरकारें आईं और कई विधि मंत्री आए, न्यायवादी आए, दलित अधिकारवादी आए, गांधीवादी आए, ऐसे हिन्दुत्ववादी आए, जो दलितों का बहुत सम्मान करने वाले दावे करते हैं।
अब सबने देख लिया कि वे दलितों का क्या करते हैं। ऐसा लगता है कि वर्चस्ववादी सवर्णवादी समाजों का बस नहीं चलता, नहीं तो वे दलितों को ईंधन की तरह इस्तेमाल कर लें।
अगर थोड़ा सा भी इन्सानियत से सोचें तो लोकतंत्र की भाषा में इसके बाद एक दूसरा और अधिक बेचैन करने वाला सवाल शुरू होता है।यदि छह मनुष्य मारे गए तो हमारी जाँच और अभियोजन व्यवस्था ग्यारह वर्षों में उनकी मृत्यु की जवाबदेही तय क्यों नहीं कर सकी? और इसके ठीक पीछे एक तीसरा प्रश्न खड़ा है—प्रतिनिधित्व का।
हमने संविधान के जरिए अनुसूचित जातियों को विधायिकाओं और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व का सुरक्षा-कवच दिया। उसका उद्देश्य केवल इतना नहीं था कि सत्ता की तस्वीर में कुछ चेहरे बदल जाएँ। उसके पीछे सदियों के सामाजिक भय को राजनीतिक शक्ति में बदलने की आकांक्षा थी। डॉ. आंबेडकर की चिंता संख्या से अधिक उस स्वतंत्र राजनीतिक आवाज़ की थी, जो सत्ता के सामने अपने समाज का दुःख निर्भय होकर रख सके।
आज असहज प्रश्न यह है: क्या हमने प्रतिनिधित्व तो पैदा किया, लेकिन निर्भय प्रतिनिधित्व पैदा नहीं कर पाए?
दलित सांसद हैं, विधायक हैं, मंत्री हैं, वरिष्ठ नौकरशाह हैं; आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से निकले नेता सत्ता के अत्यंत ऊँचे गलियारों तक पहुँचे हैं। फिर भी डांगावास जैसी घटना पर वैसा राष्ट्रीय राजनीतिक तूफान क्यों नहीं उठता, जैसा उसकी भयावहता माँगती है? यदि किसी प्रतिनिधि के मन में यह गणना चलती है कि अत्याचार के विरुद्ध बहुत स्पष्ट बोलने से टिकट, पद, मंत्रालय, पार्टी-समीकरण या प्रभावशाली जातीय गठजोड़ संकट में पड़ सकता है तो समस्या उस व्यक्ति के साहस की ही नहीं है। समस्या कहीं अधिक गहरी है, यह उस सत्ता-संरचना की समस्या है जिसने वंचित को कुर्सी तो दे दी, पर कुर्सी की शर्तों में उसका मौन भी लिख दिया।
यह आरक्षण की विफलता नहीं है। यह ठीक इसीलिए आरक्षण की निरंतर आवश्यकता का प्रमाण है। क्योंकि संवैधानिक प्रतिनिधित्व हासिल कर लेने के बाद भी यदि सामाजिक वर्चस्व किसी मनुष्य की आवाज़ तक नियंत्रित कर सकता है तो बराबरी का सपना अभी काले कोसों तक दूर है।
हाँ, इस फैसले के बाद पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने जाँच और अभियोजन की खामियों पर सवाल उठाया है और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की प्रतिक्रिया भी सामने आई है; लेकिन प्रश्न बचा रहता है और वह यह कि पूरे पांच साल तक इतने गंभीर मामले को क्यों नहीं देखा गया? यह कांड 2015 में हुआ था तो में भाजपा थी और इस फैसले के समय भी भाजपा सत्ता में है।
सरकारों को न्याय में हस्तक्षेप से बचना ही चाहिए, लेकिन वे इस तरह के गंभीर प्रकरणों में अभियोजन पक्ष से पूछ सकते हैं कि पीड़ितों को इन्साफ़ मिले। इसीलिए सवाल ये भी है कि उस अनुपात का सार्वजनिक प्रतिरोध कहाँ है जिसकी पाँच दलितों की मृत्यु माँगती है?
डांगावास का सबसे डरावना दृश्य ट्रैक्टर नहीं है। सबसे डरावना दृश्य वह समाज है, जिसमें संविधान बोलने का अधिकार देता है, पद बोलने की शक्ति देता है और सामाजिक वर्चस्व फिर भी आवाज़ को फुसफुसाहट में बदल देता है। लेकिन एक लोकतंत्र में यह बहुत ही दु:खद है कि लोकतंत्र में इनसाफ भी दामन देख कर और गरेबाँ देख कर दिया जाता है और सबसे शर्मनाक स्थिति यह है कि प्रदेश के जाने कितने ही नेताओं ने तो इस फैसले पर अफसोस ही नहीं जताया है।
यह सिर्फ़ जातिप्रेम नहीं, वर्चस्वशाली सवर्ण समूह का आपसी सदभाव भी है। आप देखेंगे कि लोग कुछ दिन से अनशन पर बैठे युवाओं के प्रति तो सहानुभूति जताते हैं और जिन्हें ट्रेक्टरों से कुचलकर मारा गया, उन्हें घरों के अंधेरे की सुबकियां भी सुनने की कोशिश नहीं करते। राजस्थान की मौजूदा सरकार को इस मामले मे पीड़ितों को इनसाफ़ दिलाने की कोशिश करनी ही चाहिए।
हनुमान बेनीवाल जी आप “न्याय मसीहा” है इसलिए आपसे न्याय की उम्मीद है
कृपया इन 6 दलित भाइयों के परिवार को न्याय दिलाए क्योकि आप दूसरे क्षेत्रों में न्याय दिलाने पहुंचते है ये तो आपके संसदीय क्षेत्र का मामला है
उम्मीद है आप जातीय एंगल को छोड़ कर न्याय का साथ देंगे @hanumanbeniwal
ओबीसी आयोग ने अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है। इसमें साफ है कि किस प्रकार मूल ओबीसी को वर्षों से अपने हक से वंचित रखा गया।
अब समय आ गया है कि रोहिणी आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाए जिसमें ओबीसी के वर्गीकरण की सिफारिश की गई है।
#obc
नागौर के डांगावास हत्याकांड में 11 साल बाद आया फैसला बेहद चिंताजनक है। 2015 में जमीन विवाद में 5 दलितों समेत 6 लोगों की निर्मम हत्या हुई थी, और अब एससी-एसटी विशेष अदालत ने सभी 40 आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। पीड़ित परिवारों का सवाल जायज है, अगर 40 आरोपी बरी हो गए तो इन 6 लोगों की हत्या आखिर किसने की?
11 साल की लंबी कानूनी लड़ाई, सीबीआई जांच और ट्रायल के बावजूद इंसाफ न मिलना जांच और अभियोजन की गंभीर खामियों की ओर इशारा करता है। भाजपा सरकार के शासन में 11 साल पहले ऐसी घटना होना और अब उन्हीं के शासन में प्रतिकूल फैसला आना दिखाता है कि भाजपा न्याय के पक्ष में नहीं है। दलित समाज के साथ हुए इस अन्याय में जवाबदेही तय होनी चाहिए।
कांग्रेस हमेशा दलित समाज के सम्मान और अधिकारों के लिए खड़ी रही है। पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील की प्रक्रिया मजबूती से आगे बढ़नी चाहिए, राज्य सरकार को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
No one killed 6 Dalits in Nagaur.
डूब मरो राजस्थान के नेताओं ।डांगावास में 6 दलितों की हत्या के सभी 40 आरोपी बरी हो गए और आपलोगों के मुंह से उफ़ तक नहीं निकला। किसी ने तो मारा होगा या कोर्ट कह देता कि सभी ने खुद हीं जान दे दी।
@AshokMeghwal_@BhajanlalBjp मैने वीडियो से पूरे हत्याकांड को पढ़ा, रूह काफ गई इस तरीके से अत्याचार देखकर,बहुत ही निर्मम कांड था एक भी हत्यारा बचना नहीं चाहिए मामले को हाईकोर्ट में चैलेंज करना चाहिए, सबको फाँसी हो