झारखंड में पेपर लीक पर युवा न्याय मांग रहा है… लेकिन कांग्रेस और राहुल गांधी खामोश क्यों हैं?
जब सत्ता अपने सहयोगियों की हो, तो क्या छात्रों की आवाज़ दबा दी जाती है?
झारखंड का युवा जवाब मांग रहा है,
और देश इंडी गठबंधन का दोहरा रवैया देख रहा है। ⬇️
पेपर लीक पर राजनीति करने वाला विपक्ष अब सख्त कानून के भी खिलाफ! 🗣️
जब संसद में एंटी-पेपर लीक विधेयक पेश हुआ, तो वही विपक्ष, जो कल तक पेपर लीक और युवाओं के भविष्य के नाम पर राजनीति कर रहा था, कानून आते ही विरोध और हंगामे पर उतर आया।
सवाल सीधा है: क्या विपक्ष की प्राथमिकता छात्रों का भविष्य है, या सिर्फ राजनीति? 📜
ये CJP की Gen Z मादाएं हैं, इसके नारे सुनिए
- देश का युवा रोता है, मोदी का L छोटा है
ये अपने मां-बाप को मुंह कैसे दिखा पाते होंगे ? इन्हें देश के PM का प्राइवेट पार्ट छोटा लगता है
विडंबना ये है कि ऐसे जाहिलों को क्रिएटिव व क्रांतिकारी युवा बताया जा रहा है
इस भाषा के बाद कोई लड़का छोटा बड़ा दिखा दे इन्हें तो तुरंत उसको जेल भेज दिया है
युवा शक्ति के नाम पर नीचता, निर्लज्जता, बेशर्मी और जाहिलियत का नंगा नाच हो रहा है
और अर्बन नक्सल व लिब्रांडू गैंग इन्हें भगत सिंह जैसा क्रांतिकारी बताने में लगी है
एंटी-पेपर लीक बिल पेश होते ही INDI गठबंधन के सांसदों ने सदन में हंगामा किया और “NO! NO!” के नारे लगाए।
इस बिल में पेपर लीक के दोषियों के लिए ₹10 करोड़ तक का जुर्माना, 10 साल तक की जेल और 3 महीने में फैसला देने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट का प्रावधान है।
पहले विपक्ष ने कहा— पेपर लीक पर चर्चा हो। सरकार तैयार हो गई।
फिर विपक्ष ने कहा— पहले शिक्षा मंत्री इस्तीफा दें। इस्तीफा भी दे दिया गया।
अब जब पेपर लीक पर महत्वपूर्ण विधेयक पेश किया जा रहा है, तब भी ये सदन नहीं चलने दे रहे।
अभी - धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रहे हैं
खुद शिक्षा मंत्री थे तब - "पेपर मैंने थोड़े करवाया है"
राजस्थान में रहते 21 पेपर लीक का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाले डोटासरा जी🤡
30 नवंबर, 2014 को धर्मतल्ला की धरती से जवाब गूंजा था… “मैं अमित शाह हूं… और TMC को उखाड़ने आया हूं!”
12 साल तक बंगाल की माटी ने इस संकल्प को अपने सीने में संजोए रखा, और जब वक्त आया, हर वोट निर्णायक वार बना। समय बदला, सियासत बदली, बंगाल ने बदलाव की नई कहानी लिखी।
बदलाव की कहानी जारी है… यही है नया बंगाल।
एक महिला ने स्टार हेल्थ इंश्योरेंस से पॉलिसी ली।
किडनी इन्फेक्शन हुआ , तेज बुखार में कंपकंपी छूटने लगी , हालत बिगड़ी तो अस्पताल में भर्ती होना पड़ा।
लेकिन जब क्लेम लगाया गया तो जवाब मिला
आप तो दवा से ठीक हो सकती थीं , एडमिट क्यों हुईं?
अब सवाल ये है कि 👇
क्या बीमा कंपनी अब डॉक्टर भी बन गई है?
क्या मरीज की हालत अस्पताल तय करेगा या इंश्योरेंस ऑफिस?
क्या ICU में जाने से पहले कंपनी से अनुमति लेनी होगी कि “सर, क्या मैं सच में बीमार हूं?”
पॉलिसी बेचते समय कहते हैं “कैशलेस, टेंशन फ्री।”
और क्लेम के समय कहते हैं “आपको तो सिर्फ गोली खानी चाहिए थी।”
तो फिर इंश्योरेंस किस बात का है?
बीमारी कवर करने का या क्लेम रिजेक्ट करने का?
माँ के हेल्थ इंश्योरेंस के लिए 50 हजार भरता हूं...
जरूरत आई तो Star Health ने पैसे देने से मना कर दिया!
बोल रहे हमसे पूछकर ली थी पॉलिसी?
क्या देश में Health insurance के नाम पर भी घोटाला चल रहा है?
ये लखनऊ का वीडियो है, माँ के इलाज के लिए एक आदमी, Star Health के दफ्तर में बैठा है.
पहले प्रीमियर भरो, फिर बीमारी हो तो धरना दो, ये कौन सा सिस्टम है?
और स्टाफ का attitude देखिए, क्या ये लोग सिर्फ पॉलिसी बेचने के लिए रखे गए हैं या फिर ग्राहकों की मदद करना भी इनके काम में शामिल है?
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