आगरा प्रकरण में यदि कार्रवाई केवल RPF पर होगी और दूसरे पक्ष की भूमिका की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तो यह न्याय नहीं, पक्षपात होगा। CCTV, ऑडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और सभी साक्ष्य सार्वजनिक जांच का हिस्सा बनें। कानून वर्दी, पद और प्रभाव देखकर नहीं चलता।#EqualJustice
आगरा प्रकरण में यदि कार्रवाई केवल RPF पर होगी और दूसरे पक्ष की भूमिका की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, तो यह न्याय नहीं, पक्षपात होगा। CCTV, ऑडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और सभी साक्ष्य सार्वजनिक जांच का हिस्सा बनें। कानून वर्दी, पद और प्रभाव देखकर नहीं चलता।#EqualJustice
नमस्कार आप सभी को
हम सभी कभी न कभी रेल यात्रा करतें हैं और उसमें आर पी एफ की भूमिका को भली-भांति समझते हैं तथा उनकी कार्यशैली से भी खासे प्रभावित होते हैं। आज उसी बल को हमारे समर्थन की जरूरत है जहां पर राजनीतिक दबाव के चलते उल्टा कार्यवाही चल रही है ।
@AshwiniVaishnaw
@rpfncr@RailwaySeva@awajdo143@rpfncragc@upgrphq महोदय,
इस मामले में शीघ्र संज्ञान लें। RPF जवानों की पीड़ा और रोष को समझें। वर्दी की गरिमा बहाल कीजिए।
dy SS चाहर ने पुनः on duty RPF स्टाफ के साथ गाली गलौच,मारपीट की ,कपड़े फाडे और मोबाइल छीना। अनुशासन की कीमत यह जिल्लत तो नही होनी चाहिए।।
@rpfncr@RailwaySeva@awajdo143@rpfncragc@upgrphq महोदय,
इस मामले में शीघ्र संज्ञान लें। RPF जवानों की पीड़ा और रोष को समझें। वर्दी की गरिमा बहाल कीजिए।
dy SS चाहर ने पुनः on duty RPF स्टाफ के साथ गाली गलौच,मारपीट की ,कपड़े फाडे और मोबाइल छीना। अनुशासन की कीमत यह जिल्लत तो नही होनी चाहिए।।
दीवालें बोलती थीं
स्मृतियों में कौंधती है वह कच्ची दीवाल या सीली हुई दीवाल जिस पर थोड़ी काई लगी थी, भीगी थी, जिस पर कुछ छोटे छोटे फूल वाले पौधे उग आए थे, उसके रंध्रों से हल्की गर्म उमस उठती थी। वह दीवाल बोलती थी, वह दीवाल साथी, अभिभावक थी।
मैं चाहता हूँ कि सीमेंट वाली दीवारें कच्ची दीवारों में तब्दील हो जाएँ जिस पर मौसम के ललछिमे, सिन्दूरी सीले दाग साफ़ साफ़ दिखें। उन कच्ची दीवारों पर कच्चे धान के दूध की महक चिपकी हो। बिना सीमेंट वाली दीवार जिस पर लौकी की पीले फूलों वालीं बेलें, लाल पीले बोगनविलिया की टहनियाँ लिपटी हों, उस पर बैठ कर कोई पपीहा गा सके जिसकी हूक सुनकर नदी की कोई लहर हुलस उठे, कोई आंख लजा जाए।
याद आती है पुरानी बखरी की कच्ची दीवाल, परिवार नया घर बनने तक दालान में आकर रहने लगा पर भीत (अवधी में दीवाल को भीत कहा जा है) से प्रेम बना रहा। भीत को छलांग लगा कर पार करते कितनी बार गिरे, उसके ऊपर दौड़ते हुए जाने कैसी खुशी मिलती। अम्मा चिल्लाती रहतीं, उस पर न दौड़ने की मिन्नत करती रहतीं पर हमारे खेल दीवाल पर होते थे। दीवाल में आइस पाइस खेलते हुए छिपना, रेखाएं बनाकर ढूंढने को कहना, बारिश में भीज गयी मिट्टी को छूकर उसके ठंडे स्पर्श , उसकी गमक को महसूस करना आनंद के तल पर जाना होता था।
शाम को दीवाल के इस पार उस पार दुःख सुख की चर्चा करती, समान का आदान प्रदान करती बड़की माई, काकी, भौजी दिखतीं, कभी कभी आग जलाने के कंडे बोरसी में भर दीवाल पर रखे रहते, उस समय माचिस नही होती थी तो लोग बाग यहीं से आग लेकर चूल्हा जलाते।
दीवाल का सहारा लेकर उस पर मड़ई छा दी जाती थी, घर के गाय गोरु दोपहर में वहीं विश्राम करते थे।
भीत के आस पास की मिट्टी बड़ी भुरभुरी होती थी, जई की सुई उसमें लगाकर चलाना प्रिय शगल हुआ करता था। इस मिट्टी का प्रयोग हम लोग कटने पिटने से लेकर बाल धोने में भी करते, गर्मियों में खाये गए आम के बीज वहीं गाड़ देते थे, एक बारिश में जाने कितने अमोले अपनी लाल लाल पत्तियाँ निकाले आ जाते। बीरबहूटियों से लेकर लाल चींटियों तक के घर भीत पर थे, कक्का बताते थे कि भीत के अंदर मगरगोहटा (गोह) रहता है।
आज भी बारिश के बाद निकली धूप की चमक से उजली दीवाल मेरे मन को थाम्हे है। उसकी गंध मेरी देह में रची बसी है। मेरी अस्थियों में उसके कंकड़ कैल्शियम बन कर रहते हैं। भीमबेटका की भित्तियों पर मनुष्य के प्रेमिल इतिहास चित्रों के रूप में रचे गए हैं। शायद मैंने ही कई जनम पहले उन्ही भीमबेटका की भित्तियों आड़ी तिरछी रेखाएं बनाई थीं। गेरू और चूने से उन दीवारों को पोत दिया होगा शायद।
मार्बल्स युग मे कच्ची दीवाल हूँ मैं जिस पर हरी दूब उगी है।
असाढ़ सावन आते ही लड़के उड़ने लगते थे
बादल को छूते, हवा से बात करते लड़के हर गांव में पाए जाते थे। जब ये उड़ते थे तो उनकी बाहों और पिंडलियों में बसी मछलियां उछलती थीं, मछलियों के साथ साथ घन घनन घनन कर बरसने लगते थे। खेत बाग हरियर चुनरी भीगने लगती थी इन उड़ने वाले लड़कों को देखकर।
कूड़ी कूद के पाट बनाते समय यह ध्यान रखा जाता था कि पैर पड़ते समय मिट्टी धसके नहीं, आगे की जगह खूब भुरभुरी बनाई जाती थी। सबसे लंबी कूद के रिकॉर्ड से चार फिट और आगे तक अखाड़े बना दिए जाते थे। इन्हीं अखाड़ों में गुरुत्वाकर्षण के नियमों को मात दी जाती थी।
धीरे धीरे दुनिया ग्लोबल हुई, खेतों में गोदाम बनने शुरू हो गए। अब लड़कों के कूड़ी पाट खत्म हुए, उड़ने वाले लड़के किसी गोदाम में स्टोर कीपर, कहीं वॉचमैन और कहीं सुपरवाइजर हो गए हैं। उनके पंख कट चुके हैं, सावन आता है जाता है पर उड़ने वाले लड़कों की छुट्टी अप्रूव नहीं होती और वे जो पल भर में कोस दो कोस की दूरी नाप देते थे बरस भर बाद भी अपने घर भी नहीं जा पाते। जिन लड़कों की कलाइयां राखी से भरी रहती थीं, उन कलाइयों को एक रक्षा सूत्र भी नसीब नहीं होता। जिन लड़कों का मुख बादल धोता था वे बासी मुंह फैक्टरी चले जाते हैं।
गाँव नौजवानों से खाली है, जो कुछ बचे खुचे हैं वे उड़ने वाले लड़के नहीं बल्कि नेताजी की जयकार करने वाले छोटे नेता बन गए हैं जो गांव देस की परम्परा, संस्कार, खेत खलिहान को छोड़कर किसी संविधान नामक लाल किताब की रच्छा करने का दम भर रहे हैं और मजे की बात यह है कि उन्हें पता भी नहीं है कि वह किताब है क्या। उड़ने वाले लड़के गाँव में नहीं बल्कि अब रील में पाए जाते हैं, सफेद शर्ट पेंट, सफेद जूता, सोने की नकली मोटी चैन.... विधायक की गाड़ी में लटके हुए रील बनाते हैं...आरम्भ है प्रचंड।
उड़ने वाले लड़कों ने गुरुत्व के नियमों को बदल दिया था, आज लड़के दारू के ठेके को जाने वाले रास्ते नहीं बदल सके। जिन लड़कों ने गाँव के सत्ती, डीह को अपने पुरखों के रूप में जाना, बूढ़े बरगद को बाबा के रूप में जाना उन्हें सूचित हो कि आज के बहुत से लड़के परिवार और रिश्तों की पहचान नहीं कर पाते।
ऐसा क्यों हुआ, गाँव की माटी का तेज अस्त क्यों हो गया। लड़कों की मसें सावन से भीगने की बजाय नशे से भीगने लगीं। उनकी जिव्हा पर लोक गीत नहीं बल्कि अंग्रेजी गालियां छप गईं। बरसते पानी का सौंदर्य धूमिल हो गया, छलकते गिलास में डूब कर उनका पुरुषार्थ दम तोड़ रहा है।
उड़ने वाले लड़कों लौट आओ अपने खेत खलिहान, अपने डीह बाबा को देखने चले आओ, थान परान के पास चले आओ। तुम्हारे गाँव में जहर बोया जा रहा है, नीलकंठ बन कर आओ और अपनी फसलों, अपनी पीढ़ी, अपने बगीचों को बिकने से बचा लो।
समर्थ कवि,लेखक,समाजशास्त्री,
स्तंभकार:डॉ. #पवन_विजय जी
को मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी की
ओर से उनकी चर्चित पुस्तक “मास्क
मैनिफेस्टो” के लिए वर्ष 2024 का
"अखिल भारतीय आचार्य रामचंद्र शुक्ल
पुरस्कार (आलोचना)" प्राप्त होने की
हार्दिक बधाई✍️💐
@pawanmvijay
मुझे तो ये CJP का आंदोलन कम कॉमेडी सर्कस
ज्यादा लग रहा
आमतौर पर झाड़ू से कॉकरोच रास्ते से हटाए जाते हैं
लेकिन यहां तो उल्टी गंगा बह रही — खैर! जो भी हो
पर देश में एंटरटेनमेंट की कमी नहीं होगी 😂😂
धर्मेंद्र प्रधान जी के खिलाफ बुना गया झूठ का जाल आखिरकार तार-तार हो गया!
प्रो. जयरामन ने खुद सामने आकर साफ कर दिया है कि वे न कभी अमेरिका गए और न ही मंत्री जी या उनके परिवार को जानते हैं।
झूठ फैलाने वालों का चेहरा बेनकाब हो चुका है
सच क्या है, खुद वीडियो में देखिए!👇
#FactCheck
मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी से सपा का चेहरा फिर बेनकाब हुआ है। आजमगढ़ संजरपुर का ये आतंकी पाक ISI का एजेंट था और हिन्दू नेता की हत्या की साजिश में था। सपा-कांग्रेस के समय यहां आतंक फला-फूला। सपा जब कमजोर हुई तो आतंक भी कम हुआ, लेकिन सपा की 2024 जीत के बाद फिर से आतंकी नर्सरी सक्रिय हो गई।