"जहां अपनी पीड़ा लेकर पहुंचे, वहां सम्मान मिला और संघर्ष में साथ खड़े होने का विश्वास मिला —यही जनता और नेतृत्व के बीच भरोसे की असली पहचान है।"
मप्र -विदिशा जिले के नटेरन ब्लॉक के नानकपुर गांव के सहरिया आदिवासी परिवार लंबे समय से अपनी जमीन, अधिकार और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पटवारी, तहसीलदार से ल��कर जिला कलेक्टर तक अपनी समस्याएं पहुंचाने के बाद भी जब न्याय की उम्मीद कमजोर हुई, तो राष्ट्रीय सहरिया जनक्रांति संघ के माध्यम से सहरिया समाज के लोग अपनी पीड़ा लेकर पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद श्री दिग्विजय सिंह जी के समक्ष पहुंचे।
सहरिया परिवारों ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि शासकीय पट्टा भूमि पर दबंगों का कब्ज़ा, श्मशान घाट जाने का रास्ता बंद होना, प्रधानमंत्री आवास, शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना आज भी उनकी बड़ी समस्याएं हैं।
इस मुलाकात का सबसे भावुक पहलू यह था कि न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचे लोगों में कई बुजुर्ग ऐसे थे जिनकी उम्र 70 वर्ष से अधिक थी, कई कमजोर आंखों के साथ पहुंचे थे और कई महिलाएं आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद सिर्फ भरोसे के सहारे भोपाल पहुंचीं। जब श्री दिग्विजय सिंह जी ने इन बुजुर्गों और महिलाओं की स्थिति देखी तो उन्होंने सम्मान के साथ बराबरी से बैठाया उनकी बात सुनी, उनकी पीड़ा समझी और भरोसा दिलाया कि वे स्वयं नानकपुर गांव पहुंचकर सहरिया समाज की समस्याओं को देखेंगे और उनके अधिकारों की लड़ाई में साथ खड़े रहेंगे। यह सिर्फ एक मुलाकात नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए ��म्मीद का पल था जो लंबे समय से अपनी आवाज़ व्यवस्था तक पहुंचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
एक तरफ भाजपा सरकार सहरिया जनजाति के संरक्षण और विकास के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं, योजनाओं का प्रचार कर रही हैँ , लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि सहरिया परिवार आज भी अपनी जमीन, सम्मान और अधिकारों के लिए शासकीय कार्यालयों और अधिकारियों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं।
सवाल यह भी है कि राजनीति करने वाले दे��� प्रदेश के कितने नेता ऐसे वंचित परिवारों के बीच जाकर उनकी पीड़ा सुनते हैं, उन्हें सम्मान देते हैं और उनके संघर्ष में साथ खड़े होने का भरोसा देते हैं?
राजनीति में दावे बहुत होते हैं, लेकिन असली नेतृत्व वही है जो संकट के समय अपनों के बीच खड़ा दिखाई दे। सहरिया समाज की यह लड़ाई सिर्फ सुविधाओं की नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार और न्याय की लड़ाई है।
अब छात्र सिर्फ दर्शक नहीं, बदलाव के नेतृत्वकर्ता बनेंगे।
राष्ट्रीय आदिवासी छात्र संघ (RACS) — शिक्षा, अधिकार, सम्मान और भविष्य की मजबूत आवाज़।
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शोक संदेश एवं परिवार की ओर से सामूहिक निर्णय एवं ���रिवर्तन का संकल्प
"स्व. श्री कमर लाल जी आदिवासी की आत्मशांति एवं सामाजिक सुधार हेतु"
सादर निवेदन,
दुःख के साथ सूचित किया जाता है दिनांक 17 अप्रैल 2026 को गोपाल सिंह, ब्रजेश सिंह, एड. सुनील कुमार आदिवासी, महेंद्र कुमार के पूज्य पिताजी, स्व. श्री कमर लाल जी आदिवासी (सेवानिवृत्त डिप्टी रेंजर) का दुखद स्वर्गवास हो गया था। इस अपार दुःख की घड़ी में आप सभी स्नेहीजनों, समाजजनों एवं ग्रामवासियों द्वारा मिले स्नेह, संवेदना और सहयोग के लिए हम हृदय से आभारी हैं।
हमारे पिताजी का संपूर्ण जीवन सादगी, ईमानदारी और समाज के प्रति समर्पण का प्रतीक रहा। उनके इन्हीं आदर्शों को ध्यान में रखते हुए, हम एक ऐसा निर्णय ले रहे हैं जो केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा में एक छोटा प्रयास है।
आज समाज में प्रचलित बारहवीं (मृत्युभोज) जैसी परंपराएं कई गरीब परिवारों के लिए गहरी पीड़ा और बोझ बन चुकी हैं। *“समाज क्या कहेगा”* के दबाव में लोग कर्ज लेते हैं, जमीन गिरवी रखते हैं, यहाँ तक कि बंधुआ मजदूरी में फंस जाते हैं। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था है जिसे बदलने की आवश्यकता है—और बदलाव की शुरुआत हमें स्वयं से करनी होगी
अतः हम परिवारजन यह सामूहिक एवं दृढ़ निर्णय लेते हैं कि—
1. हम बारहवीं (मृत्युभोज) का आयोजन नहीं कर करेंगे।
2. किसी भी प्रकार के भोज, दिखावा एवं ��नावश्यक खर्च से पूर्णतः दूर रहेंगे।
3. आप सभी से विनम्र अनुरोध है कि कृपया कोई उपहार, कपड़े या अन्य सामग्री न लाएं।
हमारे लिए आपकी उपस्थिति, संवेदना और नैतिक सहयोग ही सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।
विशेष निवेदन – दिनांक 28 अप्रैल 2026 दिन- मंगलवार आप सभी से निवेदन है कि इस दिन केवल दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित करने, वृक्षारोपण, गंगा पूजन एवं प्रसादी ग्रहण करने तथा परिवार एवं समस्त परिजनों के द���ःख में सहभागी बनने हेतु पधारें। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करें जहाँ शोक के समय दिखावा नहीं, बल्कि संवेदना और समानता हो; जहाँ परंपरा बोझ न बने, बल्कि मानवीयता का माध्यम बने।
यह निर्णय केवल हमारे परिवार का नहीं, बल्कि एक सामूहिक पहल है—एक ऐसे समाज की ओर, जहाँ सादगी, न्याय और मानवीय गरिमा को प्राथमिकता मिले।
“परिवर्तन की शुरुआत हमारे अपने निर्णयों से होती है।”
कार्यक्रम स्थल :- न��ज निवास ��्राम झुकर जोगी, जिला विदिशा (म.प्र.)
“समाज क्या कहेगा” के डर ने कितने गरीबों को कर्ज और मजबूरी में धकेला है। हमने बारहवीं (मृत्युभोज) छोड़कर सादगी चुनी—यही सच्ची श्रद्धांजलि है, यही बदलाव की शुरुआत।
- एड. सुनील कुमार आदिवासी
दलित, आदिवासी, पिछड़े, अल्पसंख्यक और शोषितों के अधिकारों की आवाज़ को बुलंद करने वाले, मध्यप्रदेश विधानसभा में जनहित की मुखर आवाज़, नेता प्रतिपक्ष श्री उमंग सिंघार जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई!
आपके अदम्य साहस, संघर्षशीलता और जनसेवा के प्रति आपकी प्रतिबद्ध���ा ने समाज के हर वर्ग को प्रेरित किया है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद प्राप्त हो, ताकि आप सदा जनहित और न्याय के लिए संघर्षरत रहें।
@UmangSinghar
दलित,आदिवासी,पिछड़े,अल्पसंख्यक व शोषित वर्गों की बुलंद आवाज़,मप्र विधानसभा नेता प्रतिपक्ष श्री उमंग सिंघार जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई।आपका साहस,संघर्ष और जनसेवा समाज को नई ऊर्जा देता है।ईश्वर आपको उत्तम स्वास्थ्य,दीर्घायु और न्याय की लड़ाई को और मजबूती देने की शक्ति प्रदान करे
यह हादसा नहीं, आदिवासी बच्चों की संस्थागत हत्या है। सहरिया-बैगा-भरिया के बच्चे पढ़ने की हिम्मत करते हैं और सरकार उन्हें ���ात्रावास में ज़हर परोस कर मार देती है।यह लापरवाही नहीं, सड़ा हुआ सिस्टम और जातिगत उपेक्षा का प्रमाण है।
ये कैसा “गौरव दिवस” है जब हर साल आदिवासी प्रतिभाओं का गला घोंटा जा रहा है ? MPCJ की 121 सीटों पर चयन शून्य—क्या पूरे प्रदेश में एक भी आदिवासी छात्र सिविल जज बनने की काबिलियत नहीं रखता या फिर सरकार की नीयत में ही खोट है ?
बिरसा मुंडा के नाम पर मंच सजाकर तालियाँ बजाने वाले नेता क्या इस सवाल का जवाब देंगे कि अगर हम उनके वंशजों पर इतना गर्व करते हैं तो उनके बच्चों का हक क्यों मारा जा रहा है ? क्या आदिवासी समाज सिर्फ मूर्ति पूजा और फोटो-शूट के लिए है या इस देश के न���याय तंत्र में भी हमारी जगह है ? भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री बताएं—जब चयन प्रक्रिया में बार-बार आदिवासी युवाओं को बाहर कर दिया जाता है तो यह संयोग है या सुनियोजित भेदभाव ? अगर हम इतने ही अयोग्य हैं तो फिर आरक्षण किस बात का दिखावा है ? और हमारे अपने समाज के लोग जो नेताओं के सामने गाने-नाचने में लगे हैं—क्या उन्हें समझ नहीं आता कि मनोरंजन से अधिकार नहीं मिलते, अधिकार संघर्ष से छीनने पड़ते हैं ? क्या आने वाली पीढ़ियों को भी इसी अपमान और अन्याय की आग में झोंक देना है या अब हम हक की लड़ाई लड़ेंगे ? आदिवासी समाज जागो, नेताओं का चमचागिरी छोड़ो, और पूछो—जब हमारी सीटें खाली रह जाती हैं तो गौरव किस बात का ? बिरसा मुंडा के नाम पर राजनीति करने वालों से पूछो—अगर सच में आदिवासी गौरव का सम्मान है तो फिर हमारे बच्चों को न्यायिक सेवा से क्यों बाहर रखा जा रहा है ? अब बस, ये छल नहीं चलेगा; अब समाज पूछेगा, लड़ेग��, ��र अपना हक लेकर रहेगा।
@narendramodi
@DrMohanYadav51
@digvijaya_28
@RahulGandhi
@UmangSinghar
@jitupatwari
@Umakant80
"सिविल जज परीक्षा की 121 आदिवासी सीटों पर एक भी आदिवासी छात्र का चयन नहीं। यह कोई गलती नहीं, बल्कि भाजपा की सुनियोजित मनुवादी साज़िश है!" "गौरव दिवस के नाम पर आदिवासी समाज को ‘शून्य चयन’ का अपमान—भाजपा सरकार आदिवासी युवाओं की क्षमता नहीं, उनकी आवाज़ से डरती है!"
121 सीटें खाली क्यों , आरक्षण खत्म करने की पटकथा कौन लिख रहा है ? यह परीक्षा नहीं, आदिवासी प्रतिनिधित्व की हत्या है।" इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया जी और प्रदेश अध्यक्ष रामू टेकाम जी उपस्थित रहे, जिन्होंने मेरे उठाए मुद्दों को गंभीरता से सुना और सरकार से जवाबदेही की माँग को मजबूती दी।"
@RahulGandhi@DrMohanYadav51@VikrantBhuria
मैं हिंसा का समर्थन नहीं करता, लेकिन भाजपा सरकार पहले यह स्पष्ट करे कि नक्सली की असल परिभाषा क्या है, क्योंकि नक्सलवाद के नाम पर निर्दोष आदिवासियों का खून कब तक बहाया जाएगा ? यह कठोर सच है कि क्या कभी नक्सली जंगल से निकलकर किसी महानगर में आतंकी हमला करते पकड़े गए ? क्या उन्होंने कभी किसी विधानसभा या संसद भवन में ब्लास्ट किया ? क्या उन्होंने कभी किसी शहरी इमारत को उड़ाया ? क्या उन्होंने प्लेन हाईजैक किए ? क्या वे महिलाओं और बच्चियों पर हमले करते हैं ? क्या उन्होंने कभी किसी स्कूल, अस्पताल, मंदिर या मस्जिद को निशाना बनाया ? क्या वे धर्म के नाम पर नफरत फैलाने, भीड़ हिंसा भड़काने, या बलात्कार जैसी अमानवीय घटनाओं में शामिल पाए जाते हैं ? उत्तर है—नहीं!
तो फिर सवाल सीधा है—उन्हें सबसे बड़ा आतंकी खतरा दिखाकर क्यों प्रचारित किया जा रहा है? उन्हें राष्ट्रविरोधी ���ाबित करने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों है ? आखिर सरकार कौन-सा सच छिपाने में लगी है ?
भाजपा सरकार बताए कि जब उनकी लड़ाई सिर्फ जल–जंगल–जमीन की रक्षा तक सीमित रही है, तो फिर देश के वीर जवानों को जंगलों में मौत के मुख में क्यों धकेला जा रहा है ? सैनिकों का धर्म देश की सीमाओं की रक्षा करना है, लेकिन सरकार अपने कॉर्पोरेट-चालित विकास मॉडल को लागू करने के लिए उन्हें आदिवासी इलाकों में क्यों झोंक रही है ? यह क��न-सी विवशता है कि शहरों में रह रहे आदिवासी आज भी रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, लेकिन सरकार का ‘विकास’ सिर्फ उन जंगलों में उतर रहा है जहाँ जमीन के नीचे खनिज, लोहा, सोना और कोयला छुपा है ? आखिर उन जंगलों में ऐसा क्या है कि सैनिकों और आदिवासियों—दोनों देश के बेटों—की जान सरकार खुलेआम दाँव पर लगा रही है ?
सच्चाई कड़वी है—एक तरफ आदिवासी नक्सली अपने जल , जंगल और जमीन बचाने के लिए शहीद हो रहे हैं, और दूसरी तरफ हमारे बहादुर जवान सरकार की असफल नीतियों का बोझ उठाते हुए वीरगति को प्राप्त हो रहे हैं। दोनों ही देश के बेटे हैं, दोनों ही भारतीय हैं—फिर यह बलिदान किसके लिए ? किसकी महत्वाकांक्षा के लिए ?
असल सवाल यह है—चूक कहाँ है ? सरकार की नीयत में, नीति में या नज़रिए में ? यदि भाजपा सरकार सच में शांति चाहती थी तो अब तक संवाद क्यों नहीं हुआ ? क्यों वार्ता की जगह ह���ेशा गोलियों को प्राथमिकता दी गई ? क्यों विकास के नाम पर सिर्फ खनन कंपनियों, खासकर अदानी-अंबानी जैसे कारपोरेट घरानों को ही लाभ पहुँचाया गया, स्थानीय आदिवासी जनता को नहीं ?
तो फिर स्पष्ट है—यह लड़ाई नक्सलियों की नहीं, आदिवासियों की नहीं—बल्कि सरकार की लालच, कॉर्पोरेट दबाव और संसाधनों पर कब्जे की भूख का परिणाम है। और जब तक भाजपा सरकार इस सच्चाई का जवाब नहीं देती, तब तक जंगलों में मरने वाला हर आ���िवासी और शहीद होने वाला हर जवान केंद्र सरकार की विफलता, गलत मंशा और क्रूर नीतियों का शिकार माना जाएगा। जोहार जिंदाबाद!
सिविल जज भर्ती में ST की 121 सीटों पर ZERO चयन—भाजपा की मनुवादी सीट-चोरी करतूत रंगे हाथ पकड़ी हैं!
हाईकोर्ट ने SC-ST बैकलॉग न भरने पर सरकार को जिस तरह झटका दिया है, वह साबित करता है कि यह गलती नहीं, योजनाबद्ध आरक्षण लूट है। 121 ST सीटो��� पर ZERO चयन SC सीटें न भरना, पिछड़ों की सीटें रोकना—यह सब संयोग नहीं बल्कि भाजपा की संरक्षित समुदायों से नफ़रत का सुनियोजित अपराध है। सरकार समझ ले—यह जीत नहीं जब तक एक-एक आदिवासी छात्र को न्याय और उनका संवैधानिक हक़ नहीं मिलता, और हम हर परीक्षा में, हर नियुक्ति में इस “सीट चोरी” को पकड़ते रहेंगे।
हाईकोर्ट ने दो-टूक कहा—“सूची दोबारा बनाओ, बैकलॉग पर पुनर्विचार करो”—लेकिन सवाल वही: आरक्षित सीटे��� खाली क्यों ? आदिवासी छात्रों का अपमान क्यों ? किसके इशारे पर आरक्षण की हत्या हो रही है ? भाजपा को समझ नहीं कि यह सिर्फ भर्ती नहीं, प्रतिनिधित्व और अस्तित्व की लड़ाई है।
जिस तरह राहुल गांधी जी ने देश में ‘वोट चोरी’ के खिलाफ लड़ाई छेड़ी है, उसी तरह हम ‘सीट चोरी�� के खिलाफ मैदान में हैं और आखिरी सीट तक लड़ेंगे। जो हक़ हमारे पूर्वजों ने लड़कर पाया था, उसे भाजपा की मनुवादी मानसिकता न दबा पाएगी और न मिटा पाएगी। सीट चोरी करने वालों—तैयार रहो, आदिवासी समाज जाग चुका है! जय जोहार!
@RahulGandhi
“जंगल में पुलिस क्यों ? आदिवासियों को गोली क्यों ? अडानी-अंबानी को जमीन क्यों ?”
छत्तीसगढ़ सरगुजा में आदिवासियों पर लाठी-गोली-आंसू गैस—क्यों ? किसका आदेश था ? किसके इशारे पर पुलिस जंगल में उतरी ? भाजपा-मोदी सरकार अडानी-अंबानी को खदानें देने के लिए निर्दोष आदिवासियों का खून बहा रही है।
क्या यही विकास है ? क्या यही अमृतकाल है ? 235 में से सिर्फ 16 को मुआवज़ा, बाकी 200+ परिवारों को जंगल-पुलिस-कारपोरेट की संयुक्त लूट से बेदखल—इसे लोकतंत्र कहते हैं या अंग्रेजी हुकूमत का पुनर्जन्म ?
जिन आदिवासियों ने 15 साल से जल-जंगल-ज़मीन बचाने का शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया, अचानक उन्हें आतंकवादी, नक्सली, देशद्रोही क्यों घोषित किया जा रहा है ?
क्या कभी ये शहरों में बम-ब्लास्ट करते हैं ? क्या कभी विधानसभा-लोकसभा पर हमला करते हैं ? क्या कभी मंदिर-मस्जिद-स्कूल-अस्पताल उड़ाते हैं ? क्या कभी महिलाओं-बेटियों पर अत्याचार करते हैं ? क्या कभी धर्म के नाम पर हिंसा फैलाते हैं ? क्या कभी प्लेन हाईजैक करते हैं ? नहीं! कभी नहीं! तो फिर ये देशद्रोही कैसे ? ये आतंकी कैसे ? ये अपराधी कैसे ?
सच यह है—आदिवासी अपराधी नहीं, अपनी धरती के सिपाही हैं; गुनाहगार वो लो�� हैं जो दिल्ली-रायपुर की AC कुर्सियों पर बैठकर जनता का खून चूसकर अडानी-अंबानी को जंगल-पहाड़ बेच रहे हैं। पुलिस जंगल में क्या कर रही है ? किसकी सुरक्षा में तैनात है ? जनता की या अडानी-अंबानी की ?
नक्सली तब पैदा होते हैं जब सरकार अन्याय करती है; हिडमा तब जन्म लेता है जब सत्ता आवाज़ दबाती है; बंदूक तब उठती है जब संविधान के रास्ते बंद किए जाते हैं। भाजपा-मोदी शासन को याद रखना चाहिए—प्रतिरोध अपराध नहीं होता, प्रतिरोध अत्याचार का जवाब होता है। जंगल-जमीन के रक्षक आज सड़क पर हैं, मैदान में हैं, खानों के सामने खड़े हैं, अपनी माँ-धरती पर जान देने को तैयार हैं; और सत्ता-मालिक घुटने में दर्द का इलाज करते हुए हवाई जहाज़ से घूम रहे हैं।
सवाल साफ है—भारत लोकतंत्र है या कॉर्पोरेट कॉलोनी ? सरकार जनसेवक है या अडानी-अंबानी की प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी ? जब तक जल-जंगल-ज़मीन पर हमला होगा, तब तक प्रतिरोध जिं��ा रहेगा; और इतिहास गवाह है—दमन की हर गोली से क्रांति जन्म लेती है।