मेरी बहन तबतक विवाह नहीं करेगी जबतक CM @MYogiAdityanath व @DGPUP द्वारा @sonbhadrapolice के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई कर मेरे परिवार का आत्मसम्मान वापस नही लौटाते।
आरक्षण किसे मिलना चाहिए?
राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति राज्यपाल के परिवार को या गरीब किसान-मजदूर के बच्चों को?
सांसद विधायक मंत्री मुख्यमंत्री के परिवार को या गरीब किसान-मजदूर के बच्चों को?
थानेदार तहसीलदार कलेक्टर कप्तान कमिश्नर सचिव जज के परिवार को या गरीब किसान-मजदूर के बच्चों को
यह लड़का च..र जाति का है दिल्ली में 200 करोड़ के टाइप 8 बंगले में रहकर UPSC की तैयारी कर र���ा है फॉर्च्यूनर से कोचिंग जाता है क्या ऐसे लोगो को आरक्षण की ज़रूरत है ?
लेकिन यह किसी ग़रीब बच्चे की सीट लेकर उसका हक़ खायेगा इसी लिए आरक्षण ��ें वर्गीकरण बहुत ज़रूरी है जो ग़रीब बच्चों को उनका हक़ मिले !!
मुझे गरीबों के अधिकार की लड़ाई में आप सब की मदद की ज़रूरत है साथ दीजिए !!
#reservationpolitics #Subcategorization #India #DalitRights #scstreservation
शादी की उम्र में फर्जी जेल गए। जिंदगी के 8000 दिन जेल में गुजरे। बेगुनाह निकल घर लौटे तो अब कुछ बचा नहीं। न घर बचा, न कोई अपना... अब सूनी आंखों से ढूंढ रहे हैं अपनी उजड़ी दुनिया को। ये कहानी ओडिशा के एक छोटे से गांव हिरलीडांगरी के रहने वाले अर्जुन जानी की है। जिन्हें गांव वाले प्यार से 'टुनटुन' कहते थे। साल 2004 में पुलिस उन्हें तीन हत्याओं के आरोप में पकड़ कर ले गई।
अर्जुन चिल्लाते रहे, रोते रहे कि वे बेगुनाह हैं, लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी। निचली अदालत से लेकर हाई कोर्ट तक ने उन्हें गुनहगार मान लिया। वे पूरे 22 साल यानी अपनी जवानी के सबसे खूबसूरत 8 हजार से ज्यादा दिन जेल की काल कोठरी में काटते रहे।
आखिरकार, देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने जब उनके केस की फाइल खोली, तो सच सामने आ गया। कोर्ट ने माना कि अर्जुन बिल्कुल बेगुनाह हैं और उन्हें गलत फंसाया गया था। जजों ने बेहद दुखी होकर कहा कि यह हमारी न्याय व्यवस्था की बहुत बड़ी नाकामी है कि एक बेकसूर को इतने साल जेल में सड़ना पड़ा। अदालत ने अर्जुन को रिहा कर दिया। जेल का दरवाजा खुला और अर्जुन बड़ी उम्मीदों के साथ अपने गांव की तरफ भागे।
उनके मन में उमंग थी कि इतने सालों बाद वे अपने घर लौट रहे हैं, अपनों से मिलेंगे। मगर गांव पहुंचते ही उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई।जिस मिट्टी की झोपड़ी को वे अपना घर कहते थे, वहां आज सिर्फ कटीली झाड़ियां उगी हुई थीं। उनका घर पूरी तरह मिट्टी में मिल चुका था।
जब वे जेल में अपनी बेगुनाही की लड़ाई लड़ रहे थे, तभी उनकी मां का साया हमेशा के लिए सिर से उठ गया। आज उनके परिवार में न कोई भाई-बहन बचा है, न कोई रिश्त��दार। उम्र के इस पड़ाव पर न उनकी शादी हो पाई और न उनका कोई बच्चा है। पूरे गांव में आज एक भी ऐसा शख्स नहीं है, जिसे अर्जुन अपना कह सकें या जिसके गले लगकर रो सकें।
गांव के लोग बताते हैं कि अर्जुन अब बिल्कुल गुमसुम रहते हैं। वे अक्सर नदी के किनारे अकेले बैठकर घंटों बहते पानी को देखते रहते हैं, तो कभी चुपचाप जंगलों की तरफ निकल जाते हैं। उनकी आंखों में एक ऐसा खालीपन है जो किसी का भी दिल दहला दे।
उन्हें खुद समझ नहीं आ रहा कि इस नई आजादी का वे क्या करें, कहां जाएं और अपनी जिंदगी को दोबारा कैसे शुरू करें?कानून ने अर्जुन को बेगुनाह मानकर छोड़ तो दिया, लेकिन जो जवानी, जो परिवार और जो घर उनसे छीन लिया गया... क्या हमारी दुनिया उन्हें वो सब कभी वापस लौटा पाएगी?
#odisha #arjun #story
गरीब की फोटो रखकर माल खाना कोई इन SC-ST अंबेडकरवादियों से सीखे।
🔹 इन्हें आर्थिक आधार नहीं चाहिए।
🔹 इन्हें उप-श्रेणियाँ नहीं चाहिए।
🔹 इन्हें समानता नहीं चाहिए।
बस शुद्ध जात��वादी सोच। 🙏
#EndReservation
सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र में सवर्ण समाज ने हराया तो भाजपा की यह हाल��� हो गई।
अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा को सरकार से बाहर कर दिया जाए तो 2029 से पहले ST-SC Act भी समाप्त हो जाएगा।
और आरक्षण बढ़ाने की तो भूल ही जाएंगे ये।
भाजपा को सुधारने के लिए भाजपा के खिलाफ वोट करना जरूरी है।
Centre tells Supreme Court it opposes the plea seeking a "creamy layer" style income based prioritisation within SC, ST, OBC and EWS reservations, arguing creamy layer exclusion has no application to Scheduled Castes and Scheduled Tribes and that only Parliament, not courts, can alter SC/ST lists under Articles 341 and 342 #SupremeCourt
केंद्र ने कोर्ट में साफ कह दिया है कि SC/ST आरक्षण में कोई क्रीमी लेयर कोटा नहीं होगा।
केंद्र ने ऐसे किसी भी विचार का वि��ोध कर दिया है..
9 जजों की बेंच के फैसले का हवाला दिया है कि उस फैसले में भी OBC तक के लिए ही क्रीमी लेयर की बात थी।
यानि आरक्षण को लेकर कुछ नहीं बदलनेवाला
तुमको तो ये भी नहीं पता होगा कि छात्र आंदोलन है कि बढ़ते गैस के दाम कम करने के लिए रैली है।
यहाँ मुद्दा लड़की का आवाज़ उठाना नहीं है बल्कि आंदोलन के मार्च की तारीख को अपने हिसाब से तय करके छात्रों को भटकाने का है।
जब छात्रों ने मार्च के लिए 10 तारीख तय कर रखी है तो ये छात्रहित की बात करने गए लोग 6 और 7 करके डिवाइड क्यों कर रहे हैं??
तुम जैसों को देख के कभी कभी हमे भारतीय सिविल सर्विसेज पे संदेह होने लगता है।
अता ना पता बस लबर लबर करके लिखने चले आए।
तुम्हारे लिए नीचे स्क्रीनशॉट लगाया है
पढ़ लेना।
Shivcharan Gupta, 74, a cloth merchant living in an old age home in Sonipat, died yesterday. He had three daughters; sadly and surprisingly, not one of them turned up for his funeral.
He and his late wife had raised and educated their three daughters, ensuring they were all self-reliant and well-settled, two as schoolteachers, residing across Nepal, UP, and Mumbai. After his wife passed away, Shivcharan lived alone at the old age home, keeping a mobile phone solely to stay in touch with his children.
The manager of the old age home told the media that they had informed his three daughters 20 days ago about his deteriorating health, yet none made the trip to visit him. As his illness worsened, the daughters stopped taking his calls altogether. When Shivcharan finally died, the management immediately contacted them again and offered to hold off on the final rites until they could arrive, but none of the sisters agreed to travel.
Instead of showing up to bid their father farewell, the eldest daughter transferred ₹5,100 online to cover the ritual expenses and requested that the funeral be streamed over a video call. Though they initially asked the staff to preserve his ashes, they quickly backtracked, stating they "did not have time" to pick them up and requested that the old age home handle the immersion in the Ganges as well.
This is so tragic. If a life spent raising children ends in total solitude, one cannot help but ask what the long journey was truly for.
@ReformMov_India@masijeevi जैसे शिक्षक & @BhimArmyChief जैसे नेत��� ... इनके मापदंड में आरक्षण 100% होना चाहिए SC/ ST Candidate को बिना entrance exam दिए Medical seat मिलना चाहिए बिना semester exam दिए MBBS की Degree देना चाहिए बिना internship के उनको hospital में practice करने देना चाहिए।
रिजर्वेशन को बढ़ाकर बिश्वगुरु बनने के सपने दिखाए जा रहे हैं, लेकिन ज़रा देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत भी देख लीजिए।
बिहार के शिवहर की 20 वर्षीय रेखा कुमारी कान का इलाज कराने पटना के महावीर आरोग्य संस्थान गई थीं। परिवार का आरोप है कि ऑपरेशन के बाद नर्स ने नस की बजाय आर्टरी में इंजेक्शन लगा दिया। रेखा ने दर्द और तकलीफ़ की शिकायत भी की, लेकिन कथित तौर पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। नतीजा इन्फेक्शन इतना बढ़ा कि उनका हाथ काटना पड़ा। नवंबर में होने वाली शादी भी टूट गई। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि FIR दर्ज कराने गए तो पुलिस ने मना कर दिया।
सोचिए, जिस देश में इलाज कराने जाओ और इलाज के बदले अपना हाथ गंवाकर लौटो, वहाँ सिर्फ़ नारे लगाने से क्या होगा? पहले अस्पतालों में जवाबदेही, डॉक्टरों-नर्सों की जिम्मेदारी और पीड़ितों को न्याय तो सुनिश्चित कीजिए। 100 में से 99 पाने वाले घर बैठेंगे और -40 लानेवाले इलाज करेंगे तो और क्या ही उम्मीद करेंगे हम सब ।
नारों से नहीं, व्यवस्था से देश महान बनता है।
>नाम नेहा बोरा
>काम आंदोलन चोरी
>असली काम छात्र आंदोलन का अभिनय करना
>झारखंड के असली छात्रों ने विधानसभा मार्च की तारीख 10 अगस्त रखी है
>मैडम ने झारखंड आंदोलन पर शुरुआत से कुछ नहीं बोला
>जब देश भर के कैमरे झा��खंड आंदोलन की तरफ घूमे तो मैडम को कैमरों की याद सताने लगी
>मैडम ने छात्रों के विधानसभा मार्च को भटकाने के लिए और कैमरों का रुख खुद की तरफ मोड़ने के लिए 7 अगस्त को विधानसभा मार्च का ऐलान कर दिया
>मैडम चाहती तो 10 अगस्त वाले आंदोलन को मजबूती और समर्थन दे सकती थीं
>लेकिन फिर कैमरे मैडम के अभिनय को कैसे कै�� करते
>जरूरी नहीं हर आंदोलन को पहली पंक्ति से ही लीड किया जाये और कैमरे का फोकस खाया जाये,
>ये सब लोग झारखंड आंदोलन को दीमक की तरह खाकर और क्रेडिट लेकर ढपली की धुन पर नाचने वाली रील बनाना चाहते हैं
>मुझे उम्मीद है कि झारखंड के छात्र सचेत रहेंगे
This was the world's first computer, ENIAC. In 1946, it cost $487,000, occupied an entire room, and was difficult to operate and transport.
Would you pay this much for a computer that's far better than this today?
That's how technology works. It advances, becomes more efficient, and things get cheaper.
So stop saying Jio and Airtel's costs justify endless price hikes. They're not paying from their own pockets; they're charging customers while earning massive profits.
Stop defending the duopoly. Maybe you're earning enough, but always keep in mind that more than half of the country's population earns less than your payout.
झारखंड के छात्रों ने पूरे आन्दोलन में इतना समझदारी का परिचय दिया है,
•न भद्दे कोई नारे
•न कोई गाली
•न क्रेडिट की भूख
•केवल मुद्दों पर बात
•मीडिया के सामने संवेदनशील शब्दों में बात रखना
•ऐसे आंदोलन से परिवर्तन की नदी बहती है