बीते हुए कल के लिए शोकाकुल न हों और आने वाले कल की आशंकाओं से स्वयं को व्याकुल न करें। जीवन का वास्तविक सत्य केवल वर्तमान क्षण में निहित है। अतीत स्मृति बन चुका है और भविष्य अभी समय के गर्भ में अव्यक्त है; हमारे अधिकार में केवल वर्तमान है। यही वह अ��ूल्य क्षण है जिसमें हम सोच सकते हैं, कर्म कर सकते हैं, स्वयं को रूपान्तरित कर सकते हैं और अपने जीवन को सार्थक दिशा दे सकते हैं।
मनुष्य का एक बड़ा दुःख यह है कि वह बीते हुए समय की भूलों, हानियों और पश्चात्तापों में उलझा रहता है, अथवा भविष्य की अनिश्चितताओं और कल्पित आशंकाओं से घिरा रहता है। परिणामस्वरूप वह उस वर्तमान को खो देता है, जो वास्तव में उसके जीवन की सबसे बड़ी सम्पत्ति है। अतीत को स्मरण करें, पर उससे बँधें नहीं; उससे शिक्षा ग्रहण करें, पर उसके बोझ तले दबें नहीं। भविष्य के लिए योजना बनाएँ, पर उसकी चिन्ता में अपने वर्तमान की शान्ति न खोएँ।
वर्तमान क्षण ईश्वर का दिया हुआ अनुपम उपहार है। प्रत्येक श्वास, प्रत्येक अवसर और प्रत्येक परिस्थिति हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन अभी और यहीं है। जो व्यक्ति वर्तमान के मूल्य को समझ लेता है, वह जीवन के प्रत्येक क्षण को साधना, सेवा और आत्मविकास का अवसर बना लेता है। उसके लिए सफलता कोई दूरस्थ लक्ष्य नहीं रहती, बल्कि प्रत्येक क्षण में उत्कृष्ट कर्म करने की प्रेरणा बन जाती है।
जीवन का वास्तविक सौन्दर्य अपने कर्तव्य को निष्ठा, समर्पण और उत्कृष्टता के साथ निभाने में है। मनुष्य चाहे किसी भी भूमिका में हो - विद्यार्थी, शिक्षक, गृहस्थ, अधिकारी, सेवक, साधक या संन्यासी - यदि वह अपने ���त्तरदायित्वों का निर्वाह पूर्ण ईमानदारी और श्रद्धा के साथ करता है, तो उसका प्रत्येक कर्म साधना बन जाता है। कर्तव्यनिष्ठ जीवन ही आत्मविश्वास, शान्ति और संतोष का आधार है।
फल की चिन्ता मन को दुर्बल बनाती है, जबकि कर्म की निष्ठा उसे शक्तिशाली बनाती है। परिणाम अनेक परिस्थितियों और कारणों पर निर्भर होते हैं, किन्तु कर्म की पवित्रता, परिश्रम की गुणवत्ता और संकल्प की दृढ़ता पूर्णतः हमारे हाथ म���ं होती है। अतः अपनी समस्त ऊर्जा वर्तमान में श्रेष्ठ कर्म करने में लगाएँ। जब हम परिणामों की चिन्ता छोड़कर कर्तव्य पर केन्द्रित होते हैं, तब जीवन में सहजता, स्थिरता और आन्तरिक प्रसन्नता का उदय होता है।
प्रत्येक प्रभात एक दिव्य का सन्देश लेकर आता है। प्रत्येक चुनौती अपने भीतर एक शिक्षा छिपाए रहती है। प्रत्येक अनुभव हमें अधिक परिपक्व, अधिक सजग और अधिक सक्षम बनाता है। इसलिए बीते हुए कल की असफलताओं से नि��ाश न हों और आने वाले कल की अनिश्चितताओं से भयभीत न हों। विश्वास, धैर्य और पुरुषार्थ के साथ वर्तमान में स्थित रहकर अपने जीवन-पथ पर आगे बढ़ते रहें।
जब मनुष्य वर्तमान में जीना सीख लेता है, तब उसे ज्ञात होता है कि शान्ति कहीं बाहर नहीं, उसके अपने अन्तःकरण में है; सफलता किसी दूरस्थ उपलब्धि का नाम नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण किए गए श्रेष्ठ प्रयास का परिणाम है; और आनन्द किसी बाहरी वस्तु में नहीं, बल्कि कर्तव्य के समर्पित पालन में निहित है।
आइए ! हम संकल्प लें कि अतीत के पश्चात्ताप और भविष्य की चिन्ताओं से ऊपर उठकर वर्तमान के प्रत्येक क्षण का सम्मान करेंगे। अपने कर्तव्य को पूजा मानकर उसका निष्ठापूर्वक पालन करेंगे। अपने कर्मों को उत्कृष्ट बनाएँगे, अपने विचारों को सकारात्मक रखेंगे और अपने जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाएँगे।
वर्तमान ही जीवन है, कर्तव्य ही साधना है, और समर्पित कर्म ही सफलता का मार्ग है।
अतः वर्तमान का सम्मान करें, कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करें और ईश्वर पर विश्वास रखते हुए जी��न-पथ पर निरन्तर अग्रसर रहें।
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प्रकृति और पर्यावरण मानव जीवन के केवल बाह्य आधार नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के प्राणतत्त्व हैं। यह चराचर जगत् पंचमहाभूतों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के दिव्य संतुलन पर आधारित है। जब यह संतुलन सुरक्षित रहता है, तब जीवन में शान्ति, समृद्धि, स्वास्थ्य और सौन्दर्य का विस्तार होता है; किन्तु जब मनुष्य स्वार्थ, अति-भोग और असंयमवश प्रकृति के नियमों का अ��िक्रमण करता है, तब यही प्रकृति विक्षुब्ध होकर आपदाओं, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और असंतुलन के माध्यम से मानवता को चेतावनी देती है।
भारतीय संस्कृति ने आदिकाल से प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे मातृस्वरूप मानकर वंदित एवं पूजित किया है। हमारे वेदों ने पृथ्वी को माता कहा, नदियों को देवत्व प्रदान किया, वृक्षों को जीवनदाता माना और पर्वतों को दिव्यता का प्रतीक बताया। अथर्वव��द का यह उद्घोष - “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” मानव और प्रकृति के मधुर एवं आत्मीय सम्बन्ध का सनातन घोष है। भारतीय ऋषियों ने सदा यह शिक्षा दी कि प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और समन्वय ही जीवन का वास्तविक मार्ग है।
आज मानव सभ्यता विज्ञान और तकनीक की अभूतपूर्व उपलब्धियों के शिखर पर पहुँचकर भी गम्भीर पर्यावरणीय संकटों से घिरी हुई है। नदियाँ प्रदूषित हो रही है���, वन क्षेत्र निरन्तर सिमट रहे हैं, वायु विषाक्त होती जा रही है, जलस्रोत सूख रहे हैं तथा ऋतुचक्र का संतुलन विचलित हो रहा है। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के असंतुलन का भी प्रतीक है। जब मनुष्य प्रकृति से दूर होता है, तब वह अन्ततः अपने ही अस्तित्व और मूल्यों से भी दूर हो जाता है।
जल जीवन का मूलाधार है। प्रत्येक नदी, सरोवर, झरना और जलधारा केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन की धमन���याँ हैं। जल के बिना न कृषि सम्भव है, न संस्कृति और न ही सभ्यता। यदि जल प्रदूषित होगा तो जीवन भी रोग, संकट और असुरक्षा से भर जाएगा। अतः जल-संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नदियों की स्वच्छता और जल के प्रति संवेदनशील जीवनशैली केवल विकल्प नहीं, बल्कि वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता है। हमें जल को केवल संसाधन नहीं, ईश्वर के अमृततुल्य प्रसाद के रूप में देखना होगा।
इसी प्रकार वृक्ष पृथ्वी के प्राण हैं। व��� केवल पर्यावरण की शोभा नहीं बढ़ाते, बल्कि जीवन का आधार निर्मित करते हैं। वृक्ष वायु को ��ुद्ध करते हैं, वर्षा को संतुलित रखते हैं, जैव-विविधता का संरक्षण करते हैं तथा असंख्य जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं। एक वृक्ष केवल लकड़ी नहीं देता; वह छाया, प्राणवायु, शीतलता, फल, औषधि और जीवन का संरक्षण प्रदान करता है। इसलिए वृक्षारोपण केवल एक सामाजिक अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक एवं आध्यात्मिक जिम्मेदारी है। यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष एक वृक्ष लगाकर उसका संरक्षण करने का संकल्प ले, तो पृथ्वी पुनः हरित, पावन और संतुलित बन सकती है।
पर्यावरण-संरक्षण केवल सरकारों, संस्थाओं अथवा संगठनों का दायित्व नहीं है। यह प्रत्येक जागरूक नागरिक का नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है। जल का संयमित उपयोग, प्लास्टिक का त्याग, स्वच्छता का पालन, ऊर्जा-संरक्षण, वृक्षारोपण तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग ये छोटे-छोटे प्रयास मिलकर एक बड़े परिव���्तन का आधार बन सकते हैं। प्रकृति की रक्षा किसी एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि जीवन की सतत् साधना है।
वास्तव में प्रकृति और मानव का सम्बन्ध केवल आवश्यकता का नहीं, ��त्मीयता का है। प्रकृति के सान्निध्य में मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल होता है, उसकी संवेदनाएँ जागृत होती हैं और उसका जीवन संतुलित बनता है। वन की हरियाली, नदी की कल-कल ध्वनि, पर्वतों की स्थिरता और आकाश की विराटता मनुष्य को ईश्वर की निकटता का अनुभव कराती है। प्रकृति का सौन्दर्य केवल आँखों को नहीं, आत्मा को भी आलोकित करता है।
आज "विश्व पर्यावरण दिवस" के पावन अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे और पर्यावरण-संरक्षण को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाएँगे। स्मरण रहे ! यदि प्रकृति सुरक्षित है तो मानवता सुरक्षित है; यदि पर्यावरण संतुलित है तो जीवन समृद्ध है। प्रकृति का संरक्षण ही भविष्य का संरक्षण है, पर्यावरण की सेवा ही मानवता की सच्ची सेवा है, और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा सर्वोच्च उत्तरदायित्व है।
"विश्व पर्यावरण दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएँ।
@byadavbjp
@KVSinghMPGonda
@SubodhUniyal1
@pushkardhami
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कोचिंग माफियाओं ने एजुकेशन सिस्टम को हाईजैक कर लिया है।
जो स्कूल में पढ़ाया जाता है वह JEE, NEET, CLAT, SSC परीक्षा में पूछा नहीं ��ाता और जो पूछा जाता है वह स्कूल में पढ़ाया नहीं जाता है।
बिना कोचिंग किए स्कूल टॉपर बच्चों का भी आईआईटी या एमबीबीएस में एडमिशन नहीं होता है
सनातन धर्म का अनुसरण करें। धर्म केवल धार्मिक अनुष्ठानों अथवा बाह्य उपासना का ही नाम नहीं है, अपितु वह सत्य, मर्यादा, करुणा, सदाचार, कर्तव्यनिष्ठा एवं जीवन-मूल्यों की वह दिव्य व्यवस्था है, जो मानव जीवन को संतुलन, अनुशासन और सार्थक दिश��� प्रदान करती है।
सनातन धर्म मनुष्य के विचारों को पवित्रता, आचरण को मर्यादा तथा जीवन को स्थिरता प्रदान करता है। यह हमें संयम, विनम्रता, धैर्य, सत्यनिष्ठा और आत्मनियंत्रण का अभ्यास कराता है। धर्मयुक्त जीवन व्यक्ति को केवल बाह्य सफलता ही नहीं, अपितु आंतरिक शान्ति, आत्मिक संतोष और आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है। जहाँ धर्म होता है, वहाँ संतुलन, सद्भाव और मंगल स्वतः प्रकट होते हैं। अतः अपने प्रत्येक विचार, वचन और कर्म को धर्ममय बनाने का सतत् प्रयास करें। धर्म ही जीवन का वास्तविक आलोक और मानवता का शाश्वत आधार है।
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भोजशाला राजा भोज द्वारा 1034 में स्थापित माँ सरस्वती और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। यहाँ वेदों और ग्रंथों का अध्ययन व संकलन होता ��ा। वर्षों से इस विषय पर संघर्ष चलता रहा, लेकिन अब हाईकोर्ट में तथ्य सामने आने के बाद इसे राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान मिला है।
प्रकृति और पर्यावरण मानव जीवन के केवल बाह्य आधार नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के प्राणतत्त्व हैं। यह समस्त चराचर जगत् पंचमहाभूतों - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के संतुलन पर आधारित है। जब यह संतुलन सुरक्षित और समन्वित रहता है, तब जीवन में शान्ति, समृद्धि, स्वास्थ्य और सौन्दर्य का विस्तार होता है; किन्तु जब मनुष्य स्वार्थ, अति-भोग और असंयम के कारण प्रकृति के नियमों का अतिक्रमण करता है, तब यही प्रकृति विक्षुब्ध होकर संकट, आपदा और असंतुलन के रूप में चेतावनी देने लगती है।
भारतीय संस्कृति ने आदिकाल से प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु नहीं माना, बल्कि उसे मातृरूप में पूजित किया है। हमारे वेदों, उपनिषदों और पुराणों में नदियों को देवत्व प्रदान किया गया, वृक्षों को जीवनदाता कहा गया और पर्वतों को दिव्य��ा का प्रतीक माना गया। “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” - यह वैदिक उद्घोष केवल एक दार्शनिक वाक्य नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए एक गहन जीवन-दृष्टि है। भारतीय ऋषियों ने यह स्पष्ट किया कि प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व ही जीवन का वास्तविक मार्ग है।
आज मानव सभ्यता अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति के शिखर पर पहुँचकर भी गहरे पर्यावरणीय संकटों से घिरी हुई है। नदियाँ प्रदूषित हो र��ी हैं, वन निरन्तर कट रहे हैं, वायु विषाक्त होती जा रही है, जलस्रोत सूख रहे हैं और ऋतुओं का संतुलन विचलित हो रहा है। यह केवल भौतिक संकट नहीं, बल्कि मानव चेतना के असंतुलन का भी प्रतीक है। जब मनुष्य प्रकृति से विमुख होता है, तब वह अन्ततः स्वयं अपने अस्तित्व से भी दूर हो जाता है।
जल ही जीवन का आधार है। प्रत्येक नदी, सरोवर, कुआँ और जलधारा केवल जल का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन की धमनियाँ हैं। यदि जलस्रोत प्रदूषित होंगे, तो मानव जीवन भी रोग, अशान्ति और संकट से भर जाएगा। अतः यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम जल को केवल संसाधन न मानें, बल्कि ईश्वर के अमृततुल्य प्रसाद के रूप में देखें। जल का संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नदियों की स्वच्छता तथा जल के प्रति संवेदनशील जीवनशैली आज समय की अनिवार्य आवश्यकता है।
इसी प्रकार वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि पृथ्वी के प्राण हैं। वे वायु को शुद्ध करते हैं, वर्षा को ���ंतुलित रखते हैं, जीव-जगत् को आश्रय प्रदान करते हैं और सम्पूर्ण ��र्यावरण को जीवनदायी बनाते हैं। एक वृक्ष केवल लकड़ी नहीं देता, वह छाया, प्राणवायु, शीतलता, फल, औषधि और जीवन का संरक्षण प्रदान करता है। अतः वृक्षारोपण केवल सामाजिक अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। प्रत्येक व्यक्ति यदि जीवन में एक वृक्ष लगाकर उसका पालन-पोषण करने का संकल्प ले, तो पृथ्वी पुनः हरित, पावन और संतुलित बन सकती है।
पर्यावरण-संरक्षण केवल शासन य��� संस्थाओं का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक जागरूक नागरिक का नैतिक और आध्यात्मिक कर्तव्य है। हमें अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे परिवर्तनों द्वारा प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित करनी होगी जल का संयमित उपयोग, प्लास्टिक का त्याग, स्वच्छता का पालन, ऊर्जा-संरक्षण, वृक्षारोपण तथा प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग ये सभी कदम मिलकर एक महान परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।
वास्तव में प्रकृ��ि और मानव का सम्बन्ध केवल आवश्यकता का नहीं, आत्मीयता का है। जब मनुष्य प्रकृति के समीप रहता है, तब उसके भीतर करुणा, शान्ति और संतुलन का विकास होता है। प्रकृति का सौन्दर्य मनुष्य के अन्तर्मन को निर्मल बनाता है और उसे ईश्वर के अधिक समीप ले जाता है। इसलिए पर्यावरण की रक्षा केवल पृथ्वी को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य, संस्कृति की पवित्रता और जीवन के आध्यात्मिक संतुलन की रक्षा का म���ान संकल्प है।
अतः हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि यदि प्रकृति सुरक्षित है, तो मानवता सुरक्षित है; यदि पर्यावरण संतुलित है तो जीवन समृद्ध है। प्रकृति का संरक्षण ही भविष्य का संरक्षण है, पर्यावरण की सेवा ही मानवता की सच्ची सेवा है, और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा सर्वोच्च उत्तरदायित्व भी है।
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राष्ट्र की स्वतंत्रता हेतु कठोरतम अमानवीय यातनाएं सहकर अपना जीवन मातृभूमि के चरणों में अर्पित करने वाले माँ भारती के अमर सपूत, महान स्वतंत्रता सेनानी ‘स्वातंत्र्यवीर’ विनायक दामोदर सावरकर की जयंती पर सादर नमन।
उनकी क्रांतिकारी चेतना और संघर्षपूर्ण जीवन हमें सदैव राष्ट्रहित में समर्पण, साहस और अटूट संकल्प का अमूल्य संदेश देता रहेगा।
@Ramraajya वैसे ये भी विचार करना चाहिए कि भारत के प्रमुख मंदिरों का कंट्रोल सरकारों के पास होता है वो अपनी तिजोरी भरने के लिए कुछ भी कर सकते हैं, बाकी सभी धर्मस्थल शाशन से मुक्त हैं। हिंदू मरे तो मरे कान्हा बड़ा भाई यदि दान भी करता है तो छोटे भाई को n मिल कर किसी और को ही सरकारें बाँट रही
जीवन का वास्तविक सौन्दर्य बाह्य वैभव में नहीं, अपितु संयम, संतुलन और आत्मानुशासन की अन्तःप्रभा में निहित है। जब मनुष्य प्र��ृति के नियमों के अनुरूप मर्यादित, सजग और अनुशासित जीवन जीता है, तब प्रकृति स्वयं उसकी सहचरी बनकर उसकी शक्तियों को जाग्रत करती है और जीवन-सिद्धि के मार्ग प्रशस्त करती है। प्रकृति के गर्भ में शक्ति, शान्ति, सौन्दर्य, विभूति और उत्कर्ष के अनन्त रहस्य छिपे हैं; किन्तु वे उसी साधक के सम्मुख प्रकट होते हैं, जो अपने जीवन को संयम, पवित्रता और आत्मनियंत्रण से आलोकित करता है।
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बड़ी कक्षाओं में मालूम हुआ कि मुरजबंध (palindrome) शब्द वे हैं जो उल्टे-सीधे एक समान बोले-लिखे जा सकते हैं; जैसे: नयन, नवीन, जलज, तप्त, चम्मच, नग्न, डालडा, सरस, जहाज, नमन, नवजीवन, मलयालम, वनमानव, नवभुवन, नववन, कनक, कारिका, बल्ब, रबर ��त्यादि। मलयालम MALAYALAM तो हिंदी, अंग्रेजी दोनों का उदाहरण है।
मुरजबंध सूची को अपनी जानकारी से खेल-खेल में आगे बढ़ाइए।
सृष्टि के कण-कण में वही एक ब्रह्म, वही परम सत्ता व्यापक रूप से प्रतिष्ठित है। आकाश, धरा, अग्नि, जल और वायु - ये पंचमहाभूत हों, अथवा वृक्ष-वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी और मनुष्य - सभी उसी ब्रह्म की विविध अभिव्यक्तियाँ हैं। इस दृष्टि से समस्त सृष्टि के साथ एकात्मता, सह-अस्तित्व और सौहार्द्र का भाव रखना ही जीवन का श्रेष्ठ ���्येय होना चाहिए, क्योंकि हम सब उसी एक परम चेतना के अंश हैं। यही भाव हमें प्रेरित करता है कि हम प्रकृति और अपने आसपास के प्रत्येक जीव के प्रति सम्मान, करुणा और आत्मीयता से व्यवहार करें; क्योंकि सबमें वही परमात्मा विद्यमान है।
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क्षमा परमात्मा का दिव्य गुण है। अतः जीवन में दयालु, सहृदय और उदार बनें; दूसरों की भूलों को बार-बार स्मरण करने के स्थान पर उन्हें क्षमा करने का अभ्यास करें। जो कुछ प्रभु ने हमें दिया है, उसका आदर करें, उसका सदुपयोग करें और प्रत्येक क्षण उनके अनन्त आशीर्वादों के प्रति कृतज्ञ बने रहें।
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हमारा जीवन ऊर्जा से बना है;
विचारों की ऊर्जा,
वाणी की ऊर्जा,
और कर्म की ऊर्जा।
जब यह ऊर्जा बिखरती है,
तो थकान और भ्रम बढ़ते हैं;
और जब यह केंद्रित होती है,
तो सृजन और सफलता प्रकट होती है।
“प्राणो ब्रह्मेति।” प्राण ही ब्रह्म है, अर्थात् ऊर्जा ही जीवन का मूल है।
ऊर्जा का संरक्षण केवल शरीर का नहीं,
यह मन और वाणी का भी है।
अनावश्यक विचार ऊर्जा को क्षीण करते हैं।
व्यर्थ वाणी शक्ति को कम करती है।
असंयमित कर्म दिशा को भटका देते हैं।
जो साधक अपनी ऊर्जा को समझ लेता है,
वह हर क्षण को सार्थक बना देता है।
वह कम बोलता है,
कम व्यर्थ सोचता है,
और अधिक सजग होकर जीता है।
भज मन 🙏
– श्रीमद् जगदगुरु: स��वामी संदीपानी।
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परम्-आत्मीय प्रिय अनुपम जी,
स्नेह और आशीर्वाद।
आपके हृदयस्पर्शी एवं भावसमन्वित शब्द केवल प्रशंसा के सामान्य उद्गार नहीं हैं, अपितु एक संवेदनशील, संस्कारित, मूल्यनिष्ठ और अध्यात्म-स्पर्शी अन्त:करण की स्वाभाविक अभिव्यक्ति हैं। जब को�� संवाद बाह्य परिचय की सीमाओं का अतिक्रमण कर आत्मा के प्रदेश में प्रवेश करता है, तभी वह मात्र एक भेंट नहीं रह जाती, अपितु एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभूति का स्वरूप धारण कर लेती है। आपने उसी सूक्ष्म, आत्मीय और अंतरंग अनुभूति को अत्यन्त सौंदर्य, गरिमा और गहराई के साथ अभिव्यक्त किया है।
आप निस्संदेह असाधारण प्रतिभा के धनी, विलक्षण कलाकार और तेजस्वी व्यक्तित्व हैं; किन्तु आपकी वास्तविक विशिष्टता केवल आपकी कलात्मक प्रतिभा में नहीं, बल्कि आपके उच्च जीवन-मूल्यों, ��ारतीय संस्कारों, विनम्रता, संवेदनशीलता और आध्यात्मिक ग्रहणशीलता में निहित है। प्रतिभा जब मर्यादा से संयुक्त होती है, यश जब विनय से अलंकृत होता है, और व्यक्तित्व जब संस्कृति, करुणा तथा आत्मिक चेतना से आलोकित होता है, तब वह केवल सफल नहीं होता-वह समाज के लिए प्रेरणा, संस्कृति के लिए गौरव और मानवता के लिए आशा का दीप बन जाता है। आप उसी प्रेरणास्वरूप परम्परा के एक दीप्त प्रतिनिधि हैं।
भारत की सन��तन चेतना, उसके प्राचीन देवालयों, संत-वाङ्मय तथा विशेषतः कश्मीर जैसी दिव्य और ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर के प्रति आपका आदरभाव इस सत्य को प्रमाणित करता है कि आपकी दृष्टि केवल कला के बाह्य आयामों तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा, उसकी स्मृति, उसकी साधना और उसकी सनातन सांस्कृतिक चेतना तक पहुँचती है। ऐसे ही भाव मनुष्य को भीतर से समृद्ध करते हैं, जीवन को गाम्भीर्य प्रदान करते हैं और यात्रा क��� केवल गमन नहीं, साधना बना देते हैं।
आपके शब्द���ं में जो आत्मीयता, संवेदना और आध्यात्मिक अनुराग झलकता है, वह आपके अन्तःपुरुष की श्रेष्ठता का परिचायक है। आपकी प्रतिभा जितनी अद्भुत है, आपकी विनम्रता उतनी ही प्रेरणादायी; आपका व्यक्तित्व जितना तेजस्वी है, आपका हृदय उतना ही कोमल और संस्कारित। आप जैसे गुणी, सजग, संस्कारित और मूल्यनिष्ठ व्यक्तित्व से मिलना सदैव हृदय को प्रसन्नता, शान्ति और आश्वस्ति से भर देता है।
ईश्वर से प्रार्थना है कि आप निरंतर यश, ऊर्जा, उत्तम स्वास्थ्य, अंतःप्रकाश और दिव्य प्रेरणा से आलोकित रहें। आपकी प्रतिभा, आपकी संवेदना और आपकी मूल्यसम्पन्न जीवन-दृष्टि समाज को निरंतर प्रेरित करती रहे तथा राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को और अधिक समृद्ध करती रहे।मेरा स्नेह, शुभकामनाएँ और आशीर्वाद सदैव आपके साथ हैं। शुभम् भवतु !
स्वामी अवधेशानन्द गिरि:
@AnupamPKher
नवउमंग, नवसृजन, नवोल्लास, और खेत-खलिहानों में लहलहाती स्वर्णिम फसलों के मधुर आह्लाद के मध्य प्रकृति के नव श्रृंगार, नवऋतु की छटा और सौर नववर्ष के अभिनंदन का पावन पर्व वैशाखी हम सबके जीवन में उत्साह, समृद्धि और चेतना का नवीन प्रकाश लेकर आये।
सौर गणना के अनुसार भगवान भुवन-भास्कर के मेष राशि में प्रवेश के साथ आरंभ होने वाला यह प्रथम दिवस केवल नववर्ष का उद्घोष ही नहीं, बल्कि नई फसल, नवाचार, श्रम-संस्कृति, लोकमंगल और मानवीय चेतना के नवोदय का भी मंगल संदेश है।
यह पावन पर्व समस्त प्राणिमात्र के लिए सुख, शांति, समृद्धि और कल्याण का कारण बने इसी मंगलकामना सहित वैशाखी की हार्दिक शुभकामनाएँ।
#बैसाखी #वैशाखी_पर्व #HappyBaisakhi
मनुस���मृति कब लिखी गई से ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? इस ग्रंथ को ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया?
सबसे बड़ा सवाल है कि #मनुस्मृति के कथित विभेदकारी सूत्रों के बारे में अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व के भारतीय बौद्धिक मन में कोई प्रश्न कभी भी क्यों नहीं उठा? क्यों भगवान बुद्ध से लेकर कौटिल्य, कामंदक आदि और बाणभट्ट से लेकर रैदासजी, कबीर आदि तक किसी ��े मनु स्मृति पर कटाक्ष नहीं किए? आखिर मनु स्मृति के विभेदकारी सूत्रों पर भारतीय मन का ध्यान अंग्रेजों के प्रकाशन के बाद ही क्यों गया? @Profdilipmandal
सदैव ध्यान में रखिए कि मनु स्मृति का पहला प्रकाशन (लेखन नहीं) ब्रिटिश राज में प्रिंटिंग प्रेस आने के बाद 1776 में विलियम जोन्स ने कराया।
इसके प्रकाशन के पहले विलियम जोन्स की सलाह से 11 बड़े पंडितों की कमेटी बनाई गई। देश में तब तक मनु स्मृति की प्राप्त कथित प���ंडुलिपियों को जो भोजपत्र पर या ताड़पत्र पर अंकित थीं, उनका संकलन ��स कमेटी के सुपुर्द किया।
इस समिति में दरबारी और सरकारी धन पर आश्रित अनेक बंगाली सम्मिलित थे। इस कमेटी में काशी की विद्वत्त पंरपरा या काशी की वैदिक पंरपरा में शिक्षित कोई ब्राह्मण सम्मिलित नहीं किया गया।
इस कमेटी के सभी विद्वानों को बड़ी भारी स्कॉलरशिप या फेलोशिप दी गई। मुंहमांगी कीमत दी गई। विलियम जोन्स ने एक समग्र मनुस्मृति के प्रकाशन की अवधारणा प्रस्तुत की।
इसके नोट्स रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की जिल्दों में मिल सकती है जैसा कि मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने मुझे बताया था कि मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट की टीका या उनके भाष्य के साथ की मनु स्मृति की पांडुलिपि की अनेक संदिग्ध और जीर्ण शीर्ण प्रतियां समिति को दे दी गई।
इस प्रक्रिया में कालांतर में मनचाहे तरीके से भोजपत्रों के जीर्ण पन्ने इधर-उधर से लाकर मनु स्मृति के नाम पर घुसा दिए गए। और इसके लिए भी भारी षड्यंत्र सोसायटी के अंग्रेज अफसरों ने पहले ही रच रखा था।
पहला प्रकाशन जल्दबाजी में 1776 में हुआ,किंतु
बहुत कुछ नया कूट रचित श्लोक तो इसमें डाला ही नहीं जा सका तो पुनः 1786 में, 1794 में मनु स्मृति का नए सिरे से ब्रिटिश प्रेस ने प्रकाशन किया।
अंग्रेजों ने इस बीच मुंह मांगी कीमत पर देश के प्रत्येक राजमहल के पुस्तकालयों को खंगाल डाला और जहां भी पांडुलिपियां थीं, उन्हें संरक्षण देने के नाम पर एशियाटिक सोसायटी के दफ्तर में अनिवार्य रूप से जमा कराने का आदेश सभी जिलाधिकारियों, अफसरों को जारी कर दिया।
यह भी कहा गया कि सभी का प्रकाशन सजिल्द सोसायटी के द्वारा करवाकर सभी को संरक्षित और सुरक्षित कर दिया जाएगा। देश के अनेक भोले विद्वानों ने, अंग्रेजी कृपा और धन से संरक्षित लोगों ने पांडुलिपि की प्रतियां अंग्रेजों के हवाल कर दीं।
इस प्रकार षड्यंत्रपूर्वक प्रथम संपादक विलियम जोन्स जो कि उ��� समय की सर्वोच्च ब्रिटिश अदालत का जज था, उसने मनु स्मृति का पहला प्रकाशन कराया। नियमानुसार वही इसका प्रथम लेखक और संपादक हुआ, इस मनु स्मृति की प्रथम प्रकाशक ब्रिटिश हुकूमत है। ऐसे अनेक अकादमिक प्रश्न अनुत्तरित हैं कि
1-यदि मौजूदा मनु स्मृति सत्य है और इसमें मिलावट नहीं है तो इस तथ्य का स्पष्टीकरण दें कि आखिर बुद्ध, कौटिल्य, कामंदक, सोमदेवसूरि, बाण भट्ट, रामानुज, रामानंद, रैदास, कबीर आदि ने क्यों कभी मनु स्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए? इसके उलट सभी ने मनु का नाम जब भी लिया है, आदर से लिया है। रैदास जी की वाणी म��ं भी मनु का नाम आदर से लिया गया है।
2-यदि मिलावट नहीं है तो रॉयल एशियाटिक सोसायटी का मौजूदा ऑफिस सन् 1776 में प्रकाशित मनु स्मृति की मूल कॉपी को सार्वजनिक क्यों नहीं करता? मनु की जिन कथित पांडुलिपियों को संरक्षित करने के नाम पर लिया गया था, वह पांडुलिपियां यदि सुरक्षित हैं तो कहां हैं, उन्हें क्योें विद्वानों के लिए दोबारा सार्वजनिक नहीं किया गया?
3-यह प्रश्न इसलिए क्योेंकि मेरे गुरुदेव् प्रो. क���लेश दत्त त्रिपाठी ने अनेक अवसरों पर सोसायटी जाकर मूल पांडुलिपियों को देखने और पढ़ने की इच्छा प्रकट की थी जिनके आधार पर आज की मनु स्मृति विलियम जोन्स के संपादन और स्वामित्व में प्रकाशित की गई थी। लेकिन कभी मूल पांडुलिपि उपलब्ध नहीं कराई गई।
4-संस्कृति मंत्रालय @gssjodhpur को तत्काल अंग्रेजों के आगमन के पूर्व की मनु स्मृति की पांडुलिपि की खोज के लिए देश भर के समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करना चाहिए।
जिस पांडुलिपि के आधार पर संपादक विलियम जोन्स ने मनुस्मृति का पहला प्रकाशन किया, उनका पता लगाकर उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। शोधपूर्वक देखा जाना चाहिए कि ये पांडुलिपि मनु की हैं भी या नहीं है? @AmitShah
@PMOIndia
भारतीय शिक्षा परम्परा में ज्ञान का उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व उसके विचार, आचरण, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व को विकसित करने का माध्यम रहा है। इसी महान परम्परा का जीवंत प्रतिबिम्ब उस समय देखने को मिला जब डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज, बुलन्दशहर के 70वें वार्षिकोत्सव के तीन दिवसीय कार्यक्रम का शुभारम्भ अत्यन्त गरिमामय, प्रेरणादायी और आध्यात्मिक वातावरण में सम्पन्न हुआ।
इस अवसर पर आयोजित “युवा चेतना और आध्यात्मिक मूल्यों का समन्वय : विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास हेतु आध्यात्मिक संवाद” विषयक शुभारम्भ सत्र ने कार्यक्रम को विशेष वैचारिक ऊँचाई प्रदान की। इस प्रेरणास्पद अवसर पर श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ, परम पूज्य जूनापीठाधीश्वर, आचार्यमहामण्डलेश्वर अनन्तश्रीविभूषित पूज्यपाद श्री स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज “पूज्य आचार्यश्री जी” का शुभागमन हुआ, जिनकी दिव्य उपस्थिति ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत कर दिया।
अपने प्रेरक उ���्बोधन में “पूज्य आचार्यश्री जी” ने युवाओं की शक्ति और संभावनाओं पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि युवावस्था जीवन की सर्वाधिक ऊर्जावान और संभावनाओं से परिपूर्ण अवस्था है। यह वह कालखंड है जिसमें व्यक्ति अपने व्यक्तित्व, दृष्टि और लक्ष्य का निर्माण करता है। यदि इस ऊर्जा को सही दिशा विशेषतः आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों का मार्गदर्शन प्राप्त हो, तो वही युवा शक्ति समाज और राष्ट्र के उज्ज्वल भ���िष्य का आधार बन सकती है।
अपने ��द्बोधन में उन्होंने युवाओं को यह भी प्रेरणा दी कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्मविश्वास, निरन्तर परिश्रम और सकारात्मक सोच अनिवार्य हैं। आध्यात्मिकता मनुष्य को आंतरिक शान्ति, धैर्य और विवेक प्रदान करती है, जिससे वह जीवन की कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना संतुलन और साहस के साथ कर सकता है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में सदाचार, अनुशासन और सेवा की भावना क�� आत्मसात करें, क्योंकि यही गुण उन्हें एक आदर्श व्यक्तित्व और उत्तरदायी नागरिक बनने की दिशा में प्रेरित करते हैं।
इस अवसर पर महाविद्यालय परिवार द्वारा “पूज्य आचार्यश्री जी” का अत्यन्त भावपूर्ण स्वागत और अभिनन्दन किया गया। कार्यक्रम में अनेक गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही, जिनमें आदरणीय श्री लक्ष्मीराज जी, विधायक (सिकंदराबाद), आदरणीया श्रीमती मीनाक्षी सिंह जी, विधायक (खुर्��ा), आदरणीय श्री प्रदीप चौधरी जी, विधायक (सदर बुलन्दशहर), आदरणीय श्री राम कुमार सहयोगी जी, विधायक (इगलास), आदरणीय श्री अनिल कुमार गर्ग जी, पूर्व-सचिव, प्रबन्ध समिति, आदरणीय श्री अरुण कुमार गर्ग जी, सचिव, प्रबन्ध समिति, प्रो. राजीव सिरोही जी, प्राचार्य, डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज (बुलन्दशहर) सहित महाविद्यालय के प्राध्यापकगण, छात्र-छात्राएँ तथा नगर के प्रबुद्ध नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के मध्य उपस्थित सभी विद्यार्थियों और अतिथियों ने “पूज्य आचार्यश्री जी” के प्रेरक विचारों को अत्यन्त मनोयोग और श्रद्धा के ���ाथ सुना। उनके उद्बोधन ने युवाओं के मन में आत्मविश्वास, सकारात्मकता और आध्यात्मिक दृष्टि का संचार किया। अनेक विद्यार्थियों ने यह संकल्प लिया कि वे अपने जीवन में शिक्षा के साथ-साथ नैतिकता, संस्कार और सेवा-भाव को भी समान महत्व देंगे।
अन्ततः यह आध्यात्मिक संवाद केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि वह विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा, मार्गदर्शन और आत्मचिन्तन का सशक्त माध्यम बन गया। इस संवाद ने युवा चेतना को आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ते हुए उनके जीवन को नई दिशा प्रदान की और डी.ए.वी. पी.जी. कॉलेज, बुलन्दशहर के 70वें वार्षिकोत्सव को एक विशिष्ट, सार्थक और स्मरणीय आयाम प्रदान किया।
निस्संदेह, ऐसे कार्यक्रम शिक्षा और आध्यात्मिकता के उस समन्वित आदर्श को साकार करते हैं, जिसकी आवश्यकता आज के समय में पहले से क��ीं अधिक है। जब युवा चेतना ज्ञान, संस्कार और आध्यात्मिक मूल्यों से अनुप्राणित होती है, तभी एक सशक्त, संतुलित और समरस समाज का निर्माण संभव हो पाता है।
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