@arvindchotia सलाद में भेदभाव...सलाद की प्लेट सिर्फ CM साहब के पास ही है... यह प्रायोजित भोजन था... भोजन ही करना था तो किसी गरीब के घर पर जाकर करते जैसा मिलता वही खाते....
"रामनाथ गोयनका अवॉर्ड'..🖋️🏆
मेरे पत्रकारिता जीवन का सबसे यादगार और गौरवशाली दिन है। देश का सबसे प्रतिष्ठित "रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड' माननीय उप-राष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन जी के हाथों प्राप्त करना,मेरे लिए गर्व का पल रहा।
दैनिक भास्कर के दो रिपोर्टर्स को मिला प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका अवॉर्ड।अवधेश अकोदिया को जयपुर से लेकर बांग्लादेश तक फैले किडनी डोनर रैकेट का पर्दाफाश करने लिए जबकि विजय पाल डूडी को चाइल्ड ट्रैफिकिंग के महीन जाल को उजागर करने वाली रिपोर्ट के लिए। भास्कर के दोनों धुरंधरों को बधाई।
उन दिनों ट्विटर भी ट्विटर ही था।
X नहीं हुआ था। इसलिए यह ट्वीट भी कभी eX नहीं हुआ। तब व्यूज भले ही काउंट नहीं किए जाते हों, लेकिन इस ट्वीट को अत्यंत सराहा गया था। कुल 38 000 लाइक्स इस ट्वीट को मिले और इसे 3418 बार कोट रिट्वीट किया गया था।
वो समय भी अलग ही था। हर चीज की मर्यादा थी। शब्दों की भी मर्यादा थी। कम शब्दों में बात कह दी जाती थी। और कम शब्दों में पूरी बात आ भी जाती थी। इससे भी बड़ी बात यह है कि कम शब्दों में कही गई बात लोगों के समझ में भी आ जाती थी।
वह सही मायने में ट्विटर की दुनिया का शास्त्रीय युग था। एलोन मस्क जैसे अंबानी-अडानी की एंट्री ट्विटर में नहीं हुई थी। "चिट्ठी को ही तार समझना" जैसी ही कहावत बन गया था पवन खेड़ा का यह मात्र 8 शब्दों का ट्वीट। यह इतना मारक था कि इसे हजारों लाखों लोगों ने अपने मोबाइल में सेव कर लिया था। शायद कांग्रेस के आलाकमान ने भी इसे सेव कर लिया था।
शायद कांग्रेस आलाकमान देखना चाहता हो कि इस युग में कोई कितनी कड़ी तपस्या कर सकता है? हमारी पीढ़ी ने तपस्या के बारे में सिर्फ सुना ही सुना है, असल में तपस्या करते किसी को देखा तो है नहीं। कांग्रेस को भी तो वही पीढ़ी चला रही है। जिस युग में यह ट्वीट किया गया था, उस युग में अगर खेड़ा जी की तपस्या पूरी हो गई होती तो अभी कार्यकाल समाप्ति की ओर बढ़ रहा होता। ख़ैर।
स्थितियां दोनों ही समय एक जैसी ही होती हैं। कल मैं पढ़ रहा था कि कार्यकाल पूरा होने पर प्रियंका चतुर्वेदी भावुक हो गईं। और कार्यकाल शुरू नहीं हो पाने पर एक जमाने में पवन खेड़ा भावुक गए थे। ये आठ शब्द उन्होंने उसी भावुकता में लिख दिए थे। अब ऊपर वाले ने जो लिख दिया वो लिख दिया। पवन जी का लिखा हुआ अमर हो गया। इसे सदैव याद रखा जाएगा।
इसके बाद कई चुनाव आए और कई चुनाव गए। तपस्या फिर भी पूरी नहीं हुई लेकिन पवन जी ने उसके बाद कभी भी ऐसा नहीं लिखा। कभी इसके जैसा भी कुछ और नहीं लिखा। इस बीच पवन खेड़ा मेरे पसंदीदा नेताओं में शुमार हो गए। और मुझे उम्मीद है की पवन खेड़ा एक न एक दिन कामयाब जरूर होंगे। बड़े बुजुर्गों ने कहा है कि इंतजार करना अच्छा लगता है अगर अंत सुखद हो।
अगर पवन खेड़ा आपका भी पसंदीदा नेता हैं तो इस ट्वीट को रिट्वीट कीजिए।
@Pawankhera